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बिना वर्दी के फौजी, जिन्हें कहा जाता 'जिंदा शहीद':पंजाब में शहीद दोस्त की आखिरी बात ने बदली जिंदगी; अशोक चक्र विजेता की बहन को SDM बनवाया




आज 15 अगस्त है। पूरा देश आजादी का 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। तिरंगा फहराया जा रहा है। मगर, पंजाब का एक शख्स उन घरों को याद कर रहा है, जहां जहां तिरंगे में लिपटा कोई अपना कभी आखिरी बार लौटा था। ये शख्स हैं पंजाब में पठानकोट के रहने वाले कुंवर रविंदर सिंह विक्की। जब शहीदों के अंतिम विदाई के वक्त जुटी भीड़ वहां से हट जाती है तो विक्की शहीद परिवार के साथ खड़े रहते हैं। 400+ शहीद जवानों की अंतिम यात्राएं, 5 हजार+ श्रद्धांजलि कार्यक्रम और 300+ दिन हर साल शहीद परिवारों के बीच। खुद फौजी नहीं, फिर भी सेना और आम लोगों के बीच इन्हें ‘जिंदा शहीद’ माना जाता है। एक दोस्त की शहादत ने उन्हें इस राह पर क्यों उतारा? कैसे शहीद परिवारों के हक की लड़ाई उनका मिशन बनी? कैसे अशोक चक्र विजेता शहीद की बहन को SDM की नौकरी दिलाने के लिए सालों संघर्ष किया? और क्यों विक्की मानते हैं कि शहादत के बाद परिवार को सबसे ज्यादा साथ की जरूरत होती है? पढ़िए, पंजाब के ‘जिंदा शहीद’ रविंदर विक्की के 30 साल के सफर की कहानी… लेफ्टिनेंट दोस्त की बात व उनकी शहादत से बदला जीवन
विक्की के मुताबिक, उनके बचपन के दोस्त लेफ्टिनेंट गुरदीप सलारिया 23 पंजाब रेजीमेंट में तैनात थे। दिसंबर 1995 में छुट्टी पर आए गुरदीप से उनकी पठानकोट के सलारिया चौक पर मुलाकात हुई थी। ये चौक गोरखा रेजिमेंट के मरणोपरांत परमवीर चक्र विजेता कैप्टन गुरबचन सलारिया के नाम पर था। वहां गुरदीप ने विक्की से कहा था कि मौत ऐसी हो, जिसे पीढ़ियां याद रखें और जिसके नाम पर यादगारें बनें। विक्की ने उन्हें ऐसी बात न करने के लिए कहा था। इसके कुछ समय बाद गुरदीप ड्यूटी पर लौट गए। 14 जनवरी 1996 को विक्की को जिला सैनिक बोर्ड से उनकी शहादत की सूचना मिली। गुरदीप के जाने के बाद विक्की के मन में सवाल उठा कि जिस परिवार का इकलौता बेटा देश पर कुर्बान हो गया, उसके साथ कौन खड़ा होगा। यहीं से शहीद परिवारों के लिए काम करने का फैसला लिया। अप्रैल 1996 में शहीद सैनिक परिवार सुरक्षा परिषद का गठन किया गया। गुरदीप के पिता रिटायर्ड कर्नल सागर सिंह सलारिया संस्था के पहले अध्यक्ष बने।
400 से ज्यादा शहीदों की अंतिम यात्रा, 5 हजार+ कार्यक्रम
तीन दशक के सफर में विक्की 400 से ज्यादा शहीद जवानों की अंतिम यात्रा में शामिल हो चुके हैं। वे परिवारों के घर पहुंचकर उनके दुख में साथ खड़े होते हैं और उनकी मांगों को प्रशासन तक पहुंचाते हैं। संस्था के अनुसार, अब तक 5 हजार से ज्यादा श्रद्धांजलि और देशभक्ति कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं। हर साल करीब 200 शहीद सैनिकों के बलिदान दिवस मनाए जाते हैं। इन कार्यक्रमों में शहीद परिवारों को सम्मानित किया जाता है और युवाओं को भारतीय सेना में शामिल होने के लिए प्रेरित किया जाता है। संस्था का दावा है कि उसने 300 से ज्यादा शहीद परिवारों को अडॉप्ट किया है। गुरदासपुर और पठानकोट क्षेत्र में 100 से ज्यादा सरकारी स्कूलों और यादगारी गेटों का नाम अमर शहीदों के नाम पर करवाने में भी परिषद की भूमिका रही है। पहला संघर्ष- स्कूल का नाम शहीद के नाम पर रखवाया
