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चंडीगढ़ डॉक्टर बोले- बच्चे की चुप्पी को नजरअंदाज न करें:PGI में किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर चर्चा, 120 विशेषज्ञों का मानसिक स्वास्थ्य पर मंथन




क्लास में चुपचाप बैठने वाला, दोस्तों से दूरी बनाने वाला या अचानक गुस्सा करने वाला बच्चा हमेशा सामान्य नहीं होता। उसके व्यवहार के पीछे बचपन का कोई ऐसा अनुभव छिपा हो सकता है, जिसके बारे में उसने किसी को बताया ही न हो। ऐसे बच्चों की परेशानी अक्सर ‘Hidden in Plain Sight’ यानी सबके सामने होते हुए भी नजर नहीं आती। चंडीगढ़ पीजीआई के एडवांस्ड पीडियाट्रिक्स सेंटर में आयोजित CME में विशेषज्ञों ने किशोरों की ऐसी छिपी परेशानियों को समय रहते पहचानने और उन्हें सही मदद देने पर जोर दिया। 120 विशेषज्ञ जुटे, किशोरों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा एडवांस्ड पीडियाट्रिक्स सेंटर की ओर से ‘Adolescents at Risk: From Early Identification to Intervention’ विषय पर एक दिवसीय CME आयोजित किया गया। इसमें उत्तर भारत से करीब 120 शिक्षक, काउंसलर, पीडियाट्रिशियन, मनोवैज्ञानिक, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ और छात्र शामिल हुए। कार्यक्रम में किशोरों के विकसित होते मस्तिष्क, बचपन के प्रतिकूल अनुभव (ACEs), रिश्तों और रिजेक्शन, सोशल मीडिया, मानसिक स्वास्थ्य, वेपिंग और नशे का प्रयोग, सेल्फ हार्म, मनोसामाजिक जांच और न्यूरोडाइवर्जेंट किशोरों को सहयोग देने जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। बच्चे के व्यवहार के पीछे छिपी कहानी समझें PGIMER की सोशल पीडियाट्रिक्स विभाग की प्रोफेसर एवं हेड डॉ. भवनीत भारती ने ‘Hidden in Plain Sight: Adverse Childhood Experiences Among Adolescents’ विषय पर प्रस्तुति दी। उन्होंने ICMR समर्थित स्कूल आधारित अध्ययन के शुरुआती निष्कर्ष साझा किए। उन्होंने बताया कि कोई बच्चा क्लास में चुप रहता है, आक्रामक व्यवहार करता है, दोस्तों से दूर हो जाता है, पढ़ाई में संघर्ष करता है या जोखिम भरा व्यवहार करने लगता है तो उसके पीछे कोई विपरीत अनुभव हो सकता है। कई बार बच्चे से उसकी परेशानी के बारे में पूछा ही नहीं जाता और समस्या छिपी रह जाती है। उन्होंने कहा कि जरूरत इस बात की है कि केवल यह न पूछा जाए कि ‘इस किशोर में क्या गड़बड़ है?’, बल्कि यह समझने की कोशिश की जाए कि ‘इस किशोर के साथ क्या हुआ है और उसे किस तरह की मदद चाहिए?’ मारपीट, उपेक्षा-खराब पारिवारिक माहौल ACEs का हिस्सा डॉ. भारती के अनुसार बचपन के प्रतिकूल अनुभवों में भावनात्मक, शारीरिक और यौन शोषण, उपेक्षा तथा खराब पारिवारिक माहौल जैसे गंभीर तनाव शामिल हो सकते हैं। गरीबी, समुदाय में हिंसा, पढ़ाई में व्यवधान, दिव्यांगता और पारिवारिक समस्याएं भी किशोरों की संवेदनशीलता बढ़ा सकती हैं। उन्होंने जोर दिया कि ACE स्कोर को बच्चे पर कोई लेबल लगाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। इसका उद्देश्य बच्चे की परेशानी को पहचानकर समय पर मदद देना, जरूरत पड़ने पर सुरक्षा सुनिश्चित करना और उसके आसपास सुरक्षित माहौल तैयार करना होना चाहिए। चंडीगढ़-मोहाली के स्कूलों में होगा अध्ययन ICMR समर्थित प्रोजेक्ट में स्कूल जाने वाले किशोरों में ACEs की संख्या और उनके पैटर्न का अध्ययन किया जाएगा। साथ ही यह देखा जाएगा कि इन अनुभवों का मानसिक स्वास्थ्य, व्यवहार और शुरुआती गैर-संचारी रोगों के जोखिम से क्या संबंध है। इस अध्ययन में चंडीगढ़ और मोहाली के शहरी, ग्रामीण और पेरी-अर्बन क्षेत्रों के सरकारी और निजी स्कूलों के किशोरों को शामिल करने की योजना है। अध्ययन के आधार पर स्कूलों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप ट्रॉमा-इन्फॉर्म्ड इंटरवेंशन विकसित करने का लक्ष्य है। विशेषज्ञों ने कहा कि किशोरावस्था को केवल जोखिम के दौर के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इस उम्र में मस्तिष्क में काफी बदलाव होते हैं और सीखने तथा व्यवहार में बदलाव की क्षमता भी अधिक होती है। इसलिए समय पर सही हस्तक्षेप किशोर के आगे के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। रिश्ते, रिजेक्शन, सेल्फ हार्म और नशे पर भी चर्चा डॉ. प्रहभजोत मल्ही ने किशोरों में रिश्तों, रिजेक्शन और उनसे उबरने की क्षमता पर चर्चा की। उन्होंने केस स्टडी के जरिए सेल्फ हार्म के मुद्दे को भी समझाया। डॉ. निधि मल्होत्रा ने स्मोकिंग, वेपिंग और नशे के साथ प्रयोग करने के विषय पर बात की। AIMS मोहाली के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग की प्रोफेसर एवं हेड डॉ. अमृत विर्क ने किशोरावस्था को ऐसे महत्वपूर्ण समय के रूप में बताया, जब व्यवहार में बदलाव के जरिए आगे चलकर बीमारी के जोखिम को कम करने की दिशा में काम किया जा सकता है।



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