कल आपने पढ़ा कि नरवर के सैनिकों को चकमा देकर किसी तरह से ढाढी (लोक गायक) ढोला के महल तक पहुंचा और उसने मल्हार गाना शुरू कर दिया।
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पढ़िए आगे की कहानी….
मारू का संदेश अब शब्दों में नहीं, सुरों में था। जैसे ही सारंगी की दर्दभरी तान नरवर के महल तक पहुंची, ढोला की नींद टूट गई….गानों के बोल सुनकर उसका मन बेचैन हो उठा।
जाग उठीं बचपन की धुंधली यादें
ढोला ने सैनिकों को आदेश दिया कि महल के बाहर जो गायक गा रहे हैं, उन्हें तुरंत सामने पेश किया जाए। सैनिकों ने कालूराम (ढाढी) को उसके साथियों समेत राजा के सामने पेश कर दिया।
कौन हो तुम? और ये किसकी कहानी गा रहे हो? ये गीत सुनकर मन व्याकुल क्यों हो उठा है, ढोला बेचैन था।
ये किसी और की नहीं आपकी ही कहानी है महाराज। मैं पूगल से आया हूं।आपकी पत्नी मारू ने मुझे भेजा है। बरसों से वो आपकी राह देख रही हैं। कई संदेश भेजे, लेकिन कोई भी आप तक नहीं पहुंच सका..वो आपके इंतजार में बेजान सी हो गई हैं.. महाराज आप अब उन्हें ले आएं। अवसर न गंवाते हुए कालूराम ने एक सांस में मारू की पूरी व्यथा ढोला को सुना दी।
कहानी सुनने के साथ ही बचपन की धुंधली यादें एक-एक कर जैसे ढोला के सामने से गुजरने लगीं। उसे अपनी नन्हीं दुल्हन मारू की वो मासूम सूरत याद आई जो वक्त की धूल में कहीं दब गई थी…. एक छोटा सा हाथ, नन्हीं सी दुल्हन, पूगल और बचपन, ढोला को सब याद आ गया।

ढोला के महल के बाहर ढाढी (लोक गायक) ने मल्हार गाया था।
मालवणी की जिद और ‘करहा’ का साथ
अब ढोला के मन में सिर्फ एक ही तड़प थी- पूगल पहुंचना और अपनी मारू को वापस लाना। उसने बिना समय गंवाए पूगल जाने का निर्णय लिया। यह इतना आसान नहीं था। ढोला की पत्नी मालवणी को जब पता चला कि ढोला पूगल जाने की तैयारी कर रहा है तो उसने उसे रोकने के लिए साम-दाम-दंड-भेद सब आजमा लिए।
आधी रात को जब मालवणी सो रही थी और पूरा नरवर सन्नाटे में डूबा था, ढोला चुपके से अस्तबल पहुंचा। उसने सबसे फुर्तीले और वफादार ऊंट करहा को चुना और उस पर सवार रेगिस्तान के सीने को चीरते हुए पूगल के लिए निकल पड़ा।
चांदनी रात थी। चारों तरफ रेत के सुनहरे धोरों के बीच ऊंट के गले में बंधी घंटियां ‘टन-टन’ बज रही थीं। न भूख न प्यास, सारी चिंता पीछे छोड़े ढोला अपनी धुन में मगन था। उसके भीतर बस ढाढी के गीत के वो बोल गूंज रहे थे —
“पूगल री पद्मिनी जोवे थारी बाट!”
रेत के धोरों को चीरता ढोला का संकल्प
जहां प्रेम होता है, वहां परीक्षा भी होती है। ढोला का ऊंट बिजली की रफ्तार से पूगल की तरफ बढ़ रहा था, लेकिन राह अभी भी आसान नहीं थी। कभी तपती रेत के बवंडर उठते, तो कभी रास्ता भटकाने वाली आवाजें आतीं। लेकिन ढोला का संकल्प पहाड़ जैसा था। कहा जाता है कि उस रात ढोला ने इतना लंबा सफर तय किया, जितना लोग कई दिनों में नहीं कर पाते।
खत्म हुआ सालों का इंतजार
उधर पूगल में मारू रोज की तरह महल की अटारी पर खड़ी राह तक रही थी। तभी दूर क्षितिज पर रेत का गुबार उठा और ढोला के ऊंट के गले की घंटियां सुनाई दीं। धूल छंटने के साथ ढोला ने महल के आंगन में कदम रखा। सालों का इंतजार, आंसू और विरह की तपती रातें… सब एक पल में खत्म हो गए। मारू को अपना बचपन का साथी, अपना ‘ढोला’ मिल गया था।
ढोला के आगमन की खुशी में रेगिस्तान में जैसे सावन आ गया था, पूरे पूगल में जश्न मनाया गया। ढोला कुछ दिन पूगल रुके, फिर मारू को साथ लेकर नरवर के लिए रवाना हुए। लेकिन मिलन की इस राह में अभी भी परीक्षा बाकी थी।
साजिश का जाल और मारू की चतुराई
रास्ते में एक सामंत था- उमरा-सूमरा। वह खुद मारू से शादी करना चाहता था। उसे जब खबर मिली कि ढोला मारू को लेने पूगल जा रहा है, तो उसने रास्ते में एक जाल बिछाया। उसने ढोला को धोखे से रोक लिया और मेहमानवाजी का नाटक किया। उमरा-सूमरा की योजना थी कि ढोला को अफीम (कसूंबा) पिलाकर मदहोश कर उसे मार डालेगा।
चेहरे पर मुस्कान और मन में छल लिए उसने ढोला का स्वागत किया। ढोला उसके सम्मान में रुक गए। साथ आए ढाढी को उसकी साजिश का आभास हो गया। उसने इशारे से ढोल बजाकर मारू को सावधान किया। मारू इशारा समझ गई और बिना देर किए उसने ऊंट को एड़ लगाई। ऊंट जैसे ही दौड़ा ढोला उसे रोकने दौड़े, तभी मारू ने फुर्ती से ढोला को ऊपर खींच लिया।
उमरा-सूमरा ने दोनों का पीछा किया। रेगिस्तान के बीचों-बीच रोमांचक मुकाबला हुआ, लेकिन ढोला का साहस और मारू का साथ अटूट था। उन्होंने चतुराई और करहा ऊंट की फुर्ती से दुश्मनों को पछाड़ दिया। देखते ही देखते दोनों उमरा-सूमरा से बचकर दूर निकल गए।

