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FCRA Bill Explained; Foreign Funding Assets Vs PM Modi Govt


विदेशी चंदे से जुड़े कानून में सरकार बड़ा बदलाव करने जा रही है। विपक्षी नेताओं के साथ-साथ अमेरिका तक से ऐतराज आ रहा है। अमेरिकी सांसद रिले मूर ने तो कह दिया- ये ईसाइयों पर सीधा हमला है। रिपोर्ट्स हैं कि FCRA संशोधन बिल पर 12 अगस्त को चर्चा होगी, जिसक

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आखिर विदेशी चंदे से जुड़े कानून में क्या और क्यों बदलना चाहती है सरकार, क्या ये चर्च-मस्जिद के गले का फंदा बनेगा और सरकार की दुविधा क्या है; 4 सवालों में पूरी कहानी…

सवाल-1: FCRA कानून में सरकार क्या बदलाव करना चाहती है और क्यों?

जवाब: 1976 में इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी सरकार ने विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम, यानी FCRA बनाया। मकसद- विदेशी ताकतें NGOs, शिक्षण संस्थानों और ट्रस्टों को पैसा देकर भारत के अंदरूनी मामलों को प्रभावित न कर सकें।

2010 में मनमोहन सिंह सरकार और 2020 में मोदी सरकार ने इसे और सख्त किया। जैसे- NGOs अब सिर्फ 20% विदेशी पैसा प्रशासनिक खर्च में लगा सकते हैं, पहले 50% की लिमिट थी। यह पैसा सिर्फ दिल्ली की एक तय SBI ब्रांच के खाते में ही आ सकता है। सब-ग्रांट पर भी रोक लगा दी गई, यानी बड़ी एनजीओ छोटी एनजीओं को फंड नहीं दे सकतीं।

अब 2026 में सरकार ने तीन बड़े कदम उठाए…

1. संस्थाओं को अपना काम और इलाका साफ बताना होगा: विदेशी पैसा किस खास काम के लिए और किस राज्य या UT में इस्तेमाल होगा। ये रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट पर लिखा जाएगा। पहले सामाजिक, धार्मिक जैसी ब्रॉडर कैटेगरी लिख दी जाती थी। ये नियम जून 2026 में लागू हो चुका है।

2. विदेशी चंदे से धर्म परिवर्तन नहीं कराया जा सकेगाः धार्मिक गतिविधियों की लिस्ट में कई काम जैसे- पूजा स्थल बनवाना, धार्मिक शिक्षा, सत्संग वगैरह करवाने की अनुमति है, लेकिन अब विदेशी पैसे से दूसरों का धर्म परिवर्तन नहीं किया जा सकता। ये नियम भी जून 2026 में लागू हो चुका है।

3. रजिस्ट्रेशन नहीं, तो प्रॉपर्टी अथॉरिटी मैनेज करेगीः अगर किसी संस्था के FCRA रजिस्ट्रेशन की अवधि खत्म हो जाए, रजिस्ट्रेशन कैंसिल हो जाए या रद्द हो जाए, तो विदेशी चंदे से बनी उसकी प्रॉपर्टीज की सुरक्षा, मैनेजमेंट और रखरखाव सरकार द्वारा नामित अथॉरिटी करेगी। यही वो मुख्य प्रावधान है, जिसे FCRA संशोधन विधेयक में शामिल किया गया है। 25 मार्च को लोकसभा में विधेयक पेश हुआ था और अभी संसद में पास होना बाकी है।

सरकार ने संशोधन विधेयक पेश करते हुए तर्क दिया था कि ये बदलाव FCRA के ऑपरेशनल गैप भरने के लिए किए जा रहे हैं। अब तक कोई साफ कानून नहीं था कि जब किसी संस्था का रजिस्ट्रेशन रद्द या खत्म हो जाए, तो विदेशी चंदे से बनी उसकी संपत्ति और बचा पैसा किसके पास जाएगा? डेजिग्नेटेड अथॉरिटी इसी खाली जगह को भरती है। सरकार ने बताया कि उसका मकसद पूरी तरह पारदर्शिता, जवाबदेही व राष्ट्रीय सुरक्षा है।

बजट सत्र के दौरान FCRA संशोधन विधेयक पर चर्चा का नोटिस जारी हुआ था। इसके बाद इंडिया गठबंधन ने संसद के बाहर प्रदर्शन किया था।

बजट सत्र के दौरान FCRA संशोधन विधेयक पर चर्चा का नोटिस जारी हुआ था। इसके बाद इंडिया गठबंधन ने संसद के बाहर प्रदर्शन किया था।

सवाल-2: ईसाई मिशनरीज और NGO’s इसका विरोध क्यों कर रहे हैं?

