कल आपने पढ़ा किस तरह अकाल खत्म होने के बाद मित्र पिंगल के मातृभूमि लौटने से ठीक पहले राजा नल ने उनके सामने अपने पुत्र ढोला और उनकी पुत्री मारू के विवाह का प्रस्ताव रख दिया।
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पढ़िए आगे की कहानी-
उन दिनों बाल-विवाह की परंपरा थी और रिश्ते सिर्फ परिवारों को नहीं, बल्कि राज्यों को जोड़ते थे। जिसके चलते दोनों राजाओं ने अपनी गहरी दोस्ती को रिश्तेदारी में बदलने का निर्णय लिया था।
बघेरा गांव में ढोल-नगाड़ों और लोकगीतों के बीच तीन साल के ढोला और डेढ़ साल की मारू का विवाह कुल देवता वराह के आशीर्वाद के साथ संपन्न हुआ।
दोनों मासूमों को ‘विवाह’ शब्द का अर्थ नहीं पता था, जब ढोला और मारू के छोटे-छोटे हाथों ने एक-दूसरे का पल्ला थामा और अग्नि के फेरे लिए।
ढोला और मारू का विवाह बघेरा में इसलिए हुआ, क्योंकि उस समय बघेरा बड़ा धर्मस्थल हुआ करता था और धर्मनगरी के रूप में प्रसिद्ध था। साथ ही उनके कुल देवता वराह का यह स्थान था। दोनों के बचपन के इस ऐतिहासिक विवाह का विवरण बघेरा में आज भी मिलता है।

बघेरा स्थित तोरण द्वार और स्तंभ पर लिखे दोहे ढोला और मारू के विवाह के काल संवत 978 और विवाह में खर्च हुई सामग्री के बारे में बताते हैं –
तोरण खडक्या तीन सौ चवरी पदम् पचास।
बहत्तर मण मिर्ची लगी, अन्न का करो विचार।।
संवत नवो अठोत्तरो, हुई घर हुवो उछाह।
ढोला मारू परणिया, हुयो बघेरा ब्याह।।
…300 तोरण पर मारा गया (प्रवेश द्वार पर दूल्हे द्वारा की जाने वाली रस्म) और पचास चंवरियों में हुआ विवाह, यानी ढोला और मारू के साथ अन्य भी जोड़ों का भी विवाह यहां पर संपन्न हुआ था। विवाह के भोज में बहत्तर मण मिर्ची खर्च हुई।
तोरण द्वार के पास बड़े भवनों के अवशेष भी मौजूद हैं। उस दौर में इस तोरण द्वार के सामने ही अनेक विवाह समारोह हुए होंगे।

ढोला और मारू के विवाह की चंवरी (विवाह स्थल ) के अवशेष बघेरा गांव में आज भी हैं।
उस दिन खुशियों के बीच दो संस्कृतियों का हुआ मिलन
कहते हैं उस दिन बघेरा की धरती पर केवल ढोला और मारू का विवाह नहीं हुआ बल्कि दो संस्कृतियों का मिलन हुआ था। चारों तरफ ढोल-नगाड़ों के बीच राजस्थान और मध्य प्रदेश के लोक संगीत का अद्भुत संगम दूर तक फैली रोशनी को चार चांद लगा रहा था। उत्सव के इस माहौल के बीच उस दिन ढोला और मारू के गठबंधन के साथ ही दोनों राज्यों से 300 जोड़े और विवाह के बंधन में बंधे थे।

