नागौर के डांगावास हत्याकांड का बहुचर्चित प्रकरण। करीब 11 साल पहले 5 दलितों की हत्या हुई। सीबीआई जांच के बाद मेड़ता की विशेष अदालत में लंबा ट्रायल चला। बुधवार को जजमेंट आया और सभी 40 आरोपी संदेह के लाभ में बरी हो गए।
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भास्कर ने कोर्ट के फैसले की कॉपी का एनालिसिस किया। साथ ही दोनों पक्षों की अंतिम बहस को खंगाला। ये पता लगाने का प्रयास किया कि आखिर सीबीआई टीम के तर्क कोर्ट ट्रायल में कहां कमजोर पड़ गए।
पढ़िए- इस मामले में दोनों पक्षों ने क्या-क्या तर्क दिए और कहां CBI कमजोर पड़ गई?
आरोपियों के वकीलों ने CBI इन्वेस्टिगेशन को बताया दूषित
पहला तर्क : CBI ने अपनी चार्जशीट में कुल 40 आरोपी नामजद किए थे। इनके खिलाफ 14 अलग-अलग धाराओं में आरोप लगाए थे। आरोपियों के वकीलों ने बहस में सबसे पहले विवादित 23 बीघा जमीन के कब्जे पर तर्क दिए। कोर्ट को बताया- जमीन पर पीड़ित पक्ष का नहीं आरोपी पक्ष का कब्जा था। मौखिक बयानों से ये साबित भी होता है।
बस्तराराम ने जमीन गिरवी रखकर 1500 रुपए उधार लिए थे। पैसे नहीं चुकाने पर जमीन का बैनामा (विक्रय पत्र) लिखा गया। लेकिन अनुसूचित जाति के व्यक्ति की जमीन सामान्य जाति के व्यक्ति को बेची नहीं जा सकती थी, इसलिए कागजों में बैनामा अनुसूचित जाति के ही व्यक्ति के नाम पर किया गया था। लेकिन वास्तविक कब्जा 1964 से लगातार आरोपी पक्ष का ही चला आ रहा है।

5 अगस्त को मेड़ता के विशेष एसी-एसटी कोर्ट में सुनवाई के दौरान बाहर जमा भीड़।
विवादित जगह को लेकर राजस्व कोर्ट ने घटना से एक दिन पहले ही अस्थायी निषेधाज्ञा (मुकदमे की सुनवाई के दौरान किसी संपत्ति को यथास्थिति रखना) के आदेश दिए थे। आरोपी तो केवल अपनी कब्जे वाली जमीन वापस पाने के लिए पंचायत का फैसला करवाने के लिए वहां इकट्ठा हुए थे।
दूसरा तर्क : आरोपियों ने पहले अवैध कब्जा हटाने के लिए शांतिपूर्ण निवेदन किया था। परिवादी पक्ष 10 मई 2015 को पंचायत में बुलाने पर भी नहीं गया। इसके बाद 14 मई 2015 को फिर से पंचायत के मकसद से ही गांव के लोग जमा हुए थे। यह कोई प्री प्लांड हमला नहीं था। दूसरी तरफ परिवादी पक्ष ने अन्य गांवों से अपने कई रिश्तेदारों को इकट्ठा कर रखा था। उन हालात में दोनों समूहों के बीच अचानक झगड़ा हो गया था।
घटना में फायरिंग से आरोपी पक्ष के रामपाल पुरी की मौत हुई। एक शख्स रामदेव खदाव घायल हुआ। ये घटनाएं एकपक्षीय हमले को झूठा साबित करती हैं। आरोपियों ने ही पीड़ितों को चोट पहुंचाई और उनकी हत्या की हो, यह साबित नहीं होता है। आरोपियों को भी अपनी जान-माल की रक्षा का अधिकार था।

डांगावास में ट्रैक्टर से कुचलकर जिन 5 दलितों की हत्या हुई थी, उनकी श्रद्धांजलि सभा की तस्वीर।
तीसरा तर्क : पुलिस ने प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) में केवल 6 व्यक्तियों को ही नामजद किया था। अगले दिन 13 नाम जोड़े गए, जिसमें परिवादी पक्ष की जाति के भी 2 नाम शामिल थे। मुख्य गवाह ने स्वयं स्वीकार किया कि उसने घबराहट में नाम लिखवाए थे। इसके बाद 40 आरोपी बनाए, जबकि उनकी कोई शिनाख्त-परेड नहीं करवाई गई थी।
एक ही गवाह के पुलिस, सीबीआई और कोर्ट के बयानों में बड़ा विरोधाभास है। इसमें ऐसे व्यक्तियों को भी आरोपी बनाया गया, जिनकी घटनास्थल पर उपस्थिति ही नहीं थी। पीड़ित पक्ष के गवाहों ने भी रामदेव सहित कुछ आरोपियों की घटनास्थल पर अनुपस्थिति कोर्ट ने भी स्वीकार की है। बचाव पक्ष ने इन्वेस्टिगेशन को ही दूषित करार दिया।
चौथा तर्क : सीबीआई टीम यह साबित करने में विफल रही कि किस व्यक्ति ने क्या क्राइम किया। घायल व्यक्ति भी हमलावरों को पहचान नहीं पाए। केवल पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के आधार पर अपराध साबित नहीं होते। 5 लोगों की हत्या के लिए आरोपी ही जिम्मेदार हैं, इसका भी कोई ठोस सबूत नहीं है। सीबीआई टीम अपनी जांच में तथ्यों के डाउट्स क्लियर नहीं कर पाई है, ऐसे में सभी आरोपियों को संदेह का लाभ देकर बरी किया जाए।

