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Raghuraman Column | Water Conservation & Leakage Prevention Techniques


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14 मिनट पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

हममें से अधिकतर लोगों ने थर्मल कैमरा लगे किसी ड्रोन को अपने ऊपर उड़ते नहीं देखा होगा। करीब 70 मीटर की ऊंचाई से यह जमीन पर तापमान में हुए बेहद मामूली बदलाव को भी डिटेक्ट कर लेता है। अगर कहीं सीवेज लीक है तो वहां जमीन गर्म होगी, कहीं पानी लीकेज है तो वो हिस्सा ठंडा होगा।

यह ड्रोन सिर्फ शहरों ही नहीं, बल्कि हरे-भरे खेतों और चरागाहों के ऊपर भी उड़ता है। इसमें लगा इंडेक्स कैमरा फसलों की बढ़त को मैप करता है और इसमें हुए सामान्य से बदलाव को भी पकड़ लेता है। यदि कहीं लंबे समय से पानी का लीकेज है तो वहां फसलों की ग्रोथ में बदलाव दिखने लगता है। कुछ ड्रोन ऐसे भी हैं, जिन्हें ‘केज ड्रोन’ कहते हैं।

ये पानी की बड़ी पाइपलाइनों के भीतर उड़ते हैं और प्रेशर में हुए बदलाव को पहचानते हैं। यह सामान्य ड्रोन जैसा ही होता है, लेकिन इसमें प्रोपेलर और बॉडी के चारों ओर 360 डिग्री का कार्बन फाइबर या प्लास्टिक केज लगा होता है। ये ‘ड्रोन इन अ बॉक्स’ रिमोटली ऑपरेटेड मशीनें हैं, जो यूके में घरों में पेयजल सप्लाई करने वाली कंपनियों द्वारा दूरदराज के इलाकों में किसी थंडरवर्ड की भांति उड़ाई जाएंगी, ताकि ऐसे बदलावों की पहचान की जा सके।

कुछ अधिकारियों का अपने वर्कप्लेस पर ‘केआरए’ (की-रिजल्ट एरिया) ही यही होता है कि लोगों के नलों तक पानी पहुंचता रहे। चूंकि पाइपलाइनें अलग-अलग वर्षों में बिछाई जाती हैं तो समय-समय पर इन्हें अपग्रेड करने और कई जगह तुरंत मरम्मत करने की जरूरत पड़ती है। ऐसे में यह नई तकनीक उनकी मददगार बनती है।

हाल ही में उन्होंने ‘एक्वारिया’ नाम की किसी चीज का ट्रायल किया। ब्लूबैक जैसे इस पदार्थ को पाइप में इन्जेक्ट किया जाता है, जो प्रेशर के जरिए लीकेज वाले छेद में पहुंच कर उसे सील कर देता है। चूंकि अल-नीनो की वजह जलवायु पैटर्न में बदलाव अब हकीकत बन चुका है तो हर देश पानी बचाने के प्रयास कर रहा है।

आप सोच रहे होंगे कि जब आसमान से बारिश हो रही है तो मैं लीकेज की बात क्यों कर रहा हूं? वजह यह है कि धरती पर होने वाली बारिश का सिर्फ 4% हिस्सा ही भारत को मिलता है, जबकि यहां दुनिया की 18% से ज्यादा आबादी रहती है। विडंबना यह है कि हमारी कुल बारिश का करीब 30-40% पानी तो समुद्र में बेकार बह जाता है।

वहीं, 20-25% पानी जमीन में समाने से पहले ही भाप बनकर उड़ जाता है। इसीलिए हमारी अधिकतर आबादी को भूजल दोहन करना पड़ता है। इन्हीं चिंताजनक आंकड़ों की वजह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में ‘मन की बात’ में लोगों से जलनिकायों को पुनर्जीवित करने की अपील की। उन्होंने महाराष्ट्र के नासिक, आंध्र प्रदेश के नांदयाल और विजयनगरम, ओडिशा के भुवनेश्वर और छत्तीसगढ़ के कोरबा में वर्षा जल संरक्षण के लिए जनता और अधिकारियों द्वारा किए गए प्रयासों की सराहना की।

‘कैच द रेन’ अभियान के तहत छत्तीसगढ़ के कोरबा नगर निगम ने कई रिचार्ज-वेल और निजी व सरकारी भवनों तथा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में सैकड़ों रिचार्ज पिट बनवाना शुरू किए। यह पहल निगम कमिश्नर आशुतोष पांडे (2019 बैच के आईएएस अधिकारी) ने की है। इससे जल संग्रहण क्षमता और भूजल स्तर बढ़ा है।

इस पहल से निगम को व्यर्थ बह जाने वाले वर्षा जल को रोकने में मदद मिली है। निगम के क्षेत्राधिकार में होने वाले हर नए निर्माण में अब रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सुविधा अनिवार्य की गई है। दिलचस्प यह है कि कम पानी देने वाले बोरवेल्स को री-ड्रिल किया जा रहा है, ताकि उन्हें रिचार्ज पिट के रूप में इस्तेमाल किया जा सके। ‘कैच द रेन’ भले ही एक मौसमी अभियान हो, लेकिन पानी की लीकेज रोकना सालभर का काम है। यह जिम्मेदारी सिर्फ अधिकारियों की नहीं, हर आम आदमी की है।

फंडा यह है कि जैसे हंस पानी के भीतर पैर चलाता रहता है, वैसे ही हमें पानी के ऊपर लगातार प्रयास करते रहना होगा, ताकि जीवन बचाने वाले इस जल को संरक्षित कर सकें और बुजुर्गों से मिली धरती को और हरा-भरा कर भावी पीढ़ी को सौंप सकें। याद रखिए ‘जल है तो जीवन है।’

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