बघेरा गांव में वो तोरण द्वार जहां पर ढोला और मारू की शादी हुई थी। यह आज भी सुरक्षित हैं।
विवाह सम्पन्न हुआ और अब राजा पिंगल परिवार और प्रजा समेत अपनी मातृभूमि पूगल लौटने को तैयार थे।
जाओ मित्र अपनी मातृभूमि को फिर से हरा-भरा करो। लेकिन याद रखना मारू अब इस घर की अमानत है, प्रसन्न मन से राजा नल ने पिंगल से कहा।
मुझे याद रहेगा नल। जब ये बच्चे बड़े होंगे, समझदार होंगे तो मैं खुद संदेश भेजूंगा कि ढोला आए और अपनी दुल्हन मारू को विदा कराकर ले जाए, राजा पिंगल ढोला की तरफ देखकर मुस्कुरा दिए। इस वादे के साथ ही राजा पिंगल का काफिला पूगल की ओर बढ़ गया।
कम उम्र में जिम्मेदारी और दूसरी शादी ने ढक लिया बचपन का सच
समय गुजरता रहा और वक्त की रेत धीरे-धीरे बचपन की यादों पर जमने लगी। ढोला की उम्र लगभग 5 वर्ष होगी जब उसके पिता और नरवर के राजा नल की मृत्यु हो गई और कम उम्र में ही ढोला पर राजपाट की जिम्मेदारी आ गई।
समय बीतने के साथ ढोला एक आकर्षक युवक और पराक्रमी राजकुमार बन चुका था। राज-काज की जिम्मेदारियों के चलते वह बचपन को पूरी तरह भूल गया था।
उसकी शादी एक दूसरी राजकुमारी मालवणी से कर दी गई थी। मालवणी सुंदर थी, लेकिन वह ढोला पर बहुत अधिकार जताने वाली थी। वह नहीं चाहती थी कि ढोला की जिंदगी में कोई और आए।
पूगल में जल रही थी मारू के इंतजार की लौ
इधर मारू का बचपन माता-पिता के स्नेह और सुरक्षा की छांव में बीता और अब वह सयानी हो चुकी थी। मारू के लिए ‘ढोला’ कोई धुंधली याद नहीं, बल्कि उसके जीवन का एकमात्र सच था जिसके साथ वह बड़ी हुई थी।
मारू के साथ की सहेलियां अब एक-एक कर अपने ससुराल जाने लगी थीं। मारू भी हर रोज महल की अटारी पर चढ़कर उस रास्ते को निहारती जहां से उसका ढोला आने वाला था।
रोज की तरह मारू महल की सबसे ऊंची अटारी की मुंडेर पर खड़ी दूर क्षितिज को ताक रही थी। उसकी सहेली से मारू का इंतज़ार अब देखा नहीं जा रहा था।
बाईसा… सूरज ढल गया। अब तो अंदर आ जाइए। आपकी आंखें उस वीरान रास्ते को ताकते-ताकते थक गई होंगी, वह बोली।
नहीं सखी आंखें थकती तब हैं जब उम्मीद टूटती है। मेरा ढोला आएगा, मरुधरा की ठंडी हवाएं मुझसे रोज़ कहती हैं कि वह आ रहा है, मारू ने मुस्कुराते हुए कहा।
लेकिन बाईसा… शादी के वक़्त आप केवल डेढ़ बरस की थीं और कुंवर ढोला तीन बरस के। क्या उन्हें अब कुछ याद भी होगा? इतने सालों में उन्होंने एक बार भी आपकी सुध नहीं ली, सहेली ने चिंता जताई।
वो विवाह खेल नहीं, मेरे जीवन का एकमात्र सच है। ढोला भले ही राज-काज में मुझे भूल गए हों, लेकिन मुझे अपनी हर सांस में महसूस होता है कि मेरा आधा वजूद नरवर में धड़क रहा है। वो आएंगे, उन्हें आना ही होगा, मारू ने अधिकार के साथ विश्वास जताया।
मारू की आंखों में इंतज़ार था… और ढोला की यादों में मारू का कोई निशान नहीं। क्या बचपन के सात फेरों का बंधन ढोला को फिर पुकारेगा या मालवणी हमेशा के लिए दोनों के बीच दीवार बन जाएगी?
जानिए, अगले एपिसोड में…
(यह लोक कथा पुरानी परंपराओं, ऐतिहासिक संदर्भ और सांस्कृतिक मान्यताओं पर आधारित है। बाल विवाह एक सामाजिक बुराई और कानूनन अपराध है। दैनिक भास्कर बाल विवाह जैसी किसी भी कुप्रथा का समर्थन नहीं करता है।
कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी का इस्तेमाल किया गया है। सोर्स : राजस्थानी साहित्य, लोक कथाएं व स्थानीय लोगों से बातचीत। )
इनपुट सहयोग– अनुराग हर्ष, सुजान सिंह, कपिल मिश्रा (शिवपुरी), सुनील जैन, स्वाति पाठक
रिसर्च सहयोग– ममता कुमारी
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ढोला-मारू की प्रेम-कहानी का एपिसोड-1
डेढ़ साल की ‘दुल्हन’ और तीन साल का ‘दूल्हा’:भीषण अकाल में पड़ी थी ढोला और मारू के प्रेम की नींव; 4 एपिसोड में ढोला-मारू की कहानी

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