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संत की राजा को सीख:क्रोध, ईर्ष्या और अहंकार मन की शांति छीन लेते हैं, इन भावनाओं को समझकर धीरे-धीरे नियंत्रित करना सीखें




एक लोक कथा है, पुराने समय में एक राजा के पास अपार धन-संपत्ति, विशाल महल, अनेक सेवक और जीवन की सभी सुख-सुविधाएं थीं। राज्य में उसकी प्रतिष्ठा और सम्मान भी बहुत था, लेकिन इतना सब होने के बाद भी राजा का मन हमेशा अशांत रहता था। वह हर समय चिंताओं से घिरा रहता था। कभी उसे पड़ोसी राज्यों की चिंता होती, कभी अपने फैसलों को लेकर डर रहता और कभी उसे लगता कि लोग उसके सम्मान को कम न कर दें। राजा दिन-रात राज्य के कामों में व्यस्त रहता था, लेकिन उसके मन को शांति नहीं मिलती थी। एक दिन वह अपने राज्य का निरीक्षण करने निकला। यात्रा करते हुए वह जंगल के रास्ते से गुजर रहा था। तभी उसे एक आश्रम दिखाई दिया। राजा आश्रम में गया और वहां रहने वाले एक संत को प्रणाम किया। राजा ने संत से कहा, “मेरे पास सब कुछ है, फिर भी मेरा मन बेचैन रहता है। मैं चाहता हूं कि मुझे सच्ची शांति मिले।” संत ने मुस्कुराते हुए कहा, “यदि तुम्हें शांति चाहिए तो कुछ समय यहां बैठकर ध्यान करो।” राजा ने ध्यान लगाने की कोशिश की, लेकिन उसका मन बार-बार राज्य की समस्याओं, भविष्य की चिंताओं और पुराने निर्णयों की बातों में उलझ जाता था। काफी प्रयास करने के बाद भी वह ध्यान नहीं लगा पाया। राजा ने संत से कहा, “गुरुदेव, मैं ध्यान नहीं कर पा रहा हूं। मेरा मन शांत ही नहीं होता।” संत ने कहा, “ठीक है, मेरे साथ आश्रम से बाहर चलो।” राजा संत के साथ आश्रम के आसपास घूमने लगा। चलते-चलते राजा ने एक पेड़ को हाथ लगाया। अचानक उसके हाथ में एक कांटा चुभ गया। राजा को तेज दर्द हुआ। संत तुरंत आश्रम से औषधि लेकर आए और राजा के हाथ पर लगा दी। संत ने कहा, “राजन, जिस तरह हाथ में चुभा कांटा तुम्हें दर्द दे रहा था, उसी तरह तुम्हारे मन में भी कई कांटे चुभे हुए हैं। क्रोध, अहंकार, भय, ईर्ष्या और लालच जैसे कांटे मन को लगातार पीड़ा देते हैं। जब तक तुम इन कांटों को नहीं निकालोगे, तब तक तुम्हें सच्ची शांति नहीं मिलेगी।” राजा को संत की बात समझ आ गई। उसने महसूस किया कि उसकी अशांति बाहरी परिस्थितियों की वजह से नहीं, बल्कि उसके अपने विचारों और भावनाओं की वजह से थी। उस दिन से राजा ने अपने व्यवहार में बदलाव लाना शुरू किया। उसने अहंकार को छोड़कर लोगों की बात सुननी शुरू की, क्रोध पर नियंत्रण करना सीखा और अपने राज्य के धन का उपयोग जनता की भलाई के लिए करने लगा। धीरे-धीरे उसके मन के सभी कांटे निकलने लगे और उसे वह शांति मिल गई जिसकी उसे लंबे समय से तलाश थी। प्रसंग की सीख



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