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शशि थरूर का कॉलम:आज के भारत पर एकतरफा समझ कारगर नहीं हो सकती




पिछले महीने नरेंद्र मोदी देश के सबसे लंबे समय तक लगातार पद पर रहने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री बन गए थे। उन्होंने स्वतंत्रता-संग्राम के नायक जवाहरलाल नेहरू को पीछे छोड़ा, जिन्होंने पहले आम चुनाव के बाद 4,398 दिन पद पर कार्य किया था। हालांकि नेहरू ने उससे पहले भी पांच साल तक भारत का नेतृत्व किया था और इंदिरा गांधी भी कुल मिलाकर अधिक समय तक प्रधानमंत्री पद पर रहीं, लेकिन लगातार नहीं। मोदी नि:संदेह स्वतंत्र-भारत के तीन सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक के रूप में उनकी श्रेणी में आते हैं। मोदी पहले ही 1947 के बाद भारत के सबसे गहरे ‘री-अलाइनमेंट’ का नेतृत्व कर चुके हैं, जिसके चलते हमने आर्थिक आधुनिकीकरण और विकास में चकाचौंध कर देने वाली प्रगति देखी है। हालांकि संस्थाओं की स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के संरक्षण के प्रश्न पर हमने चुनौतियों का भी सामना किया है। मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धि अत्याधुनिक तकनीकी और बुनियादी ढांचे का निर्माण रही है, जिसने 1.4 अरब से अधिक लोगों के जीवन को मौलिक रूप से बदल दिया है। 2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले करोड़ों भारतीय औपचारिक बैंकिंग क्षेत्र से बाहर थे। अनौपचारिक विकल्पों पर उनकी निर्भरता ने भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया था। अपने पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह द्वारा शुरू की गई पहल पर आगे बढ़ते हुए, मोदी एक नई प्रणाली काे अमल में लाए, जिसने पारंपरिक बैंकिंग संरचनाओं को दरकिनार कर दिया। इसके बजाय जीरो-बैलेंस बैंक खातों (जन धन योजना), बायोमेट्रिक पहचान पत्रों (आधार) और मोबाइल नंबरों को जोड़ दिया गया। इस ‘जेएएम’ त्रिमूर्ति ने ही यूपीआई को जन्म दिया है, जो एक सार्वजनिक, रीयल-टाइम भुगतान प्रोटोकॉल है और सड़क किनारे बैठे विक्रेताओं से लेकर तकनीकी दिग्गजों तक सभी को तुरंत लेनदेन में सक्षम बनाता है। इस दृष्टिकोण ने डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर (डीबीटी) प्रणाली का भी विस्तार संभव बनाया, जिसके तहत सब्सिडी और लाभ सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में जमा किए जाते हैं। 2013 में शुरुआत के बाद से ही डीबीटी ने अन्य कल्याणकारी योजनाओं के साथ मिलकर तकरीबन 25 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालने में मदद की है। मध्यस्थों को बीच में से हटाकर इस प्रणाली ने भ्रष्टाचार पर भी अंकुश लगाया है। हालांकि अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्र अभी भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं हैं। बुनियादी ढांचे के विकास के लिए भी युद्ध-स्तर की तत्परता दिखाई गई है और राजमार्गों, हवाई अड्डों और हाई-स्पीड रेल नेटवर्क में रिकॉर्ड-तोड़ निवेश हुआ है। बंदरगाहों का आधुनिकीकरण और विस्तार किया जा रहा है। गांवों में बिजली पहुंचाई जा चुकी है। 10 करोड़ से अधिक घरों में- जो पहले सामुदायिक कुंओं पर निर्भर थे- पाइप के जरिए स्वच्छ पानी पहुंचाया गया है। लेकिन विदेश नीति में मोदी ने नेहरू का ही अनुसरण किया है। वैश्विक भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में पक्षपातपूर्ण रुख अपनाने के बजाय उन्होंने रणनीतिक स्वायत्तता के प्रति भारत की लंबे समय से चली आ रही प्रतिबद्धता को बनाए रखा है और ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ के सिद्धांत को आगे बढ़ाया है। अलबत्ता गलतियां भी हुई हैं। उदाहरण के लिए, भारत को ईरान युद्ध में खुद को एक तटस्थ पक्ष और संभावित मध्यस्थ के रूप में स्थापित करना चाहिए था, न कि यह धारणा बनने देनी चाहिए थी कि वह अमेरिका और इजराइल के पक्ष में है। दूसरी तरफ यह भी है कि हिंदुत्व का नजरिया भारत की सांस्कृतिक पहचान को 80% आबादी की हिंदू विरासत में ही निहित करने का प्रयास करता है। भारत के मुस्लिम और ईसाई अल्पसंख्यकों के लिए इसने सामाजिक और राजनीतिक रूप से हाशिए पर होने की बढ़ती भावना में योगदान दिया है। आलोचक यह भी चेतावनी देते हैं कि भारत की बहुलतावादी सुरक्षात्मक व्यवस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है। स्वतंत्र संस्थाओं को कमजोर करने के लिए भी सरकार की आलोचना की जाती रही है। बेशक भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है, लेकिन हर साल वर्कफोर्स में प्रवेश करने वाले लाखों युवाओं के लिए पर्याप्त उच्च-गुणवत्ता वाली औपचारिक क्षेत्र की नौकरियां नहीं सृजित हो सकी हैं। तो कुल मिलाकर, मोदी के कार्यकाल में भारत न तो एक विशुद्ध आर्थिक चमत्कार रहा है और न ही लोकतांत्रिक पतन का कोई सीधा-सरल मामला। हम एक महत्वाकांक्षी, शक्तिशाली देश हैं, जो अपना रास्ता खुद बना रहे हैं। दुनिया को इन जटिल शर्तों पर ही हमें स्वीकारना होगा। नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भारत न तो एक विशुद्ध आर्थिक चमत्कार रहा है और न ही लोकतांत्रिक पतन का कोई सरलीकृत मामला। यह एक महत्वाकांक्षी, शक्तिशाली देश है जो अपना रास्ता खुद बना रहा है। दुनिया को इन जटिल शर्तों पर ही इसे स्वीकारना होगा।
(@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)



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