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सब ठीक हो जाएगा, हमेशा पॉजिटिव सोचो, रोने से क्या होगा। मुश्किल दौर से गुजर रहे व्यक्ति से लोग अक्सर यही कहते हैं। मनोवैज्ञानिक इसे ‘टॉक्सिक पॉजिटिविटी’ कहते हैं। अमेरिका में ड्यूक यूनिवर्सिटी की मनोविशेषज्ञ केट बॉलर कहती है कि हर दुख-दर्द पर सकारात्मकता का मरहम लगाना इंसान को मजबूत नहीं, बल्कि अकेला कर सकता है। बॉलर बताती हैं कि यह ‘टॉक्सिक पॉजिटिविटी’ है। यह वास्तविक भावनाओं को स्वीकारने की बजाय उसे छुपाने की सोच है। बॉलर का कहना है कि आजकल सोशल मीडिया और ‘मजबूत बनो’ की सोच ने ऐसा माहौल बना दिया है, जहां दुख, डर और असफलता व्यक्त करना कमजोरी माना जाने लगा है, जबकि कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं, जिन्हें ‘सकारात्मक सोच’ से बदला नहीं जा सकता है। दुख को खारिज करना सकारात्मकता नहीं है, बल्कि यह खुद को धोखा देना है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक प्रो. जेम्स ग्रॉस के शोध के अनुसार, यदि व्यक्ति अपनी नकारात्मक भावनाओं को लगातार दबाता है, तो तनाव बढ़ता है। रिश्तों पर असर पड़ता हैं और मानसिक सेहत पर खराब असर पड़ता है। वहीं, टेक्सास यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक प्रो. क्रिस्टिन नेफ कहती हैं कि मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए अपने दुख को स्वीकार करना जरूरी है। खुद को हर समय मजबूत और खुश दिखाने का दबाव व्यक्ति में अपराधबोध बढ़ा सकता है। येल यूनिवर्सिटी की मनोवैज्ञानिक प्रो. सुसान डेविड कहती हैं, ‘दुख की भावनाएं गलत नहीं हैं। उन्हें दबाने के बजाय समझना, स्वीकारना मानसिक लचीलापन बढ़ाता है।’ उनके अनुसार, मानसिक मजबूती का मतलब हर वक्त मुस्कुराना नहीं, बल्कि यह स्वीकार करना है कि इंसान होने का मतलब कभी-कभी टूटना भी है। अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन और कई शोध बताते हैं कि सोशल मीडिया पर लगातार दूसरों की ‘परफेक्ट लाइफ’ देखने से तुलना, कुछ छूट जाने की चिंता और खुद पर संदेह बढ़ सकता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि कठिन समय में ऑनलाइन तुलना करने के बजाय भरोसेमंद लोगों से खुलकर बात करें। दुख को कमजोरी न मानें, भावनाओं को खुलकर व्यक्त करें मनोवैज्ञानिक शोधों से पता चलता है कि लोग वास्तविक और नकारात्मक भावनाओं को छिपाने का प्रयास करते हैं। विज्ञान मैगजीन ‘साइंस डायरेक्ट’ में प्रकाशित 61 अलग-अलग अध्ययनों के विश्लेषण में पाया गया कि जो लोग भावनाओं को दबाने का अधिक प्रयास करते हैं, उनमें अचानक घबराहट और चिंता होने की संभावना अधिक होती है। मनोवैज्ञानिक प्रो. जेम्स ग्रॉस कहते हैं कि टॉक्सिक पॉजिटिविटी से उबरने के लिए जरूरी है कि दुख को कमजोरी न मानें। भावनाओं को व्यक्त करें। किसी दुखी व्यक्ति को ‘उम्मीद रखो’ कहने के बजाय उसकी बातों को सुनें।
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टॉक्सिक पॉजिटिविटी; मनोवैज्ञानिक बोले- हमेशा खुश रहने का दबाव घातक:दुख को छिपाने-दबाने की कोशिश से तनाव बढ़ता है, मानसिक सेहत के लिए खतरनाक
