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किसान ने रेगिस्तानी जमीन में उगाई हरियाणा वाली ज्वार:एक महीने में पौधे 10-12 फीट के हुए; नर्सरी और डेयरी फार्मिंग से भी बढ़ी इनकम




जोधपुर जिले के पीपाड़ जालीवाड़ा खुर्द के सुमेरसिंह कछवाहा ने कृषि विज्ञान से पढ़ाई की है। परिवार पारंपरिक खेती करता था, जिससे सालाना 3 से 3.5 लाख रुपए मिल पाते थे। परिवार को खर्चे के लिए मजबूरी में दूसरे काम करने पड़ते थे। सुमेरसिंह सरकारी नौकरी के लिए तैयारी के साथ खेती में भी काम करने लगे। आधुनिक कृषि तकनीक मल्चिंग अपनाकर अपनी किस्मत बदल दी। काजरी के वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन और आत्मा परियोजना के भ्रमण में उन्होंने नवाचार जाने। उनके पास यूं तो 60 बीघा जमीन है, लेकिन 12 महीने खेती योग्य 13 बीघा ही है। इसमें वे साल-दर-साल नवाचार कर रहे हैं। सालाना आय 14 से 15 लाख रुपए पहुंच गई है। साढ़े तीन बीघा में नर्सरी बनाई
सुमेरसिंह ने बताया कि आत्मा परियोजना के तहत हरियाणा और गुजरात के कृषि संस्थानों में जाने का मौका मिला था। वहां ज्वार की खेती दी। जोधपुर स्थित काजरी के कृषि वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में यहां भी ज्वार उगाई, जो अच्छी लहलहा रही है। सब्जी की पौध तैयार करने की वैज्ञानिक तकनीक सीखकर उन्होंने साढ़े तीन बीघा में नर्सरी भी स्थापित की। नर्सरी में फूलगोभी, पत्तागोभी, मिर्च, बैंगन और टमाटर की सालाना करीब 2 लाख हाइब्रिड पौध तैयार करने लगे। इससे सालाना 5 लाख की आय होती है, साथ ही इलाके के अन्य किसानों को भी गुणवत्तापूर्ण पौधे मिल जाते हैं। 7 बीघा जमीन में सब्जियों का उत्पादन
7 बीघा जमीन में सब्जियों का उत्पादन शुरू किया। गोभी, टमाटर, हरी प्याज, मिर्च, लौकी और चौलाई आदि उगाते हैं, जिनसे खर्च निकालने के बाद सालाना 8 लाख तक की आय हो जाती है। उनके पास दो कुएं और एक डिग्गी है। 13 बीघा जमीन में बूंद-बूंद सिंचाई का जाल बिछाया हुआ है। बाकी जमीन पर वे मूंग, मोठ, बाजरा, ग्वार, तिल, ईसबगोल, गेहूं और रायड़ा जैसी पारंपरिक फसलों से भी सालाना 2.5 से 3 लाख बचा लेते हैं। घी से कर रहे डेढ़ लाख की एक्स्ट्रा इनकम
इनके पास उन्नत प्रजाति की 4 गायें हैं, जिनसे प्रतिदिन 8-10 लीटर दूध मिलता है। परिवार की खपत के बाद बचे दूध से घी बनाकर सालाना 1 से 1.5 लाख अतिरिक्त कमाई कर रहे हैं। वहीं, पशुओं के अपशिष्ट से जैविक खाद तैयार करते हैं, जिससे रसायनों का खर्च घटता है और मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बनी रहती है। इस बार आईसीआर दिल्ली से विकसित ज्वार की किस्म की बुआई की है। एक महीने में ही इसकी ऊंचाई 12 फीट तक पहुंच गई है।



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