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सुखबीर बादल को सुप्रीम कोर्ट से झटका:AKJ को BKI को राजनीतिक फ्रंट बताया था; मानहानि केस रद्द करने की याचिका खारिज




शिरोमणि अकाली दल (SAD) के अध्यक्ष और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल को 9 साल पुराने मानहानि मामले में सुप्रीम कोर्ट से करारा झटका लगा है। कोर्ट ने अखंड कीर्तनी जत्था (AKJ) को प्रतिबंधित आतंकी संगठन बब्बर खालसा इंटरनेशनल (BKI) से जोड़ने संबंधी कथित टिप्पणी के केस पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। सुखबीर बादल ने 2017 में चुनाव के दौरान एकेजे के संबंध बीकेआई से होने का दावा किया था और रजिंदरपाल को संस्था का जनरल सेक्रेटरी बताया था। जिसके बाद रजिंदरपाल सिंह ने सुखबीर बादल के खिलाफ याचिका दायर की और उस याचिका को निरस्त करने की मांग रखी। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें ट्रायल कोर्ट में जारी आपराधिक मानहानि की कार्यवाही को खारिज करने की याचिका नामंजूर कर दी गई थी। कोर्ट के इस सख्त रुख के बाद अब चंडीगढ़ की निचली अदालत में सुखबीर बादल के खिलाफ आपराधिक मानहानि का मुकदमा (ट्रायल) जारी रहेगा। राजनीतिक रूप से संवेदनशील इस मामले में शीर्ष अदालत के फैसले के बाद पंजाब की राजनीति में एक बार फिर गर्माहट आ गई है। क्या है पूरा मामला सिलसिलेवार जानिए— 2017 चुनाव प्रचार के दौरान उपजा विवाद: यह पूरा विवाद जनवरी 2017 का है, जब पंजाब विधानसभा चुनावों का दौर चल रहा था। 4 जनवरी 2017 को दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मोहाली निवासी राजिंदर पाल सिंह के आवास पर जाकर उनसे मुलाकात की थी। इसके तुरंत बाद सुखबीर सिंह बादल ने मीडिया में एक बयान दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि केजरीवाल पंजाब आकर कट्टरपंथियों से मुलाकात कर रहे हैं और उन्होंने अखंड कीर्तनी जत्था (AKJ) के नेताओं के साथ नाश्ता किया है, जिसे उन्होंने बब्बर खालसा इंटरनेशनल (BKI) का राजनीतिक फ्रंट बताया। मानहानि का आरोप लगाकर की याचिका दायर: शिकायतकर्ता राजिंदर पाल सिंह ने खुद को AKJ का आधिकारिक प्रवक्ता बताते हुए कहा कि बादल के इस निराधार बयान से उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा और संगठन की छवि को भारी नुकसान पहुंचा है। उन्होंने कहा कि एक धार्मिक संगठन को सीधे तौर पर एक प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन से जोड़ना गंभीर और अपमानजनक आरोप है। इसके बाद उन्होंने चंडीगढ़ की जिला अदालत में सुखबीर बादल के खिलाफ आपराधिक मानहानि की शिकायत (IPC की धारा 499, 500 और 501 के तहत) दर्ज कराई। निचली अदालत के समन और हाईकोर्ट की चुनौती: मामले की प्रारंभिक सुनवाई के बाद चंडीगढ़ की न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने 4 मार्च 2020 को प्रथमदृष्टया मामला बनता देख सुखबीर बादल के खिलाफ समन जारी कर दिया। समनिंग ऑर्डर को रद्द कराने के लिए बादल ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का रुख किया। हालांकि, हाईकोर्ट ने 17 अक्टूबर 2025 को याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि इस चरण में आपराधिक मानहानि की प्रक्रिया को रोकने का कोई वैधानिक आधार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में दलीलें और याचिका खारिज: हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए सुखबीर बादल ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। बादल की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि शिकायतकर्ता ने यह साबित नहीं किया है कि वह AKJ के अधिकृत प्रवक्ता हैं, और केवल मीडिया रिपोर्टों के आधार पर मानहानि का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री और बयानों का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया और याचिका को खारिज कर दिया। अब आगे क्या होगा: सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि सुखबीर बादल मानहानि के दोषी साबित हो गए हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मानहानि का मुकदमा रद्द नहीं होगा और चंडीगढ़ की निचली अदालत में ट्रायल जारी रहेगा। इस मामले में पहले भी बादल की पेशी न होने पर गैर-जमानती वारंट जारी हो चुका है, हालांकि बाद में उन्हें जमानत मिल गई थी। अब ट्रायल कोर्ट में साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर आगे की कानूनी कार्यवाही शुरू होगी।



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