6 घंटे पहले
- कॉपी लिंक

आज (25 जुलाई) आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी है। इस एकादशी को हरिशयनी, पद्मा और आषाढ़ी एकादशी भी कहते हैं। मान्यता है कि इसी तिथि से भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। भगवान के शयन के साथ ही चातुर्मास शुरू होते हैं, जो कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी (20-21 नवंबर) तक चलता है। इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और अन्य शुभ संस्कार नहीं किए जाते, जबकि पूजा-पाठ, जप, तप, दान और आध्यात्मिक साधना का विशेष महत्व माना जाता है। अब विष्णु जी विश्राम करेंगे और शिव जी सृष्टि का संचालन करेंगे।
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, शास्त्रों में भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनकर्ता बताया गया है। इसलिए उनके योगनिद्रा में जाने के बाद मांगलिक कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त नहीं रहते हैं। मान्यता है कि भगवान की उपस्थिति के बिना किए गए शुभ कार्य पूर्ण फल नहीं देते, इसलिए चार माह तक इन आयोजनों को टालने की परंपरा चली आ रही है। देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु के विश्राम के बाद भगवान शिव सृष्टि का भार संभालते हैं।
चातुर्मास में कौन-कौन से काम करें
देवशयनी एकादशी के साथ शुरू होने वाला चातुर्मास में भजन-कीर्तन, सत्संग, कथा, भागवत पाठ, हवन, मंत्र जप और भगवान की भक्ति करने से विशेष पुण्य मिलने की मान्यता है। धर्म-कर्म के साथ ही इन दिनों में संयमित जीवन, सात्विक भोजन और सेवा-भाव पर ध्यान देना चाहिए। जरूरतमंद लोगों की सहायता, अन्न और वस्त्र का दान भी करें।
इन दिनों में आत्मचिंतन और जीवन में अनुशासन अपनाना चाहिए। वर्षा ऋतु के दौरान पहले के समय में संत-महात्मा और साधु एक ही स्थान पर रहकर साधना करते थे। इसी कारण इस अवधि को स्थिर होकर भक्ति और आध्यात्मिक अभ्यास करने का समय माना गया। आज भी कई श्रद्धालु इन चार महीनों में खान-पान और जीवनशैली में संयम रखने का संकल्प लेते हैं।
चातुर्मास से जुड़ी पौराणिक कथा
भगवान विष्णु के चार माह के शयन से जुड़ी एक प्रमुख पौराणिक कथा भी प्रचलित है। कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर दानवीर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी थी। राजा बलि ने बिना किसी संकोच के यह दान देना स्वीकार कर लिया। इसके बाद भगवान वामन ने पहले चरण में पृथ्वी, आकाश और दिशाओं को नाप लिया, दूसरे चरण में स्वर्ग लोक को अपने अधिकार में कर लिया। तीसरे चरण के लिए जब कोई स्थान नहीं बचा तो राजा बलि ने अपना सिर भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया।
राजा बलि की दानवीरता और समर्पण भावना से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का राजा बना दिया। तब राजा बलि ने भगवान से अपने साथ रहने का वरदान मांगा। भक्त की इच्छा पूरी करने के लिए भगवान विष्णु चार महीने तक पाताल लोक में निवास करने लगे। इसी घटना को भगवान के शयन काल से जोड़ा जाता है।
कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी (20-21 नवंबर) पर भगवान विष्णु की योगनिद्रा पूरी हो जाती है और चातुर्मास भी खत्म होते हैं। इसी दिन से विवाह, गृह प्रवेश, उपनयन और अन्य मांगलिक कार्यों के लिए फिर से शुभ मुहूर्त शुरू हो जाते हैं। इस वर्ष देवउठनी एकादशी तिथियों की घट-बढ़ की वजह से 20 और 21 नवंबर को रहेगी।
देवशयनी एकादशी पर करें ये शुभ काम
देवशयनी एकादशी पर स्नान के बाद घर के मंदिर की साफ-सफाई करनी चाहिए। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। इसके बाद पीले फूल, तुलसी दल, पंचामृत, फल और मिठाई अर्पित कर घी का दीपक जलाया जाता है। विष्णु सहस्रनाम, विष्णु चालीसा या “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करने की भी परंपरा है। श्रद्धा के अनुसार निर्जल या फलाहार व्रत रखा जाता है और शाम को आरती के बाद जरूरतमंद लोगों को दान देने का विशेष महत्व माना गया है। अगले दिन यानी द्वादशी तिथि पर भी सुबह जल्दी उठें और पूजा-पाठ के बाद जरूरतमंद लोगों को भोजन कराएं, इसके बाद स्वयं भोजन करें। इस तरह एकादशी व्रत पूरा होता है।
इस बार देवशयनी एकादशी शनिवार को पड़ रही है, इसलिए शनि पूजा का भी विशेष संयोग बन रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन शनिदेव को सरसों का तेल और काले तिल अर्पित करने के साथ “ॐ शं शनैश्चराय नमः” मंत्र का जाप करना शुभ माना जाता है। श्रद्धालु भगवान विष्णु की आराधना के साथ शनिदेव का पूजन भी कर सकते हैं।

