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दुर्लभ बीमारियों की सीरीज ‘ऐ जिंदगी’ में आज कोलकाता के जगदीशपुर में रहने वाले 31 साल के सुभजीत कर्माकर का दर्द। भास्कर रिपोर्टर नीरज झा ने ये पूरी कहानी सुनी और उन्हीं की जुबानी हू-ब-हू आपके सामने रख दी… ‘6 मार्च 2022 की शाम। कोलकाता के एक बैंक्वेट हॉल में हमारी शादी की पार्टी चल रही थी। मेहमानों की भीड़ थी। सभी बधाइयां दे रहे थे, फोटो खिंचवा रहे थे। कोई लिफाफा दे रहा था, तो कोई गिफ्ट। सामने पूरा परिवार, रिश्तेदार और दोस्त गानों की धुन पर झूम रहे थे। इसी बीच, मेरे पेट में तेज दर्द उठा। जैसे-जैसे समय बीत रहा था, दर्द बढ़ता जा रहा था। मुझे सिर्फ बर्दाश्त करना था, न करता तो सभी का मजा खराब हो जाता। रात करीब 1 बजे पार्टी खत्म हुई। 2 बजे हम घर पहुंचे। अपने कमरे में जाते ही मैं दर्द के मारे पलंग पर गिर पड़ा। मैं पसीना-पसीना था। पत्नी घबरा गई। बार-बार पूछने लगी- क्या हुआ? मैंने कराहते हुए कहा- दर्द बहुत तेज है। अलमारी में दवा रखी है, दे दो। पत्नी ने फौरन टेबलेट निकाली और दे दी। मैंने दवा तो खा ली, लेकिन असर नहीं हुआ। पूरी रात छटपटाते हुए कभी बिस्तर पर लेटता, तो कभी कमरे में टहलता। मेरी शादी की पहली रात ऐसे ही बीत गई। सुबह 7 बजते ही हम दोनों डॉक्टर के पास पहुंचे। उन्होंने सीटी स्कैन कराने को कहा। रिपोर्ट देखी तो डॉक्टर बोले- ‘फैटी लिवर है। इसी वजह से दर्द हो रहा है। उबला और हल्का खाना खाइए। उन्होंने कुछ दवाइयां दीं, कहा- आराम हो जाएगा। दो-तीन दिन तो राहत मिली, लेकिन कुछ खाते ही गले में अजीब सा दर्द होता। ऐसा लगता, जैसे- गले में कोई खुरदरी चीज रगड़कर नीचे जा रही हो। हर निवाले के साथ दर्द और जलन बढ़ती जा रही थी। हफ्तेभर बाद फिर तेज दर्द उठा। खड़ा होना, बैठना, यहां तक कि सांस लेना मुश्किल हो गया। हम दोनों बिना देर किए दूसरे डॉक्टर के पास पहुंचे। डॉक्टर ने कई जांचें कराईं और बताया कि मेरी बड़ी आंत 6-7 जगह से फट गई है। तुरंत ऑपरेशन कराना होगा। सर्जरी में देरी हुई तो इंफेक्शन फैल जाएगा। जान को भी खतरा हो सकता है। दो दिन बाद हम हनीमून के लिए मनाली जाने वाले थे। लेकिन सारा प्लान धरा का धरा रह गया। डॉक्टर के केबिन से बाहर निकलते हुए मेरी नजर पत्नी मोमिता पर पड़ी। वह चुप थी, लेकिन उसकी आंखों में घबराहट साफ नजर आ रही थी। बीमारी से कहीं ज्यादा डर उसके टूटते सपनों का था। तभी पत्नी ने मेरा हाथ कसकर पकड़ा और बोली- जब सर्जरी ही एकमात्र रास्ता है, तो फौरन करवा लो। घूमने कभी और चलेंगे। सर्जरी का खर्च 5 लाख रुपए था। शादी में ही 15-20 लाख रुपए खर्च हो चुके थे। सेविंग्स भी काफी कम बची थी, इसलिए दोस्तों से पैसे उधार लेकर अस्पताल में जमा कराए। मुझे तुरंत ऑपरेशन थिएटर ले गए। एनेस्थीसिया दिया। रात में जब होश आया, तो सबसे पहले नजर छाती और पेट पर पड़ी। पेट खुला हुआ था, उसे कवर करने के लिए एक बैग जैसा कुछ लगा था। मैंने देखते ही डॉक्टर से पूछा- क्या सर्जरी पूरी नहीं हुई? पेट में ये क्या लगा दिया। उन्होंने बताया कि आंतों के साथ-साथ भोजन नली भी फट गई थी, इसलिए उसकी भी सर्जरी करनी पड़ी। आंत को जोड़ने के लिए पहले सर्जिकल स्टेपल लगाए। फिर मेडिकल स्यूचर (टांके) लगाए, लेकिन अंदर की परत इतनी पतली हो गई थी कि टांके टिक ही नहीं पाए। आंतें बार-बार फट रही थीं। आंतों पर दबाव न पड़े, इसलिए पेट पर स्टूल बैग लगाया है। इससे ही स्टूल यानी पॉटी पास होगी। जब तक अंदरूनी घाव भर नहीं जाता, तब तक खाना भी फीडिंग ट्यूब से दिया जाएगा। चार-पांच महीने में घाव सूख जाएंगे। तब पेट और भोजन नली की सर्जरी होगी। हॉस्पिटल का खर्च बहुत ज्यादा था, इसलिए घर आ गया। हर रोज एक नर्स घर आकर ड्रेसिंग करती थी। उसमें हर दिन 3-5 हजार रुपए खर्च होते थे। 5 महीने बाद यानी 15 अगस्त को मैं डॉक्टर को दिखाने गया। उन्होंने घाव देखकर कहा- अब टांके लग सकते हैं। दोबारा भर्ती हो जाओ। इसबार सर्जरी का खर्च 30 लाख रुपए था। ये सुनते ही मैं घबरा गया। 5 महीने से बेड पर था। कोई कमाई नहीं थी। आखिर कहां से लाता इतने पैसे। तब पत्नी ने कहा कि वो अपने सारे जेवर बेच देगी। दोस्तों ने भी क्राउडफंडिंग के जरिए 10 लाख रुपए जुटाए। बाकी रकम का इंतजाम उधार लेकर किया। डॉक्टर ने सर्जरी की। भोजन नली और पेट की सर्जरी करके टांके लगाए। एक-दो दिन बाद वॉशरूम गया, तो नेचुरल रास्ते से स्टूल पास हुआ। तब मोमिता अस्पताल में नहीं थी। मैंने मैसेज कर उसे बताया कि अब मैं ठीक हो गया हूं। करीब दो घंटे बाद हॉस्पिटल के स्टाफ ने पूछा- खाने में कुछ लोगे। मैंने सूप ऑर्डर किया। जैसे ही सूप पिया, छाती के ऊपर कुछ गिला-गिला सा महसूस हुआ। मैं हैरान रह गया। सूप पिया मुंह से, ये पेट और छाती पर कहां से आ गया। नर्स ने तुरंत डॉक्टर को बुलाया। डॉक्टर ने स्टाफ से कहा- ऑपरेशन थिएटर में ले चलो। टांके खुल गए हैं। आंत फट गई है, इसलिए तुरंत सर्जरी करनी होगी। डॉक्टरों ने दोबारा ऑपरेशन किया, लेकिन शरीर के टिशू इतने कमजोर हो चुके थे कि टांके टिक ही नहीं पाए। तमाम कोशिशों के बावजूद, उन्हें सर्जरी बीच में ही छोड़नी पड़ी। जब होश आया, तो देखा पेट पहले की तरह खुला था। आंतें दिख रही थीं। बाद में एक खास बैग (वूंड मैनेजमेंट बैग) मेरे पेट पर लपेट दिया, ताकि इंफेक्शन न हो। मेरी हालत बिगड़ती जा रही थी। ब्लड प्रेशर गिरकर 45/80 तक पहुंच गया। डॉक्टर ने पत्नी से कह दिया कि बचने की उम्मीद कम है। कुछ भी हो सकता है। हालांकि पत्नी और पापा दोनों ने उम्मीद नहीं छोड़ी। कोलकाता के कई बड़े अस्पतालों में रिपोर्ट दिखाई। सबका यही कहना था कि ऐसे मामलों में सिर्फ 20-30 परसेंट लोग ठीक हो पाते हैं। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई न जाने कितने शहरों के डॉक्टरों को कॉल किया। केस समझाया, लेकिन सबने मना कर दिया। आखिर में हैदराबाद के AIG अस्पताल के डॉक्टरों को रिपोर्ट भेजी। उन्होंने कहा- वादा नहीं कर सकते, लेकिन पूरी कोशिश करेंगे। इसके बाद हम हैदराबाद पहुंच गए। करीब 30 दिनों तक जांच हुई। एक डॉक्टर ने मेरी स्किन देखकर कहा- जेनेटिक टेस्ट कराना होगा। 