Headlines

रांची के मोरहाबादी आवास पर 9 बजे तक अंतिम दर्शन:दोपहर 12 बजे नेमरा में अंतिम संस्कार, ओरमांझी-गोला होते हुए आवास तक जाएगी अंतिम यात्रा




मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां और झामुमो संस्थापक दिवंगत शिबू सोरेन की पत्नी रूपी सोरेन का देर रात निधन हो गया। रांची के बरियातू स्थित हिल व्यू अस्पताल से उनका पार्थिव शरीर रात करीब 10 बजे मोरहाबादी स्थित स्व. शिबू सोरेन के आवास पर लाया गया। उनके निधन की खबर के बाद पार्टी नेताओं, कार्यकर्ताओं और समर्थकों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया। झामुमो के केंद्रीय महासचिव विनोद कुमार पांडेय ने बताया कि रूपी सोरेन का पार्थिव शरीर सुबह नौ बजे तक मोरहाबादी स्थित आवास पर अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा। इस दौरान परिजन, पार्टी नेता, कार्यकर्ता और शुभचिंतक उन्हें श्रद्धांजलि दे सकेंगे। अंतिम दर्शन के बाद उनके पार्थिव शरीर के साथ अंतिम यात्रा शुरू होगी। ओरमांझी-गोला होते हुए नेमरा जाएगी अंतिम यात्रा अंतिम दर्शन के बाद रूपी सोरेन की अंतिम यात्रा सड़क मार्ग से नेमरा के लिए रवाना होगी। अंतिम यात्रा मोरहाबादी से ओरमांझी और गोला होते हुए नेमरा पहुंचेगी। झामुमो नेताओं के अनुसार, अंतिम संस्कार के लिए सभी तैयारियां पूरी की जा रही हैं। रूपी सोरेन के अंतिम दर्शन और अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में लोगों के शामिल होने की संभावना है। परिवार और पार्टी की ओर से अंतिम यात्रा को लेकर आवश्यक तैयारियां की जा रही हैं। उनके पार्थिव शरीर को निर्धारित मार्ग से उनके पैतृक गांव नेमरा ले जाया जाएगा, जहां अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी होगी। संथाली रीति-रिवाज से होगा अंतिम संस्कार नेमरा के बरलंगा गांव स्थित घाट पर दोपहर 12 बजे रूपी सोरेन का अंतिम संस्कार संथाली रीति-रिवाज से किया जाएगा। इसी घाट पर झामुमो संस्थापक और रूपी सोरेन के पति दिवंगत शिबू सोरेन का भी अंतिम संस्कार हुआ था। ऐसे में बरलंगा घाट परिवार और झामुमो से जुड़े लोगों के लिए विशेष महत्व रखता है। अंतिम संस्कार में परिवार के सदस्यों के अलावा पार्टी के वरिष्ठ नेता, कार्यकर्ता और बड़ी संख्या में समर्थकों के पहुंचने की संभावना है। गुरुजी के निधन के 14 महीने बाद जिंदगी की जंग हारीं गुरुजी ने 4 अगस्त 2025 को दुनिया को अलविदा कहा था। इसके 14 महीने बाद उनके जीवन के हर उतार-चढ़ाव में उनकी छाया बनकर रहने वाली रूपी सोरेन भी बुधवार को अनंत यात्रा पर निकल गईं। वे सिर्फ एक राजनेता की पत्नी नहीं थीं, बल्कि झारखंड आंदोलन के सबसे कठिन दौर की मूक साक्षी और शिबू सोरेन की सबसे बड़ी ताकत रही थीं। पिछले साल जब शिबू ​सोरेन का साथ छूटा तो वे भावनात्मक रूप से बिखर गई। खुद को तन्हा महसूस करने लगीं। इसका असर उनके स्वास्थ्य पर भी साफ दिखने लगा था। मुख्यमंत्री की जिम्मेदारियां और एक बेटे का संघर्ष पिछले कुछ महीने हेमंत सोरेन के लिए अग्निपरीक्षा की घड़ी रही। एक ओर शासन की बागडोर तो दूसरी तरफ अस्पताल के बिस्तर पर जिंदगी से जूझती मां। जब भी मां की तबीयत बिगड़ी, वे तुरंत हाजिर रहे। राजनीतिक कार्यक्रमों के तत्काल बाद वे सीधे अस्पताल पहुंचते। देर रात तक आईसीयू के बाहर डॉक्टरों से एक-एक मेडिकल रिपोर्ट पर चर्चा करते। सत्ता के शीर्ष पर बैठे एक मुख्यमंत्री के चेहरे के पीछे हर पल मां को खोने से डर से जूझता एक बेबस बेटा साफ नजर आता था।



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *