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पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल उधार दिए गए पैसे वापस मांगना, भुगतान के लिए लगातार दबाव बनाना या लेन-देन को लेकर तकाजा करना मात्र से किसी व्यक्ति पर आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं बनता। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में आरोपी के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध तभी माना जाएगा, जब यह स्पष्ट रूप से साबित हो कि उसने प्रत्यक्ष रूप से आत्महत्या के लिए उकसाया या उसकी मंशा पीड़ित को ऐसा कदम उठाने के लिए प्रेरित करने की थी। कुलबीर सिंह और राजवीर कौर की याचिका स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ दर्ज FIR और उससे जुड़ी सभी कानूनी कार्यवाहियों को रद्द कर दिया गया। अब पढ़ें क्या है पूरा मामला: – FIR और पूरी कार्रवाई रद्द हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ लगाए गए आरोप धारा 306 IPC के आवश्यक कानूनी तत्वों को पूरा नहीं करते। ऐसे में अदालत ने FIR नंबर 115/2016 और उससे जुड़ी सभी कार्यवाहियों को दोनों याचिकाकर्ताओं के खिलाफ रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि प्रत्यक्ष और तत्काल उकसावे के अभाव में केवल कर्ज या भुगतान के विवाद को आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला मानकर आपराधिक मुकदमा जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
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पैसे वापस मांगना खुदकुशी के लिए उकसाना नहीं:हाईकोर्ट ने सामूहिक आत्महत्या मामले की FIR रद्द की, कहा- धारा 306 के लिए मंशा जरूरी