संस्था के शुरुआती संघर्षों में साल 1996 में लेफ्टिनेंट गुरदीप सलारिया के नाम पर तारागढ़ के सरकारी स्कूल का नाम रखने की मांग भी शामिल थी। नेताओं और प्रशासन की ओर से आश्वासन मिलते रहे, लेकिन नाम नहीं बदला गया। इसके बाद 1998 में गुरदीप के पिता कर्नल सागर सिंह सलारिया धरने पर बैठ गए। उन्होंने सरकार को शौर्य चक्र लौटाने की बात भी कही। दो दिन चले संघर्ष के बाद तारागढ़ के स्कूल का नाम बदलकर शहीद लेफ्टिनेंट गुरदीप सिंह सलारिया मेमोरियल सीनियर सेकेंडरी स्कूल, तारागढ़ किया गया। गुरदीप सलारिया 23 पंजाब रेजीमेंट के शौर्य चक्र विजेता अधिकारी थे। उनके नाम पर स्कूल में बलिदान दिवस के कार्यक्रम आज भी आयोजित होते रहे हैं। अशोक चक्र विजेता की बहन को SDM बनवाया
2 जनवरी 2004 को जम्मू रेलवे स्टेशन पर आतंकियों ने हमला किया था। लेफ्टिनेंट त्रिवेणी सिंह ने क्विक रिएक्शन टीम का नेतृत्व करते हुए आतंकियों का मुकाबला किया और यात्रियों की जान बचाते हुए शहीद हो गए। उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। शहादत के बाद परिवार को नौकरी देने का आश्वासन मिला, लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ा। उनके पिता कैप्टन जनमेज सिंह ठाकुर ने बेटी ज्योत्सना सिंह की नौकरी के लिए सरकार और प्रशासन से संपर्क किया। विक्की की शहीद सैनिक परिवार सुरक्षा परिषद ने परिवार के साथ मिलकर कानूनी और प्रशासनिक लड़ाई लड़ी। लंबी प्रक्रिया के बाद ज्योत्सना सिंह को सरकारी नौकरी मिली। मूल जानकारी के अनुसार, वे अब एसडीएम मुकेरियां के पद पर कार्यरत हैं। विक्की को 2001 में मिला ‘जिंदा शहीद’ नाम
विक्की के मुताबिक, वर्ष 2000 में दिल्ली में उनकी मुलाकात ऑल इंडिया एंटी टेररिस्ट फ्रंट के अध्यक्ष मनिंदरजीत सिंह बिट्टा से हुई। उनके काम से प्रभावित बिट्टा परिषद के कई कार्यक्रमों में शामिल हुए। वर्ष 2001 में एक कार्यक्रम में मंच से विक्की को ‘बिना वर्दी का सैनिक’ और ‘जिंदा शहीद’ कहकर संबोधित किया गया। यह कोई औपचारिक नाम तो नहीं लेकिन अब यही नाम उनकी पहचान बन गया। सेना की विभिन्न यूनिटों में होने वाले कार्यक्रमों में भी उन्हें इसी नाम से संबोधित किया जाता है। विक्की खुद कहते हैं कि वे वर्दी नहीं पहनते, लेकिन पिछले तीन दशक से सैनिकों और उनके परिवारों के लिए काम करना ही उनका मिशन है। राष्ट्रपति से सम्मान, सेना से कमेंडेशन कार्ड और बैज रविंदर विक्की को उनकी सेवाओं के लिए राज्य, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिलते गए। 15 दिसंबर 2024 को नई दिल्ली में तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी के आवास पर आयोजित ‘एट होम’ कार्यक्रम में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें सम्मानित किया। 2020 में तत्कालीन आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने उन्हें कमेंडेशन कार्ड और प्रशस्ति पत्र दिया। 2022 में लेफ्टिनेंट जनरल पुष्पिंदर सिंह ने उन्हें मेडल से सम्मानित किया। पंजाब के तत्कालीन राज्यपाल वीपी सिंह बदनौर ने गणतंत्र दिवस के राज्य स्तरीय समारोह में उन्हें स्टेट अवार्ड दिया। कनाडा के नागरिक पीटरसन की ओर से उन्हें एक एनआरआई के माध्यम से ‘प्राइड ऑफ इंडिया’ सम्मान दिए जाने की जानकारी भी मूल विवरण में दी गई है। विक्की के अनुसार, 2022 में उन्हें भारतीय सेना की ओर से कमेंडेशन पत्र और कमेंडेशन बैज मिला। उनका कहना है कि किसी सिविलियन को यह सम्मान मिलना दुर्लभ है। उनके लिए यह बैज इसलिए खास है क्योंकि वे इसे सैनिकों और उनके परिवारों की सेवा के लिए सेना की ओर से मिले सम्मान के रूप में देखते हैं। शहीद परिवारों के लिए विक्की की 2 प्रमुख मांगें शहीद परिवारों संग अपने परिवार की जिम्मेदारी भी
कुंवर रविंदर सिंह विक्की का जन्म 31 अक्टूबर 1970 को पठानकोट के गांव सैदीपुर में सूबेदार बलवान सिंह और राजकुमारी के घर हुआ। उन्होंने दीनानगर के सरकारी स्कूल से पढ़ाई की और इसके बाद एसएसएम कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। उनकी पत्नी प्रो. वंदना देवी एसएसएम कॉलेज दीनानगर में प्रोफेसर हैं। बेटी वंशिका ठाकुर 22 साल की हैं और जीएनडीयू से लॉ की पढ़ाई कर रही हैं। बेटा उदयप्रताप सिंह 15 साल का है और नौवीं कक्षा में पढ़ता है। विक्की के पिता रिटायर्ड नायब सूबेदार बलवान सिंह का करीब दो साल पहले निधन हुआ। प्राइवेट नौकरी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ विक्की शहीद परिवारों के लिए काम करते रहे हैं। कई बार शहीद परिवार की जरूरत की वजह से वह परिवार को कम समय दे पाते हैं, लेकिन इसमें परिवार उनकी पूरी मदद करता है। अंतिम इच्छा: ‘मेरी आखिरी सांस भी शहीद की मां के आंसू पोंछते निकले’
तीन दशक से शहीद परिवारों के बीच काम कर रहे विक्की का कहना है कि शहीद परिवारों को केवल आर्थिक मदद नहीं, बल्कि साथ और सम्मान की भी जरूरत होती है। विक्की की इच्छा है कि उनकी आखिरी सांस भी किसी शहीद की मां के आंसू पोंछते हुए या उस बहन का हौसला बढ़ाते हुए निकले, जिसने देश के लिए अपना भाई या पति खोया है। ********* ये खबर भी पढ़ें: पंजाब का बाग, जहां भारतीय सैनिक तोप से बांधकर उड़ाए: बरगद का पेड़, जिस पर क्रांतिकारियों को फ़ांसी पर लटकाया, 5 बार नाम बदला जालंधर का कंपनी बाग- आज यहां बच्चे खेलते हैं, लोग सैर करते हैं। लेकिन कभी यहां अंग्रेजों का खौफ था। करीब 300 साल पुराना बरगद का पेड़ आज भी खड़ा है, जिस पर अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों को लटकाकर फांसी दी थी। (पढ़ें पूरी खबर)



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