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अध्ययनों के आधार पर छुट्टी को कारगर बनाने के उपाय:छुट्टी लें तो ईमेल, मैसेज व नोटिफिकेशन से बनाएं दूरी; तब दिमाग रिकवर होगा




‘खाओ, सोओ, उठो, काम करो और फिर सो जाओ।’ यह चक्र हमें थका देता है, तब छुट्टियां लेते हैं या साप्ताहिक छुट्‌टी का इंतजार करते हैं, लेकिन जब छुट्टी से फिर काम पर लौटते हैं, तो अक्सर लोग यह कहते हैं- ‘लगता ही नहीं कि छुट्टियों पर गए थे।’ काम में थकान महसूस होती है। ऐसा क्यों होता है। ब्रिटिश लेखक जॉनी थॉमसन ने अलग-अलग अध्ययनों के आधार पर तीन प्रमुख कारण बताए हैं- पहला – छुट्टी को ‘काम से दूरी’ या ‘भविष्य की तैयारी’ समझना। हम छुट्टियों को केवल ‘काम से ब्रेक’ या ‘अगले काम के लिए रिचार्ज’ मानते हैं। जर्मन दार्शनिक जोसेफ पाइपर ने किताब ‘लेज्योर: द बेसिक कल्चर’ में बताया था कि आजकल की जीवनशैली और संस्कृति ने आराम के महत्व को खो दिया है। हम छुट्टियों को भविष्य की उत्पादकता के लिए तैयारी मानते हैं, न कि एक मूल्यवान चीज। दूसरा – लंबे समय तक काम करना और फिर एक लंबी छुट्टी लेना। 2025 में मेडिकल जर्नल मेडिकल ‘क्यूरियस’ में प्रकाशित एस. गिरिधरन के अध्ययन के अनुसार, एक या दो बार 1-2 हफ्ते की छुट्टी लेने और बाकी समय काम करते रहने से आराम नहीं मिल पाता है। शरीर व दिमाग थकता है और एक लंबी छुट्टी थकान को पूरी तरह नहीं मिटा पाती। तीसरा – छुट्टियों के दौरान भी काम से जुड़े रहना और कोई शारीरिक काम नहीं करना। छुट्टी पर भी ईमेल चेक करना, ऑफिस के कॉल उठाना, नोटिफिकेशन चालू रखना। घर में पड़े रहना। बिना किसी सक्रियता या नए अनुभव के समय बिता देने से दिमाग को वास्तविक आराम नहीं मिलता। जरूरी है कि छुट्टी लें तो मेल, मैसेज से दूर ही रहें। समाधान – ब्रिटेन के नेशनल हेल्थ ट्रस्ट के सदस्य एस. गिरिधरन ने बताया कि अक्सर छोटी-छोटी छुट्टियां लेना बेहतर है। हर 2-3 महीने में 2-3 दिन का ब्रेक लें। दोस्तों से मिलें या किसी नए शहर की यात्रा करें। इससे शरीर और दिमाग को बार-बार रिकवरी का मौका मिलता है। जब छुट्टी हो, तो 100% छुट्टी मनाएं। ज्यादा काम से जीवन निराशाजनक लगने लगता है एस. गिरिधरन और अन्य के अध्ययन में कहा गया है कि जब हम आराम नहीं करते हैं, तो हमारी एकाग्रता, हिसाब-किताब करने, याद रखने और दुनिया को सही तरीके से समझने की क्षमता कम हो जाती है। मांसपेशियां ठीक से नहीं सुधरतीं और दिल तेजी से धड़कता है। मनोवैज्ञानिक स्तर पर हमेशा ‘ऑन’ रहने और ज्यादा काम करने से जीवन निराशाजनक लगने लगता है। यह थकान, अवसाद और मानसिक तनाव की ओर ले जाता है।



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