अब सीबीआई टीम की बहस सुनिए, वकील बोले- अनाज को भूसे से अलग करना कोर्ट का कर्तव्य
पहला तर्क : पीड़ित पक्ष से CBI के विशेष लोक अभियोजक ने आरोपी पक्ष के वकीलों के तर्कों का विरोध किया। सबसे पहले ये बताया कि- सभी आरोपी गैंग बना कर, 3 ट्रैक्टरों व लगभग 50 मोटरसाइकिलों पर सवार होकर, घटनास्थल पर पीड़ित पक्ष पर हमला करने आए थे। संगठित और हमलावर होकर आने का ये तरीका ही उनका मोटिव साबित करता है।
आरोपी वहां जानलेवा हथियार लाठी, हॉकी, हैमर, धारदार हथियार और वाहन के साथ पहुंचे थे। मतलब पूरी तैयारी के साथ पीड़ित पक्ष पर हमला करने, उनकी प्रॉपर्टी को नुकसान पहुंचाने और उन्हें जान से मारने तक की तैयारी के साथ आए थे। ऐसे में आरोपियों का घटना का मोटिव पूरी तरह से साबित हो जाता है।
149 भारतीय दण्ड संहिता के अनुसार जब ये साबित हो जाए कि हत्या के आरोपी अवैध भीड़ के सदस्य हैं और भीड़ द्वारा की गई घटना का मोटिव क्लियर हो जाए तो उस भीड़ के अपराध में सभी सदस्य बराबर के दोषी हो जाते हैं। सभी का अलग-अलग अपराध सिद्ध करना महत्वपूर्ण नहीं रह जाता।

तस्वीर घटना में घायल एक महिला की है। सीबीआई की चार्जशीट के अनुसार इस केस में कुल 11 लोग घायल हुए थे।
सभी आरोपियों ने एक ही इरादे से परिवादी पक्ष के साथ संगीन मारपीट की। उनकी झोपड़ी और कमरे को ध्वस्त कर दिया। ट्रैक्टरों से पीड़ित पक्ष के लोगों को कुचल दिया और जानलेवा हमला किया। इस घटना में 11 व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हुए और 5 व्यक्तियों की मौत हो गई। ऐसे नृशंस हत्याकांड के आरोपियों को मामूली विरोधाभास पर संदेह का लाभ नहीं दिया जा सकता।
दूसरा तर्क : घायल गवाहों की घटनास्थल पर मौजूदगी उनकी चोटों से स्वयं ही साबित होती है। कानून में घायल गवाहों का विशेष महत्व है। उनकी गवाहियों में मामूली विरोधाभासों से पूरा इन्वेस्टिगेशन अविश्वसनीय नहीं हो जाता। अनाज को भूसे से अलग करना कोर्ट का कर्तव्य है।
आरोपियों की घटनास्थल पर अनुपस्थिति नहीं मानी जा सकती, क्योंकि इन्वेस्टिगेशन के दौरान उन्हीं की सूचनाओं के आधार पर इस्तेमाल हथियारों की बरामदगी हुई थी, जिन पर ह्यूमन ब्लड पाया गया। घायल पीड़ितों ने आरोपियों द्वारा मारपीट कर चोटें पहुंचाने की गवाही भी दी है।

डांगावास गांव में 23 बीघा जमीन को लेकर इस विवाद की शुरुआत 1964 में शुरू हुई थी।
तीसरा तर्क : घटना के समय विवादित जमीन पर पीड़ित पक्ष का ही वास्तविक कब्जा था। वहां, उनका बनाया पक्का कमरा, झोपड़ी, वाहन व उनके परिवारजन मौजूद थे। यह फैक्ट साफतौर पर साबित है।
राजस्व अभिलेख में खातेदारी भी रतनाराम के नाम दर्ज थी, जहां तक पक्षकारों के बीच राजस्व न्यायालय में विवाद, रुपयों के लेनदेन व कथित अवैध बैनामा का सवाल है, इन आधारों पर आरोपियों को ऐसे सीरियस क्राइम में संदेह का लाभ नहीं दिया जा सकता।
जहां राजस्व न्यायालय में पेंडेंसी हो, वहां कानून हाथ में लेकर सैकड़ों की भीड़ के साथ हथियारों से लैस होकर आक्रमण करना निजी प्रतिरक्षा नहीं, बल्कि आक्रामकता है। आरोपियों ने कानून को हाथ में लेकर सीरियस अपराध किया है, जिसके लिए वे पूरी तरह से जिम्मेदार हैं।

फाइनल बहस के दौरान सीबीआई के विशेष लोक अभियोजक राजेश कुमार ने जांच एजेंसी सीबीआई टीम और पीड़ित पक्ष की ओर से तर्क रखे।
चौथा तर्क : रामपाल पुरी की मौत के मामले में अलग मामला दर्ज कर जांच हुई थी, उसमें ऐसा कोई एविडेंस नहीं मिला कि परिवादी पक्ष ने गोली चलाकर हत्या की हो। ऐसे में इस मौत का इस मामले पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।
अगर जांच में कोई गलती रही भी हो तो कानून के अनुसार दोषपूर्ण इन्वेस्टिगेशन का लाभ आरोपियों को नहीं दिया जा सकता, जबकि उसके खिलाफ अन्य विश्वसनीय एविडेंस उपलब्ध हों। ऐसे में आरोपियों को उनके इस सीरियस अपराध के लिए सख्त से सख्त सजा से दंडित किया जाना चाहिए।


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नागौर के डांगावास में 11 साल पहले 23 बीघा जमीन को लेकर हुए विवाद में 5 दलितों की हत्या कर दी गई थी। बुधवार को मेड़ता के एससी-एसटी स्पेशल कोर्ट के जज आशीष बिजराणियां ने फैसला सुनाते हुए सभी 40 आरोपियों को बरी कर दिया। (CLICK कर पढ़ें)