5 दिन बाद पता चला कि मुझे वैस्कुलर एह्लर्स-दानलोस सिंड्रोम (vEDS) है। डॉक्टर बोले- इसी बीमारी की वजह से आंतें बार-बार फट रही है। टांके भी खुल रहे हैं। इसके बाद 14 डॉक्टरों की टीम ने 8 घंटे सर्जरी की। ऑपरेशन कामयाब रहा, लेकिन साढ़े तीन महीने तक अस्पताल में रहना पड़ा। पैसे खत्म हो गए। पापा ने मजबूरी में 3.5 बीघा जमीन सिर्फ 50 लाख रुपए में बेच दी, जिसकी कीमत आज 4 करोड़ से ज्यादा है। तीन बार सर्जरी और अस्पताल के तमाम खर्चे मिलाकर अब तक करीब सवा करोड़ रुपए लग चुके हैं। मुझपर अब भी 8 लाख रुपए का कर्ज है। एक सर्जरी बाकी है, जिसमें 50 लाख रुपए और लगेंगे। तब तक स्टूल बैग लगाकर रहना पड़ेगा। इस बीमारी ने मुझसे सुहागरात, रोमांस, हनीमून… सब छीन लिया। हर हफ्ते हॉस्पिटल जाना, चेकअप करवाना, ड्रेसिंग कराना, यही मेरी जिंदगी है। सब खो चुका हूं, लेकिन जीने की हिम्मत है। खुद को संभालने के लिए किताबें पढ़ता हूं। लेकिन बीमारी से पहले मेरी जिंदगी ऐसी नहीं थी। 2016 में कंप्यूटर साइंस से बीटेक करने के बाद मैं नौकरी के लिए बेंगलुरु चला गया था। सब ठीक चल रहा था, तभी कोरोना के कारण कोलकाता लौटना पड़ा। यहीं से वर्क फ्रॉम होम करता रहा। फिर 2022 में मोमिता से लव मैरिज कर ली। हम दोनों एक-दूसरे को बचपन से जानते थे। साथ पढ़े थे। शायद, इसलिए मुश्किल वक्त में भी वो मेरा हाथ थामे हुए है। बीमारी की वजह से नौकरी छूटी, लेकिन मोमिता ने मुझे हौसला दिया। आखिर मुझे एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी मिल गई है, जिससे अब घर खर्च चल रहा है। हालांकि, मुझे उसकी बहुत चिंता होती है। सोचता हूं, उस पर क्या बीतती होगी। रिश्तेदार भी उसे ताने देते हैं। कहते हैं- कैसी किस्मत लेकर आई है। शादी होते ही पति को अस्पताल पहुंचा दिया। अगर मुझे अपनी बीमारी के बारे में कुछ भी पता होता तो शादी न करता। कम से कम मेरे साथ उसकी जिंदगी तो न बर्बाद होती। मैंने उससे कई बार कहा, तुम चाहो तो दूसरी शादी कर लो। वो हमेशा मना कर देती है। इस बीमारी से पहले मैं हर दिन जिम जाता था, दौड़ता था। वजन भी 72 किलो था, लेकिन बीमारी के कारण घटकर 37 किलो रह गया है। मेरी पुरानी फोटो देखकर कोई पहचान भी नहीं पाएगा।’ सुभजीत अपना दर्द बयां कर रहे थे, तभी कमरे में एक बुजुर्ग आते हैं। सुभजीत बताते हैं- ये मेरे पापा हैं। इनका नाम रवींद्र नाथ कर्मकार हैं। रवींद्र बेटे की ओर देखते हुए कहते हैं- जब यह पांच साल का था, तभी इसकी मां गुजर गई। दो साल बाद बड़े बेटे को तेज बुखार आया था और अचानक उसकी मौत हो गई। आज तक पता नहीं चला कि उसकी मौत किस बीमारी से हुई। तब मैं कोलकाता में बाटा इंडिया में क्लर्क था। पत्नी के जाने के बाद घर में सुभजीत की देखभाल करने वाला कोई नहीं बचा, इसलिए नौकरी छोड़नी पड़ी। शादी के बाद जब इसकी बीमारी सामने आई और एक के बाद एक सर्जरी होने लगी, तो मन घबराने लगा। भगवान से यही प्रार्थना करता हूं कि किसी तरह मेरा बेटा ठीक हो जाए। सुभजीत की कहानी सुनने के बाद भास्कर रिपोर्टर नीरज झा कोलकाता स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हेल्थ के जेनेटिक डिपार्टमेंट