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पवन के. वर्मा का कॉलम:नौकरशाही को मजबूत करने के लिए कई सुधार जरूरी हैं




एक समय था जब एक अच्छे प्रशासनिक अधिकारी से ‘ना’ कहने की क्षमता रखने की अपेक्षा की जाती थी। ऐसा अधिकारी राजनेता से असहमति जताते समय इस बात को लेकर संकोच नहीं करता था कि कहीं इसे निष्ठा का अभाव तो न समझ लिया जाएगा। वहीं, राजनेता भी अकसर अपने दृढ़ विश्वास के साथ खड़े रहने वाले अधिकारी के साहस का सम्मान करते थे। वह सम्बंध अब धीरे-धीरे खत्म होता दिखाई दे रहा है। प्रशासनिक अधिकारियों को कभी भारत की ‘स्टील फ्रेम’ कहा जाता था। उनसे अपेक्षा की जाती थी कि देश में भले राजनीतिक बदलाव होते रहें, लेकिन वे निरंतरता कायम रखेंगे और असुविधाजनक होने पर भी हमेशा पेशेवर सलाह ही देंगे। मंत्री राजनीतिक इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन सिविल सेवक से अपेक्षा की जाती थी कि वह मंत्री को यह बताए कि प्रशासनिक रूप से क्या संभव है, कानूनी रूप से क्या स्वीकार्य है और संस्थागत दृष्टि से क्या उचित है। राजनेताओं को ‘सहयोगी अधिकारियों’ की जरूरत हमेशा से रही है। नौकरशाह भी दोषमुक्त नहीं हैं। वास्तव में, पूरी संभावना इसी बात की होती है कि खुद अधिकारी ने ही राजनेता को सुझाया हो कि वह समझौता करने को राजी है। लेकिन इस रवैये ने प्रशासनिक-सेवा के उस धर्म को कमजोर किया है, जिसके अनुसार अधिकारी की पहली निष्ठा उस संस्था के प्रति होनी चाहिए, जिसकी वह सेवा करता है। उसकी निष्ठा संविधान, कानून व जनहित के प्रति होनी चाहिए- न कि पद पर बैठे किसी व्यक्ति के प्रति। नौकरशाही को समझौतापरस्ती के लाभ भी मिलते हैं : मनचाही पोस्टिंग, कार्यकाल में विस्तार, पदोन्नति, सत्ता के करीब रहने का अवसर या महज यह आश्वासन कि करियर में कोई बाधा नहीं डाली जाएगी। नतीजे में हमें मिलता है पारस्परिक सुविधाओं पर टिका एक गठजोड़। राजनेता वफादारी चाहता है; नौकरशाह संरक्षण। दोनों एक-दूसरे की जरूरतें पूरी करते हैं। मुझे न्यूयॉर्क की एक घटना याद आती है, जब एक मंत्री के निजी सचिव (आईएएस अधिकारी) को मंत्री की पत्नी की अगवानी के लिए हवाई अड्डे पर पांच मिनट देरी से पहुंचने पर सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया था। पर उन्होंने बिना कोई विरोध किए उसे सह लिया, क्योंकि वे वह पद खोना नहीं चाहते थे। अनुबंधित सेवा-शर्तों के तहत काम करने वाले अधिकारियों को अगर इस तरह सत्ता के सामने समर्पण करना पड़ता है तो यह लज्जास्पद है। उनके लिए पद से मिले आत्मसम्मान को फिर से हासिल करना जरूरी है, क्योंकि प्रशासनिक-सेवा ही वह जगह है, जहां सरकार के फैसले नागरिकों के लिए ठोस वास्तविकताओं में बदलते हैं- चाहे जमीन का अधिग्रहण हो, ठेके का आवंटन, लाइसेंस देना हो, किसी कर्मचारी का तबादला, किसी मकान को गिराना, सड़क का निर्माण या किसी लोगों को किसी योजना का लाभ देना हो। भ्रष्टाचार तभी फलता-फूलता है, जब संस्थाएं भी उसमें सहभागी बन जाएं। किसी अनुचित काम के लिए नेता को ऐसे अधिकारी की जरूरत होती है, जो उसे अंजाम देने में मदद करे। वहीं नियमों की अनदेखी करने के एवज में संरक्षण चाहने वाले अधिकारी को उसे छत्रछाया देने वाले राजनेता की जरूरत होती है। यह निर्भरता अपने को मजबूत करती रहती है, जिससे ईमानदार अधिकारी अलग-थलग पड़ जाते हैं। वास्तव में, ऐसे माहौल में ईमानदार अधिकारी ही अवांछित व्यक्ति बन जाता है। उसका बार-बार तबादला किया जाता है, उसे ‘अड़ियल’ या ‘बाधा डालने वाला’ बताया जाता है, उस पर ‘टीम भावना’ की कमी का आरोप लगाया जाता है। यदि प्रशासक अपनी निष्पक्षता खो दें, तो नागरिकों के अधिकार केवल कानून पर निर्भर नहीं रह जाते, बल्कि इस पर भी निर्भर करने लगते हैं कि उसकी जान-पहचान किससे है, वह किस गुट से जुड़ा है और कितनी घूस दे सकता है। यह कानून के राज की मूल भावना के विपरीत है। इसलिए ‘स्टील फ्रेम’ को फिर से मजबूत करने के लिए सुधार जरूरी हैं। पहला, तबादलों-नियुक्तियों की प्रक्रिया को पारदर्शी और स्पष्ट नियमों से बंधा होना चाहिए तथा सद्भावना से काम करने वाले अधिकारियों को संरक्षण मिलना चाहिए। दूसरा, महत्वपूर्ण फैसलों-निर्देशों का लिखित रिकॉर्ड अनिवार्य किया जाना चाहिए, ताकि अनौपचारिक निर्देशों से मुकर जाने की गुंजाइश कम हो। तीसरा, व्हिसलब्लोअर अधिकारियों को विश्वसनीय संस्थागत संरक्षण मिलना चाहिए। चौथा, पेशेवर दक्षता और ईमानदारी को पुरस्कृत किया जाना चाहिए। राजनेताओं को भी समझना होगा कि उनसे असहमति रखने वाला अधिकारी जरूरी नहीं कि उनका विरोधी भी हो। गैरकानूनी आदेशों का विरोध करने वाले व्हिसलब्लोअर अधिकारियों को संरक्षण मिलना चाहिए। पेशेवर दक्षता और ईमानदारी को पुरस्कृत किया जाना चाहिए। राजनेताओं को भी समझना होगा कि उनसे असहमति रखने वाला अधिकारी उनका विरोधी नहीं है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)



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