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कुछ तारीखें अविस्मरणीय बन जाती हैं, इसलिए नहीं कि उस दिन कुछ खास घटित हुआ था बल्कि इसलिए कि वे समाज में नेकी का एहसास कराती हैं। 20 जुलाई ऐसी ही एक तारीख है। आप यह पढ़कर जो घटनाक्रम याद कर रहे हैं, उस पर मैं बाद में आऊंगा। लेकिन उससे पहले मैं आपको आईआईटी कानपुर में 20 जुलाई 2024 के दिन पर लेकर चलता हूं। दरअसल, इस कहानी की शुरुआत बहुत पहले हुई थी। इसके बीज पद्मश्री से सम्मानित और फिजिक्स के जाने-माने शिक्षक प्रो. एच.सी. वर्मा ने बोए थे, जो मानते थे कि कोई छोटा-सा योगदान भी असाधारण बदलाव ला सकता है। आईआईटी कानपुर में प्रोफेसर एमेरिटस रहे प्रो. वर्मा ने 1994 से 2017 तक वहां फिजिक्स पढ़ाई और बाद में कैंपस के ऑपर्च्युनिटी स्कूल में स्पेशल एडवाइजर के तौर पर सेवा दी। 1964 में स्थापित यह स्कूल समीप ही रहने वाले कैंपस के सपोर्टिंग स्टाफ और आसपास के जरूरतमंद परिवारों के बच्चों को मुफ्त शिक्षा देता आ रहा है। इनमें से कई बच्चे भूखे स्कूल आते थे। कुछ असेंबली में बेहोश हो जाते थे। कुछ का पढ़ाई में मन नहीं लगता या वे स्कूल ही नहीं आते थे, क्योंकि भूखे पेट पढ़ाई नामुमकिन है। प्रो. वर्मा इसे बदलना चाहते थे। उनके मन में एक एनजीओ के जरिए बच्चों को पौष्टिक भोजन मुहैया कराने का विचार पहली बार 2017 में आया, लेकिन फंडिंग को लेकर मतभेद के कारण सिरे नहीं चढ़ पाया। 2024 में यह विचार फिर चर्चा में आया तो दूसरी बाधा थी कि एनजीओ ने जितने स्टूडेंट मांगे, उतने स्कूल में थे ही नहीं। लेकिन हार मानने के बजाय आईआईटी समुदाय ने खुद रास्ता खेाजा। एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के असिस्टेंट प्रोफेसर टी.के. गुहा, जो हॉल-5 के वार्डन भी थे, ने मेस मैनेजर अंशु जोशी के साथ मिलकर एक सरल-सा समाधान निकाला कि हॉल-5 का हर स्टूडेंट अपनी पॉकेट मनी से हर हफ्ते सिर्फ 5 रुपए देगा। और 20 जुलाई 2024 को बच्चों को पहला भोजन परोसा गया। जो शुरुआत में छोटा-सा प्रयोग लग रहा था, जल्द ही एक मुहिम बन गई। नवंबर 2024 तक हॉल 1, 3 और 8 के साथ गर्ल्स हॉस्टल-1 भी इसमें जुड़ गया, ताकि हर हफ्ते बच्चों को स्कूल के सभी पांचों दिन पौष्टिक खाना मिल सके। जैसे-जैसे यह बात स्टूडेंट्स जिमखाना और हॉस्टल अफेयर्स की काउंसिल ऑफ स्टूडेंट्स के जरिए फैली, और स्टूडेंट इसमें जुड़ते गए। आज आईआईटी, कानपुर के 1,649 छात्र हर हफ्ते 5 रुपए का योगदान देते हैं। इसका अर्थशास्त्र बेहद आसान है। करीब 250 बच्चों को एक समय का पौष्टिक भोजन कराने में लगभग 3 हजार रुपए खर्च होते हैं, यानी हर छात्र के मेस बिल में महीने के सिर्फ 20 रुपए अतिरिक्त जुड़ते हैं। चावल, गेहूं, चना और राजमा जैसी चीजों की थोक खरीदी के कारण लागत कम होती है और यह कार्यक्रम टिकाऊ बना रहता है।लेकिन इसके असल फायदों को पैसों में नहीं मापा जा सकता। शिक्षकों ने देखा कि बच्चे अधिक स्वस्थ, ऊर्जावान और अटेंटिव हो गए। उनकी अटेंडेंस में सुधार और वे खुश रहने लगे। सबसे अहम आईआईटी स्टूडेंट्स ने वो सबक सीखा, जो कोई किताब नहीं सिखा सकती- यदि अपने हिस्से का छोटा-सा हिस्सा भी बांटें तो यह दूसरों की जिंदगी में बड़ा बदलाव ला सकता है। अब 20 जुलाई 2026 पर लौटते हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों तक देशभर से अनजान लोगों ने भोजन पहुंचाया। कोई नहीं जानता, किसने उसका पैसा दिया। भोजन भेजने वालों को भी नहीं पता कि किसने उसे खाया। लेकिन चुपचाप, बिना किसी प्रचार के भोजन पहुंचता रहा, मानो करुणा ने खुद अपना रास्ता खोज लिया हो। इन दोनों कहानियों में बहुत सारी समानताएं हैं। शायद अच्छाई भी ऐसे ही काम करती है। हम जो भलाई करते हैं, शायद हमें कभी भी वह उसी रूप में वापस नहीं मिलती। कई बार उसका फल हमें सीधे नहीं मिलता। लेकिन कहीं पर, किसी दिन वह किसी जरूरतमंद तक पहुंचता जरूर है- शायद खुद हमारे बच्चों तक या भावी पीढ़ी तक। फंडा यह है कि दया से भरे छोटे-से काम को भी कमतर न समझें। अच्छे कर्मों का लौटकर आने का अपना तरीका होता है। अगर वे सीधे हम तक नहीं पहुंचते तो हमारे बाद आने वाली पीढ़ी के जीवन में लौटते हैं।
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एन. रघुरामन का कॉलम:नेकी लौटती है, हम तक नहीं तो हमारे बच्चों तक पहुंचती है