पहुंचे। वहां डिपार्टमेंट हेड डॉ. दिपांजना दत्ता से मुलाकात की। डॉ. दत्ता को सुभजीत की बीमारी के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि एह्लर्स-दानलोस सिंड्रोम (EDS) का ही एक प्रकार ‘वैस्कुलर EDS’ है। यह एक जेनेटिक बीमारी है। शरीर के COL3A1 जीन में खराबी के कारण सही मात्रा या गुणवत्ता में ‘कोलेजन’ नहीं बन पाता। जैसे घर को जोड़ने और मजबूत बनाने के लिए सीमेंट की जरूरत होती है, वैसे ही शरीर की कोशिकाओं और अंगों को मजबूती देने के लिए कोलेजन नाम का प्रोटीन जरूरी है। इस बीमारी में त्वचा बहुत पतली, लचीली और नाजुक हो जाती है। ब्लड प्रेशर थोड़ा सा भी बढ़ने पर नसों के फटने का खतरा रहता है। वैस्कुलर EDS में आंतें फट जाती हैं। इस बीमारी में मांसपेशियां और टिशू इतने पतले हो जाते हैं कि कागज की तरह फटने लगते हैं। सर्जरी के दौरान या बाद में टांके टिक नहीं पाते। घाव देरी से भरते हैं। बचपन में इस बीमारी के लक्षण साफ नजर नहीं आते। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, शरीर लचीला होने लगता है। पाचन से जुड़ी समस्याएं बढ़ जाती हैं। उम्र के साथ-साथ यह बीमारी पूरे शरीर में फैलकर जानलेवा रूप ले लेती है। यह बीमारी माता-पिता से बच्चे में ऑटोसोमल डॉमिनेंट पैटर्न के जरिए आती है। हमारे शरीर में हर जीन की दो कॉपी होती हैं। एक कॉपी मां और दूसरी पिता से मिलती है। ‘डॉमिनेंट’ बीमारी का मतलब है कि अगर बच्चा माता या पिता में से किसी एक से प्रभावित COL3A1 जीन लेता है, तो उसे यह बीमारी हो सकती है। यदि माता या पिता में से किसी एक को ‘वैस्कुलर EDS’ है, तो उनके हर बच्चे में यह बीमारी ट्रांसफर होने का खतरा 50 प्रतिशत रहता है। दुनिया भर में लगभग 2 लाख लोगों में से केवल 1 व्यक्ति को यह बीमारी होती है। वर्तमान में इसकी कोई जीन थेरेपी या स्थायी इलाज नहीं है। ——————————————————– ऐ जिंदगी सीरीज की यह खबर भी पढ़ें… 1- सिर से जुड़ीं दो बहनें अब अलग नहीं होना चाहतीं: सलमान खान ने बहन बनाया, इलाज का वादा किया, अब फोन तक नहीं उठाते ये हैं सबा और फरहा। उम्र 24 साल। दोनों का जन्म एक दिन, एक समय और एक ही मां की कोख से हुआ, सो ये जुड़वां कहलाती हैं। लेकिन… इनके जिस्म अलग-अलग नहीं, सिर से आपस में जुड़े हैं। वो भी इस तरह कि दोनों एक दूसरे को देख नहीं सकतीं। आईने में भी नहीं, अगर एक का रुख आईने की तरफ होता है तो दूसरी का उसके उलट। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें… 2- चेहरे पर मांस के लोथड़े देख लोग कहते हैं भूत: शक्ल देखकर 5 लोग गड्ढे में जा गिरे, मां बोली-मरेगा तभी बला टलेगी ऊपर आपने जो तस्वीर देखी, उनका नाम है मिथुन चौहान। उम्र 29 साल। जो भी इन्हें पहली बार देखता है, डर जाता है। भूत कहता है या जानवर। दुर्लभ बीमारियों की सीरीज ‘ऐ जिंदगी’ के लिए इस बार इन्हीं की तलाश है। मैं नीरज झा इसी तलाश में पहुंचा 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शादी के दिन आंतें फटीं, 5 महीने खुला रहा पेट:सूप पिया तो छाती से बह निकला, हनीमून पर भी नहीं जा पाया
