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अमेरिकी न्यूरोसाइंटिस्ट जेरेड कूनी हॉरवाथ का कहना है कि स्कूलों में स्क्रीन और डिजिटल टूल्स का बढ़ता इस्तेमाल बच्चों की सीखने की क्षमता और विकास को नुकसान पहुंचा रहा है। उनका दावा है कि आज के बच्चे अपनी उम्र में पिछली पीढ़ी के मुकाबले मानसिक रूप से कम सक्षम हो रहे हैं। हॉरवाथ ने अपनी किताब द डिजिटल डेल्यूजन में लिखा है कि करीब 2000 के बाद पश्चिमी देशों में आईक्यू स्कोर गिरने लगे, जबकि स्कूल में बिताया समय बढ़ता गया। उनका कहना है कि स्कूलों में लैपटॉप का इस्तेमाल खासकर 2010 से 2012 के बीच तेजी से बढ़ा। हॉरवाथ के मुताबिक अमेरिका में अब 88% स्कूलों में हर छात्र के लिए एक कंप्यूटर की व्यवस्था है। वहीं भारत के 65% स्कूलों में कम्प्यूटर की व्यवस्था है। पढ़ाई में पिछड़ रहे ज्यादा स्क्रीन देखने वाले बच्चे हॉरवाथ ने पीसा (प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टूडेंट असेसमेंट) के डेटा का हवाला दिया, जो हर तीन साल में 15 साल के बच्चों की पढ़ाई का आकलन करता है। पीसा के 2012, 2015 और 2018 के सर्वे में छात्रों से पूछा गया था कि वे स्कूल के दिन में डिजिटल डिवाइस कितनी देर इस्तेमाल करते हैं। हॉरवाथ के मुताबिक नतीजा साफ था। स्कूल में जितना ज्यादा स्क्रीन टाइम, स्कोर उतना ही नीचे। औसतन जो छात्र रोज 6 घंटे से ज्यादा कंप्यूटर इस्तेमाल करते थे, उनके स्कोर उन छात्रों से 66 पॉइंट कम थे, जो कम्प्यूटर इस्तेमाल नहीं करते थे। भारत में तकनीक शिक्षा बाजार 75 हजार करोड़ ब्रिटेन में तकनीक शिक्षा बाजार का सालाना कारोबार करीब 84 हजार करोड़ और अमेरिका में यह लगभग 38 लाख करोड़ रुपए का बड़ा उद्योग बन चुका है। इसके अलावा, भारत में तकनीक बाजार क्लासरूम बाजार का आकार भी करीब 75 हजार करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। शिक्षा तकनीकें सिर्फ बड़े वादों पर बेची गईं यूसीएल के प्रोफेसर रोज लकिन का कहना है कि कई शिक्षा तकनीकें (एडटेक) बड़े वादों पर बेची गई हैं, लेकिन हर तकनीक नुकसानदेह नहीं है। पीसा डेटा में स्कूल में डिवाइस का सीमित इस्तेमाल, न इस्तेमाल करने से बेहतर नतीजों से जुड़ा है। समस्या हैवी डेली यूज में है।
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रोज 6 घंटे कंप्यूटर इस्तेमाल से स्कोर 66 पॉइंट कम:न्यूरोसाइंटिस्ट के मुताबिक स्कूलों में बढ़ता स्क्रीन टाइम घटा रहा बच्चों की सीखने की क्षमता
