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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 15 वर्षीय नाबालिग लड़की को उसकी मां की अभिरक्षा में ही रहने की अनुमति दी है।
न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकलपीठ ने यह आदेश संदीप कुशवाहा की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर पारित किया। याचिका पर अधिवक्ता प्रारब्ध पांडेय व निर्विकल्प पांडेय ने बहस की। जानिये क्या है मामला याचिकाकर्ता संदीप कुशवाहा ने अपनी नाबालिग बेटी की अभिरक्षा की मांग को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। कोर्ट ने नाबालिग को अदालत में पेश करने का निर्देश दिया था, जिसके अनुपालन में कानपुर देहात के दिरापुर थाने के उप-निरीक्षक गिरीश चंद्र ने बच्ची को कोर्ट में पेश किया। कक्षा आठवीं में पढ़ने वाली नाबालिग बच्ची ने अदालत को बताया कि वह अपनी मां के साथ खुश और सुरक्षित है, और पिता के साथ रहने की इच्छुक नहीं है। कोर्ट ने पिता को बच्ची से सीधे बात करने का मौका भी दिया, लेकिन बच्ची अपने फैसले पर अडिग रही। अंजू देवी (बच्ची की मां) ने कोर्ट को बताया कि वैवाहिक विवाद के चलते वह पति से अलग रह रही हैं और ससुराल लौटने की कोई मंशा नहीं रखतीं। उन्होंने बच्ची की समुचित देखभाल, शिक्षा और भावनात्मक सहयोग का दावा किया, जिसे पिता द्वारा लगाए गए बहकाने के आरोपों से इन्कार करते हुए खारिज किया। पिता को अभिरक्षा देने से इंकार कर दिया। अदालत ने कहा कि नाबालिग की अभिरक्षा का मामला केवल माता-पिता के कानूनी अधिकारों पर नहीं, बल्कि बच्चे के कल्याण और सर्वोत्तम हित पर आधारित होना चाहिए। बच्ची के जवाबों को स्वाभाविक, सुसंगत और किसी दबाव से मुक्त पाते हुए कोर्ट ने पिता को अभिरक्षा देने से इन्कार कर दिया। हालांकि, पिता-पुत्री के रिश्ते को बनाए रखने के लिए कोर्ट ने पिता को मिलने-जुलने का अधिकार दिया है ।वह सूचना देकर उसकी मां के घर जाकर बेटी से मिल सकेंगे, साथ ही शाम 6 से 9 बजे के बीच वीडियो/मोबाइल कॉल के जरिए भी संपर्क कर सकेंगे, बशर्ते बच्ची सहज हो। इसी के साथ याचिका का निस्तारण कर दिया गया।
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बेटी ने मां को चुना, लाडली को वहीं भेजा:हाईकोर्ट ने पिता की याचिका खारिज की, कानपुर का मामला
