Headlines

लंबी हिरासत अकेले जमानत का आधार नहीं:हाईकोर्ट ने आरोपी की दूसरी याचिका की खारिज; 1.37 करोड़ के टैबलेट हुए बरामद




पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने 1.37 करोड़ से ज्यादा साइकोट्रोपिक टैबलेट बरामदगी के मामले में आरोपी की दूसरी नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने साफ कहा कि केवल लंबे समय तक जेल में रहना ही पिछली जमानत याचिका खारिज होने के बाद दोबारा जमानत मांगने का पर्याप्त आधार नहीं है। जब तक परिस्थितियों में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं आता, सिर्फ हिरासत की अवधि बढ़ने से आरोपी को नियमित जमानत का अधिकार नहीं मिल जाता। जस्टिस सुमीत गोयल ने कहा कि तथ्यों या कानून की स्थिति में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं होने पर लगातार हिरासत अपने आप नियमित जमानत का आधार नहीं बन सकती। 1.37 करोड़ से ज्यादा टैबलेट बरामद मामला दिसंबर, 2024 में एनसीबी अमृतसर में दर्ज किया गया था। आरोपी पर एनडीपीएस एक्ट की धारा 8, 22, 29, 61 और 85 के तहत केस दर्ज है। मामले में 1,37,11,610 साइकोट्रोपिक टैबलेट बरामद की गई थीं। इनमें अल्प्राजोलम, ट्रामाडोल और जोल्पिडेम टार्ट्रेट शामिल थे। इन टैबलेट का वजन स्ट्रिप्स समेत करीब 5,772 किलो था। बरामदगी कमर्शियल क्वांटिटी की थी। आरोपी की पहली नियमित जमानत याचिका हाईकोर्ट ने 11 फरवरी 2026 को आठ जुड़े मामलों के साथ मेरिट पर खारिज कर दी थी। इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दाखिल की, लेकिन 29 मई 2026 को उसे वापस लेने की अनुमति दे दी गई। आरोपी ने कहा- 3 जनवरी 2025 से जेल में दूसरी जमानत याचिका में आरोपी की ओर से कहा गया कि वह 3 जनवरी, 2025 से जेल में है। एनडीपीएस एक्ट के अनिवार्य प्रावधानों का पालन नहीं किया गया है। ट्रायल भी आगे नहीं बढ़ा और अब तक अभियोजन पक्ष के किसी गवाह की गवाही नहीं हुई है। आरोपी की ओर से यह भी दलील दी गई कि उसे सह-आरोपी के डिस्क्लोजर स्टेटमेंट के आधार पर मामले में जोड़ा गया है, जो अपने आप में स्वीकार्य नहीं है। कंपनी से जुड़े सभी रिकॉर्ड जांच एजेंसी को सौंपे जा चुके हैं और एनसीबी पहले ही शिकायत दाखिल कर चुकी है। कमर्शियल क्वांटिटी, जमानत पर रोक एनसीबी ने जमानत का विरोध करते हुए बरामदगी की भारी मात्रा और एनडीपीएस एक्ट की धारा 37 के तहत लगी पाबंदियों का हवाला दिया। जांच एजेंसी ने कहा कि आरोपी को जमानत मिलने पर उसके फरार होने या गवाहों को प्रभावित करने की आशंका है। हाईकोर्ट ने अपने पहले के फैसले रफीक खान बनाम हरियाणा सरकार का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि दूसरी या लगातार जमानत याचिका दाखिल की जा सकती है। लेकिन ऐसी याचिका में आरोपी को यह दिखाना जरूरी है कि पिछली याचिका खारिज होने के बाद परिस्थितियों में कोई महत्वपूर्ण बदलाव आया है। केवल दिखावटी या मामूली बदलाव पर्याप्त नहीं है। इस मामले में कोर्ट ने पाया कि आरोपी की दूसरी याचिका लगभग उन्हीं तथ्यों और आधारों पर दाखिल की गई है। जिन दलीलों को अब उठाया गया, वे पहली जमानत याचिका पर सुनवाई के समय भी उपलब्ध थीं। 7.5 महीने से ज्यादा अतिरिक्त जेल भी पर्याप्त नहीं कोर्ट के मुताबिक पहली जमानत याचिका खारिज होने के बाद आरोपी की हिरासत साढ़े सात महीने से ज्यादा और बढ़ी है। लेकिन केवल यह बदलाव इतना महत्वपूर्ण नहीं है कि कोर्ट अपने पहले के फैसले पर दोबारा विचार करे। कोर्ट ने बरामद नशीली दवाओं की प्रकृति और भारी मात्रा को देखते हुए कहा कि अतिरिक्त हिरासत अपने आप जमानत देने का आधार नहीं बन सकती। कोर्ट को पहली जमानत याचिका खारिज होने और सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी वापस लिए जाने के बाद कोई नई या ऐसी परिस्थिति नहीं मिली, जिससे दोबारा जमानत पर विचार जरूरी हो। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने दूसरी नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियों को मामले के अंतिम गुण-दोष पर राय नहीं माना जाएगा।



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *