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चार दिन पहले बीआर चोपड़ा की बहू रेणु चोपड़ा ने अपना घर शिफ्ट किया था। फिल्म इंडस्ट्री में सभी लोग जानते हैं कि रेणुजी बहुत स्वादिष्ट खाना बनाती हैं। उन्होंने मुझे डिनर पर न्यौता दिया था। इससे अचानक मुझे ध्यान आया कि मैंने आज तक बीआर चोपड़ा साहब के बारे में कभी नहीं लिखा। तो आज मेरे हिस्से के किस्से में बात बीआर चोपड़ा यानी बलदेव राज चोपड़ा जी की। बीआर चोपड़ा का जन्म लाहौर में हुआ था और वहीं उनकी शिक्षा भी हुई। उनके पिता सरकार में बड़े पद पर थे और चाहते थे कि उनका बेटा आईसीएस करें, (जो बाद में आईएएस में बदली)। बीआर चोपड़ा पढ़ाई में बहुत अच्छे थे, लेकिन इत्तेफाक से वे बीमार पड़ गए, जिसकी वजह से उनका रिजल्ट अच्छा नहीं आया। उनके पिता ने कहा, ‘तुम मायूस मत हो। अगले अटेम्प्ट में फिर बैठो।’ इस पर बीआर चोपड़ा ने कहा, ‘अगर ईश्वर को मंजूर होता कि मैं आईसीएस पास करूं तो इस अटेम्प्ट में वह मुझे बीमार नहीं करता। अगले अटेम्प्ट में भी मेरा नहीं होगा। मैं न आईसीएस करूंगा और न कोई सरकारी नौकरी। अब मैं खुद का कुछ करूंगा।’ वे उस समय युवा थे। उस दौर में फिल्मों का नया-नया शौक था और फिल्मों की खूब बातें होती थीं। फिल्में देखकर उनके मन में कई विचार आते थे। धीरे-धीरे उन्हें लिखने का भी शौक हो गया। उन्होंने एक लेख लिखा और कलकत्ता से निकलने वाले मशहूर अखबार ‘वैरायटीज’ को भेज दिया, लेकिन वह नहीं छपा। उन्होंने फिर 2 लेख और भेजे। वे भी नहीं छपे। इससे वे बहुत मायूस हो। एक दिन उनके घर एक पार्सल आया। उसमें ‘वैरायटीज’ अखबार की कई प्रतियां थीं और साथ में संपादक का एक खत भी था। उसमें लिखा था, ‘हम माफी चाहते हैं कि हमने आपको बहुत देर से जवाब दिया। दरअसल, जब आपके लेख आए तो हमें बहुत पसंद आए, लेकिन दुर्गा पूजा का समय होने के कारण हम उन्हें छाप नहीं पाए। अब हमने इस अंक में आपके तीनों लेख प्रकाशित कर दिए हैं। हम चाहते हैं कि आप हमारे अखबार के लाहौर संवाददाता बन जाएं।’ चोपड़ा ने लिखना शुरू कर दिया। 2 अगस्त को उन्होंने अपना आखिरी लेख लिखा। उसके बाद देश का विभाजन हो गया और उन्हें लाहौर से अपना सबकुछ छोड़कर जालंधर आना पड़ा। बकौल चोपड़ा, जालंधर में हमारा खानदानी घर था, इसलिए हम वहीं आकर रुके। वहां हमारे कुछ जानने वाले, जो शरणार्थी बनकर आए थे और हमारे पिता के कुछ मित्र भी आकर ठहरे। चोपड़ा साहब के जेहन से लाहौर की यादें कभी दूर नहीं हो पाईं। इसी बात पर मुझे एक शेर याद आता है: कदम कदम पर मोहब्बत ने पांव पकड़े हैं
आसान नहीं है छोड़कर आना वतन को। बकौल चोपड़ा, हमारे सामने सबसे बड़ी समस्या थी कि अब करें क्या। सबने मिलकर कहा, ‘चलो, एक फिल्म बनाते हैं। तुम्हें तो फिल्मों की जानकारी है। तुमने इतना लिखा है।’ आखिर तय हुआ कि हम सब बंबई चलकर फिल्म बनाते हैं। तो हम 5 पार्टनर फिल्म बनाने के इरादे से बंबई आ गए। सोच रहे थे कि क्या बनाया जाए। मैंने कहा, ‘कुछ अलग बनाते हैं, जो आज तक किसी ने न देखा हो।’ लेकिन बाकी पार्टनर्स की जिद थी कि जो चल रहा है और जो हिंदुस्तानी जनता देखना चाहती है, वही बनाया जाए। मेरी बात नहीं चली। उन्होंने ‘करवट’ नाम की फिल्म बनाई, लेकिन वह फ्लॉप साबित हुई। उसके बाद सबका फिल्म बनाने का हौसला टूट गया। अब फिर वही सवाल था कि क्या किया जाए। एक कैफे था, जहां हम बैठकर चाय पिया करते थे। वहीं मुझे आईएस जौहर मिल गए। वे मुझे लाहौर से जानते थे। उन्होंने पूछा, ‘क्या कर रहे हो?’ मैंने कहा, ‘कुछ नहीं।’ उन्होंने कहा, ‘मेरी एक कहानी सुन लो।’ मेरे मना करने के बाद भी उन्होंने जिद की और कहानी सुना दी। कहानी मुझे अच्छी लगी। कुछ दिनों बाद लाहौर के ही एक और परिचित मिले। उन्होंने पूछा, ‘क्या कर रहे हो?’ मैंने कहा, ‘कुछ नहीं। पैसे नहीं हैं और न ही कोई पैसे लगाने वाला है।’ उन्होंने कहा, ‘कोई कहानी सुनाओ।’ मैंने उन्हें आईएस जौहर वाली कहानी सुना दी। उन्हें वह बहुत पसंद आई। उन्होंने कहा, ‘मैं तुम्हारी फिल्म फाइनेंस करूंगा। लेकिन मेरी एक शर्त है। फिल्म तुम ही डायरेक्ट करोगे।’ मैंने कहा, ‘मैं कभी किसी का असिस्टेंट नहीं रहा। न कभी शूटिंग की, न कोई सेट अटेंड किया। मैं फिल्म कैसे डायरेक्ट करूंगा?’ उन्होंने 50 हजार रुपये का चेक निकाला और कहा, ‘अगर तुम यह फिल्म डायरेक्ट करोगे तो यह चेक उठा लो। वरना यह फिल्म मत बनाओ।’ उस समय मुझे काम शुरू करना था, इसलिए मैंने वो चेक ले लिया। किस्मत ने मेरा साथ दिया। अशोक कुमार, प्राण साहब और कुलदीप कौर सभी फिल्म से जुड़ गए। फिल्म बनी, जिसका नाम था ‘अफसाना’ और वह ब्लॉकबस्टर साबित हुई। चोपड़ा साहब की और भी कुछ बातें अगले कॉलम में। अभी तो उनकी फिल्म ‘गुमराह’ में साहिल साहब का लिखा गाना ‘चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाए…’ सुनें, अपना ध्यान रखें और खुश रहें। –
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रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से:फाइनेंसर ने बीआर चोपड़ा के सामने रखी थी ऐसी अनूठी शर्त