ऊंट पर सवार ढोला-मारू का रेगिस्तानी सफर।
मिलन और खुशहाली का आगाज
हर बाधा को पार कर ढोला और मारू नरवर पहुंचे तो वहां की हवाएं भी जैसे झूम उठीं। शुरुआत में मालवणी को ईर्ष्या हुई, लेकिन मारू की सादगी और ढोला के सच्चे प्रेम ने सबका दिल जीत लिया। कहते हैं इसके बाद नरवर में कभी खुशहाली की कमी नहीं हुई।
….और अमर हो गई ढोला- मारू की प्रेम कहानी
मारू थारे देस में, निपजै तीन रतन।
एक ढोला, दूजी मरवण, तीजो कसूमल रंग।।
राजस्थान की रेत पर जन्मी यह अमर प्रेमकथा राजस्थान की लोक संस्कृति में गहरी बसी है। ढोला और मारू आज भी लोकगीतों, लोक कथाओं और चित्रकला में जीवित हैं। चित्रों में ढोला-मारू को ऊंट पर सवार दिखाया जाता है, जो उनके रेगिस्तानी सफर और अमर प्रेम का प्रतीक है। ग्यारहवीं शताब्दी में कवि कलोल ने ढोला और मारू के प्रेम और विरह को दोहों में लिखा। लोक-प्रसिद्ध राजस्थानी काव्य ‘ढोला मारू रा दूहा’ इस रोमांचक प्रेम कहानी का लोकप्रिय काव्य है।
(यह लोक कथा पुरानी परंपराओं, ऐतिहासिक संदर्भ और सांस्कृतिक मान्यताओं पर आधारित है। बाल विवाह सामाजिक बुराई और कानूनन अपराध है। दैनिक भास्कर बाल विवाह जैसी किसी भी कुप्रथा का समर्थन नहीं करता।
कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी का इस्तेमाल किया गया है। सोर्स : राजस्थानी साहित्य, लोक कथाएं व स्थानीय लोगों से बातचीत। )
इनपुट सहयोग– अनुराग हर्ष, सुजान सिंह, कपिल मिश्रा (शिवपुरी), सुनील जैन, भरत मूलचंदानी, स्वाति पाठक
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ढोला-मारू की प्रेम-कहानी के 3 एपिसोड यहां पढ़िए…
1- डेढ़ साल की ‘दुल्हन’ और तीन साल का ‘दूल्हा’:भीषण अकाल में पड़ी थी ढोला और मारू के प्रेम की नींव; 4 एपिसोड में ढोला-मारू की कहानी

राजस्थान की तपती रेत पर जब कमायचा और रावणहत्था के तार छिड़ते हैं तो एक ऐसी प्रेम कहानी गूंजती है जो सदियों बाद भी अमर है। यह कहानी है ‘ढोला-मारू’ की। पूरा एपिसोड…
2- ढोला-मारू के साथ हुआ था 300 जोड़ों का विवाह: कम उम्र में जिम्मेदारी और दूसरी शादी में छुप गया बचपन का सच; एपिसोड-2

उन दिनों बाल-विवाह की परंपरा थी और रिश्ते सिर्फ परिवारों को नहीं, बल्कि राज्यों को जोड़ते थे। जिसके चलते दोनों राजाओं ने अपनी गहरी दोस्ती को रिश्तेदारी में बदलने का निर्णय लिया था। पूरा एपिसोड…
3- पहरों का ऐसा जाल कि परिंदा पर न मार सके:आधी रात को ढोला के महल तक कैसे पहुंची मारू की पुकार?, ढोला-मारू प्रेम कहानी एपिसोड-3

समय बीतने के साथ मारू की अधिकतर सहेलियां ससुराल चली गईं, लेकिन मारू को विदा कराने अब तक कोई नहीं आया था। हर बीतते दिन के साथ मारू की आंखों में ढोला का इंतजार और गहरा होता गया। पूरा एपिसोड…
