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विराग गुप्ता का कॉलम:नागरिकों की जान बराबर तो फिर मुआवजों में अंतर क्यों?




अब जब धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है और प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ दर्ज एफआईआर भी रद्द की गई हैं तो कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा पेपर-लीक से आत्महत्या करने वाले 21 छात्रों को एक करोड़ रुपए के मुआवजे की मांग अटक सकती है। रेप विक्टिम, एसिड अटैक, सीवर लाइन में मौत, साइबर फ्रॉड जैसे मामलों में मुआवजे के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले हैं। दुर्घटना में घायल होने वालों और मृतकों के मुआवजे के लिए कानून हैं। वीडियो मैसेज में प्रधानमंत्री ने युवाओं के आक्रोश को स्वीकारा है। अन्याय और कुशासन के खिलाफ जेन-जी के आंदोलन को गवर्नेंस में बेहतरी और सरकारी जवाबदेही से नियंत्रित किया जा सकता है। संविधान में नागरिकों को समान अधिकार हैं और एक देश एक कानून के नारे पर जोर है। ऐसे में तंत्र की विफलता और अन्याय से पीड़ित लोगों को समान मुआवजा देने की अपेक्षा से जुड़े 4 पहलुओं को समझें : 1. राहुल गांधी ने पिछले 10 सालों में 152 परीक्षाओं में पेपर-लीक का आरोप लगाया है। इसका सामना करने के बजाय भाजपा नेता विपक्ष-शासित राज्यों में परीक्षा माफिया के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार 2014 से 2024 के दौरान लगभग 1.23 लाख छात्रों ने अलग-अलग कारणों से आत्महत्या की थी। ऐसे में क्या सभी मामलों में एक करोड़ रुपए का मुआवजा दिया जाएगा? 2. सांड के हमले से मृत एक व्यक्ति के परिवार को हाईकोर्ट जज ने 29.32 लाख मुआवजा दिलवाने का आदेश दिया था, जिसे डिवीजन बेंच ने रद्द कर दिया। दुर्घटना के 20 साल बाद, सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस करोल की पीठ ने मानवीय आधार पर 15 लाख रुपए मुआवजा देने का फैसला दिया। दूसरे मामले में जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने सड़क दुर्घटना में घायल 6 महीने की बच्ची के लिए मुआवजे को 45.40 लाख से बढ़ाकर 83.38 लाख कर दिया। उनके अनुसार मानवीय गरिमा और जीवन के अधिकार के प्रति जजों को संवेदनशील रहना चाहिए। एक रिपोर्ट के अनुसार महानगरों में 58 फीसदी से ज्यादा सड़क हादसे आवारा कुत्तों और मवेशियों की वजह से हो रहे हैं। तब तो मवेशियों की वजह से घायल, मरने वालों और फसल नुकसान के सभी मामलों में भी पीड़ितों और किसानों को मुआवजा मिलना चाहिए। 3. सरकारी आंकड़ों के अनुसार कोरोना से लगभग 4.5 करोड़ लोग बीमार हुए और 5.33 लाख मौतें हुईं। 2015 के कानून में बाढ़, सूखा और भूकम्प जैसी आपदा में मरने वालों के परिजनों के लिए 4 लाख के मुआवजे का प्रावधान किया गया था। कोरोना संकट से निपटने के लिए आपदा प्रबंधन कानून लागू हुआ था, लेकिन उसके अनुसार मुआवजा नहीं मिला। 2020-21 के लॉकडाउन की वजह से 989 मृतकों को भी मुआवजा नहीं मिला। खबरों के अनुसार नोटबंदी के दौरान 105 लोग मरे थे, पर उन्हें भी मुआवजा नहीं मिला। पानी-हवा के प्रदूषण से मरने वालों को मुआवजे के लिए व्यावहारिक कानून नहीं हैं। 4. पुलिस लॉकअप में आधे घंटे की अवैध हिरासत के मामले में 2023 में दिल्ली हाईकोर्ट ने 50 हजार रुपए मुआवजे का आदेश दिया था। सजा खत्म होने के बावजूद जेल में रखने के मामले में 2022 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 3 लाख रुपए मुआवजे का आदेश दिया था। दिल्ली सरकार की योजना के अनुसार जेल में अप्राकृतिक मौत (फांसी लगाकर या उत्पीड़न से) पर 7.5 लाख का मुआवजा मिलेगा। जेलों में बंद दो तिहाई कैदी वंचित वर्ग से हैं। ऐसे लाखों लोगों को मुकदमे में रिहाई के बावजूद गैर-कानूनी गिरफ्तारी के लिए मुआवजा नहीं मिलता। केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को पूरे देश में लागू करवाने की खासी जरूरत है। कोरोना संकट से निपटने के लिए आपदा प्रबंधन कानून लागू हुआ था, लेकिन उसके अनुसार मुआवजा नहीं दिया गया है। 2020-21 के कोविड लॉकडाउन की वजह से 989 मृतकों को भी मुआवजा नहीं मिला है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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