जवाब: संशोधन विधेयक को लेकर 3 चिंताएं हैं…

1. सालों पुरानी जमीन खोने का डर

  • अगर NGO रजिस्ट्रेशन रिन्यू करवाने के लिए समय पर आवेदन नहीं भेजते हैं या गृह मंत्रालय से उनका आवेदन खारिज हो जाता है, तो संपत्ति सरकार की तरफ से नामित अधिकारी के पास चली जाएगी। NGO को डर है कि इससे सालों में तैयार किया गया इंफ्रास्ट्रक्चर उनके हाथ से निकल जाएगा।
  • कैथोलिन बिशप कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (CBCI) ने गृह मंत्री अमित शाह को विधेयक से जुड़ी चिंता जाहिर की है। उनका कहना है कि NGO के कामकाज से जुड़े फॉर्म भरने में कुछ छोटी-मोटी गलतियां हो जाती है। ऐसी गलतियों पर लाइसेंस रद्द करने या संपत्ति जब्त करने जैसा सख्त एक्शन न लिया जाए। सिर्फ देश-विरोधी गतिविधियों पर ऐसा एक्शन हो।
  • यह भी आशंका जताई जा रही है कि जिनका लाइसेंस बरसों पहले ही खत्म हो चुका, उन पर भी नियम लागू होगा। हालांकि गृह मंत्री शाह ने साफ कहा कि ये संशोधन रेट्रोस्पेक्टिव नहीं होंगे, यानी पुराने मामलों पर लागू नहीं होंगे।
गृह मंत्री अमित शाह ने जुलाई में कैथोलिन बिशप कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (CBCI) के सदस्यों से मिलकर आश्वासन दिया था कि FCRA संशोधन विधेयक ईसाइयों के खिलाफ नहीं है।

गृह मंत्री अमित शाह ने जुलाई में कैथोलिन बिशप कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (CBCI) के सदस्यों से मिलकर आश्वासन दिया था कि FCRA संशोधन विधेयक ईसाइयों के खिलाफ नहीं है।

2. ईसाइयों को टारगेट करने की कोशिश

ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल के अध्यक्ष बिशप जोसेफ डिसूजा का कहना है, ‘यह कानून ईसाई संस्थाओं और उनकी संपत्तियों की सीधी लूट और चोरी है।’

कांग्रेस नेता के. सी. वेणुगोपल ने कहा है, ‘यह बिल अल्पसंख्यकों द्वारा चलाए जा रहे NGO और सामाजिक संस्थाओं को नुकसान पहुंचाएगा।’

अमेरिकी सांसद रिले मूर ने चेतावनी दी है कि अगर यह बिल पास हो गया तो ये भारत-अमेरिका के द्विपक्षीय रिश्तों के लिए चिंता का विषय होगा।

अमेरिकी सांसद रिले मूर ने चेतावनी दी है कि अगर यह बिल पास हो गया तो ये भारत-अमेरिका के द्विपक्षीय रिश्तों के लिए चिंता का विषय होगा।

3. विदेशी फंडिंग कम होने से कामकाज पर असर

कांग्रेस सांसद शशि थरूर के मुताबिक, पहले से लागू सख्त प्रावधानों की वजह से विदेशी फंडिंग में पहले ही 87% तक गिरावट आ चुकी है और हजारों संस्थान बंद हो चुके हैं।

फिलहाल FCRA के तहत करीब 16 हजार संस्थाएं रजिस्टर्ड हैं, जिन्हें हर साल लगभग 22 हजार करोड़ रुपए की विदेशी फंडिंग मिलती है।

स्कूल, अस्पताल और सामाजिक सेवाओं का बड़ा हिस्सा इसी पैसे पर टिका है। NGOs को डर है कि नए नियमों से यह पूरा ढांचा कमजोर पड़ सकता है।

सवाल-3: क्या सरकार इसे पारित करा पाएगी?

जवाब: FCRA संशोधन बिल एक सामान्य विधेयक है। इसे पास कराने के लिए सदन में मौजूद और वोट करने वाले सदस्यों का सिर्फ साधारण बहुमत, यानी 50%+1 की जरूरत है।

लोकसभा में 543 सदस्य हैं। 3 सीटें खाली हैं। अगर सभी सदस्य मौजूद रहते हैं, तो बहुमत के लिए चाहिए 271 वोट। NDA के पास अभी 318 सीटें हैं।

राज्यसभा में 245 सदस्य हैं। बहुमत के लिए 123 वोट चाहिए। NDA के पास 152 है। यानी दोनों सदनों में बिल पारित कराने के लिए सरकार के पास पर्याप्त संख्याबल है।

सवाल-4: फिर सरकार के सामने दुविधा क्या है?

जवाब: असली दुविधा टाइमिंग की है।

इस वक्त सरकार के सामने सबसे बड़ा एजेंडा FCRA विधेयक नहीं, बल्कि परिसीमन बिल पारित करवाना है। जिसके लिए दो-तिहाई बहुमत चाहिए। बजट सत्र के दौरान बिल पेश हुआ, लेकिन पारित नहीं हो सका। 54 वोट कम पड़ गए थे।

अप्रैल में ये बिल गिरने के बाद पीएम मोदी ने कहा था, ‘कल हमारे पास पर्याप्त संख्या नहीं थी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम हार गए हैं। भविष्य में हमें और अवसर मिलेंगे।’

अप्रैल में ये बिल गिरने के बाद पीएम मोदी ने कहा था, ‘कल हमारे पास पर्याप्त संख्या नहीं थी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम हार गए हैं। भविष्य में हमें और अवसर मिलेंगे।’

अब सरकार NDA के बाहर की पार्टियों के समर्थन से बिल पास कराने की जद्दोजहद कर रही है…

  • जून 2026 में तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसद और शिवसेना उद्धव गुट के 6 सांसद NDA समर्थित पार्टियों में शामिल हो गए।
  • झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चा भी बीजेपी को समर्थन कर सकती है। इनके पास 3 सांसद हैं।
  • रिपोर्ट्स के मुताबिक बीजेपी ने एम. के. स्टालिन की DMK से बात की है। इनके पास 22 सांसद हैं।
  • NCP (शरद पवार) की सुप्रिया सुले ने भी कहा है कि अगर सरकार हर राज्य की आधी सीटें बढ़ाती है, तो हम परिसीमन बिल पर समर्थन कर सकते हैं। NCP के पास 8 सांसद हैं।
  • 318+8+22+3= 351 वोट होते हैं। बीजेपी कई विपक्षी सांसदों के भी संपर्क में है ,जो क्रॉस वोटिंग भले न करें, लेकिन वोटिंग से अनुपस्थित रहकर बहुमत का आंकड़ा कम करवा सकते हैं। यानी आदर्श स्थिति में बीजेपी परिसीमन बिल पास करवा सकती है।

लेकिन यहां FCRA संशोधन विधेयक का पेच फंस जाता है। रिपोर्ट्स हैं कि DMK और NCP (शरद) इस विधेयक के खिलाफ हैं। बजट सत्र के दौरान सरकार का समर्थन करने वाली YSR कांग्रेस पार्टी भी बिल से खुश नहीं है।

इन पार्टियों को डर है कि FCRA से उनके ईसाई और मुस्लिम वोट बैंक पर असर पड़ेगा। अगर सरकार इन पार्टियों की सहमति के बिना FCRA बिल पास करवा लेती है, तो परिसीमन बिल पर बहुमत जुटाने में मुश्किल हो जाएगी। वहीं अगर ये पार्टियां FCRA बिल पर सरकार का विरोध करती हैं और फिर परिसीमन बिल पर समर्थन, तो छवि पर असर पड़ेगा।

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