मुंबई/नई दिल्ली1 घंटे पहले
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देश की सबसे बड़ी FMCG और कंज्यूमर कंपनियां फेस्टिव सीजन से ठीक पहले और लगातार दूसरी तिमाही में अपने प्रोडक्ट्स के दाम बढ़ाने की तैयारी में हैं। टूथपेस्ट से लेकर टायर और पेंट जैसे सामान महंगे होने वाले हैं।
मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष के कारण कमोडिटी लागत बढ़ रही है, जिससे देश में महंगाई लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहने की आशंका है।
हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड (HUL) आने वाली तिमाही में डिटर्जेंट और डिशवॉशिंग बार जैसी कैटेगरी में कीमतें बढ़ाएगी। HUL के अलावा डोडला डेयरी और एशियन पेंट्स समेत कम से कम 7 अन्य कंपनियां भी दाम बढ़ाने का प्लान बना चुकी हैं।
होम केयर सेगमेंट में कीमतें बढ़ा रहे: HUL
भारत की सबसे बड़ी कंज्यूमर गुड्स कंपनी हिंदुस्तान यूनिलीवर के चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर निरंजन गुप्ता ने एनालिस्ट्स को बताया कि बाहरी उतार-चढ़ाव के कारण क्रूड ऑयल से जुड़े डेरिवेटिव्स में महंगाई देखने को मिल रही है। इसी वजह से कंपनी होम केयर सेगमेंट में सोच-समझकर कीमतें बढ़ा रही है।
हैवेल्स ने 8% और टाटा साल्ट ने 7% तक दाम बढ़ाए
ईरान युद्ध की वजह से एनर्जी की कीमतें लगातार ऊंची बनी हुई हैं, जिससे तुरंत कोई राहत मिलती नहीं दिख रही है। अमेरिका-ईरान के बीच तनाव फिर से भड़कने के कारण कंपनियां होम एप्लायंसेज से लेकर किचन के जरूरी सामानों पर दूसरी बार कीमतें बढ़ाने के प्लान बना रही हैं।
- हैवेल्स इंडिया: कंपनी अपने प्रोडक्ट्स के दाम 8% तक बढ़ा चुकी है।
- टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स: टाटा साल्ट की कीमत में लगभग 7% की बढ़ोतरी हो चुकी है।
फेस्टिव सीजन में होती है एक-तिहाई बिक्री
कीमतों में यह ताजा इजाफा आने वाले फेस्टिव सीजन के साथ हो रहा है। देश में त्योहारों का यह सीजन आमतौर पर अगस्त से नवंबर तक चलता है। इस दौरान खासकर दिवाली के समय कंज्यूमर स्पेंडिंग यानी आम लोगों की खरीदारी में काफी उछाल आता है।
कई कंपनियों के लिए साल भर की कुल बिक्री का एक-तिहाई (33%) हिस्सा इसी सीजन से आता है। मजबूत मांग के कारण कंपनियां अपनी बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर आसानी से डाल पाएंगी।

जून में 4% से ऊपर निकली महंगाई
जून के महीने में खाने-पीने और ईंधन की लागत बढ़ने से कंज्यूमर प्राइस यानी रिटेल महंगाई दर लगभग एक साल में पहली बार रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के 4% के लक्ष्य से ऊपर निकल गई। हालांकि यह आंकड़ा RBI के 2% से 6% के सहनीय दायरे यानी टॉलरेंस बैंड के भीतर ही है।
आने वाले महीनों में कंपनियों द्वारा दाम बढ़ाए जाने और कमजोर मानसून के कारण खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने से महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है। RBI का अनुमान है कि मार्च 2027 को खत्म होने वाले वित्त वर्ष में औसत महंगाई दर 5.1% रह सकती है।
RBI की ब्याज दरें स्थिर रहने के आसार
- महंगाई का बढ़ता दबाव केवल आम जनता की जेब ही नहीं, बल्कि नीतियां बनाने वाले पॉलिसीमेकर्स की भी परीक्षा लेगा। RBI ने स्पष्ट किया है कि वह तभी कदम उठाएगा जब महंगाई का दबाव और व्यापक होगा।
- वित्त मंत्रालय ने चेतावनी दी है कि महंगाई अब केवल खाने-पीने की चीजों तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्लोबल फ्यूल कॉस्ट और खराब मौसम का असर अन्य कंज्यूमर गुड्स पर भी दिख रहा है।
- RBI ने इस साल ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया है। 3 से 5 अगस्त के बीच होने वाली 6-सदस्यीय मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की बैठक में भी दरें स्थिर रहने की ही उम्मीद है।
लागत बढ़ने से दाम बढ़ाना मजबूरी
नोमुरा होल्डिंग्स की एशिया मुख्य अर्थशास्त्री सोनल वर्मा का कहना है कि इनपुट कॉस्ट और कंपनियों के मार्जिन पर पड़ रहे भारी दबाव को देखते हुए ग्राहकों पर बढ़ी कीमतों का बोझ डालना मजबूरी हो गया है।
वहीं KFC और Pizza Hut चलाने वाली देवयानी इंटरनेशनल के चेयरमैन रविकांत जयपुरिया ने कहा कि मांग अब तक स्थिर रही है, लेकिन सामान्य से कम मानसून का अनुमान और ‘अल नीनो’ का जोखिम यह याद दिलाता है कि भारत में कंजम्पशन रिकवरी कभी भी सीधी रेखा में नहीं चलती।
ग्रामीण और शहरी इलाकों में मांग मजबूत
कंपनियों के कॉमेंट्स के मुताबिक, अब तक ग्रामीण और शहरी दोनों ही भारत में मांग स्थिर बनी हुई है।
- रिटेल सेल्स: रिटेलर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के सर्वे के मुताबिक, जून में रिटेल बिक्री में पिछले साल के मुकाबले 6% की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो मई से ज्यादा है।
- आर्थिक संकेतक: कंसल्टेंसी द नॉलेज कंपनी के चेयरमैन अरविंद सिंघल ने कहा कि जीएसटी कलेक्शन और हाइवे टोल से मिलने वाला राजस्व जैसे संकेतक भी मजबूत बने हुए हैं, जिससे पता चलता है कि बाजार में मांग बनी हुई है।
क्या होता है ‘अल नीनो’ और ‘इनपुट कॉस्ट’?
अल नीनो: यह प्रशांत महासागर में समुद्र के पानी के असामान्य रूप से गर्म होने की एक भौगोलिक घटना है। इसके कारण भारत में मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं, जिससे सूखा पड़ने या कम बारिश होने का खतरा रहता है। बारिश कम होने से फसलों का उत्पादन घटता है और खाने-पीने की चीजें महंगी हो जाती हैं।
इनपुट कॉस्ट: किसी भी प्रोडक्ट को तैयार करने या बनाने में लगने वाले कच्चे माल, ईंधन, ट्रांसपोर्टेशन और मजदूरी के कुल खर्च को इनपुट कॉस्ट कहते हैं। जब यह लागत बढ़ती है, तो कंपनियों को अपना प्रॉफिट मार्जिन बचाने के लिए अंतिम प्रोडक्ट के दाम बढ़ाने पड़ते हैं।
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