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Virag Gupta Column | AI Data Centers Energy & Environment Impact India


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2 घंटे पहले

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विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट के वकील और 'डिजिटल कानूनों से समृद्ध भारत' के लेखक - Dainik Bhaskar

विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट के वकील और ‘डिजिटल कानूनों से समृद्ध भारत’ के लेखक

अमेरिका में आगामी नवम्बर में होने जा रहे मध्यावधि चुनावों में डेटा सेंटरों से पानी, ऊर्जा और पर्यावरण को हो रही क्षति का मुद्दा जोर पकड़ने लगा है। भारी विरोध के बाद सिर्फ 3 महीनों में ही लगभग 75 डेटा सेंटर्स में 130 अरब डॉलर के प्रोजेक्ट्स पर काम रुक गया है।

चूंकि एआई क्रांति से भारी मुनाफा कमाने के लिए बड़े डेटा सेंटर्स जरूरी हैं, लिहाजा इन्हें अब भारत में लगाने की कोशिश हो रही है। यानी अमेरिका में जिन पर रोक लगाई जा रही है, उन्हीं को लेकर भारत में उत्साह का माहौल है।

शहरों में बड़े पैमाने पर कचरा होता है, लेकिन कोई भी अपने घर के नजदीक कचराघर नहीं बनने देना चाहता। अमेरिका के डेटा सेंटर्स भी “लाक्षागृह’ की तरह हैं। उन्हें हतोत्साहित करने के बजाय भारत में उन्हें सस्ती जमीन, टैक्स और पर्यावरण कानूनों से छूट मिलना खतरनाक हो सकता है। डिजिटल क्रांति के नाम पर चल रहे डेटा सेंटर से जुड़े 5 पहलुओं को समझना जरूरी है।

1. पब्लिक रिकॉर्ड्स एक्ट के अनुसार सरकारी डेटा, रिजर्व बैंक के 6 अप्रैल 2018 के नियमों के अनुसार डिजिटल पेमेंट डेटा और 2023 के डेटा सुरक्षा कानून के अनुसार डेटा की सुरक्षा और स्थानीयकरण जरूरी है। देश की सीमाओं के भीतर महत्वपूर्ण और गैर-महत्वपूर्ण डेटा का संग्रहण स्थानीयकरण कहलाता है। इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू है, हमारे डेटा पर हमारा नियंत्रण, जो देश को सूचना लीक होने, पहचान की चोरी, सुरक्षा आदि समस्याओं के प्रति अधिक प्रतिरोधी बनाता है। लोकसभा में 11 फरवरी और 18 मार्च 2026 को सरकारी जवाब से लगता है कि इन डेटा सेंटरों में भारत के डेटा का स्थानीयकरण होगा। लेकिन यह धारणा गलत है।

2. जनता और किसान बिजली की कमी से जूझ रहे हैं। लेकिन डेटा सेंटरों को रियायती दरों पर 24 घंटे बिजली देने के नियम बन रहे हैं। केंद्रीय मंत्री प्रहलाद जोशी के अनुसार गैर-जीवाश्म ईंधन की 500 गीगावाट जरूरत को पूरा करने के लिए 30 लाख करोड़ का निवेश चाहिए। लोगों से पेट्रोल और डीजल बचाने के लिए कहा जा रहा है, लेकिन भीमकाय जनरेटर सेट से चलने वाले डेटा सेंटरों के लिए डीजल की खपत और पर्यावरण को हो रही क्षति का कोई मूल्यांकन सामने नहीं आ रहा।

3. आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में एक स्थानीय मंदिर की 160 एकड़ भूमि को विवादित रूप से गूगल के एक डेटा सेंटर के लिए आवंटित किया गया है। प्रोजेक्ट स्थल के बगल में जलाशय और कम्बलकोंडा वन्य जीव अभयारण्य भी है। लेकिन कानून की अनदेखी करके 1 किमी दायरे में डेटा सेंटर के निर्माण की राज्य सरकार ने अनुमति दे दी है।

बड़े उद्योगों और व्यावसायिक निर्माण के लिए 2006 के कानून के अनुसार पर्यावरण की ईआईए अनुमति जरूरी है। लेकिन गूगल की आड़ में एसपीवी कम्पनियों ने 1.5 लाख मीटर से कम आकार के बिल्डिंग प्रोजेक्ट के नाम पर डेटा सेंटर के लिए पर्यावरणीय-अनुमति हासिल कर ली है।

4. ट्रम्प और टेक कम्पनियों के दबाव के बाद केंद्र सरकार ने डेटा सेंटरों के लिए 20 साल की टैक्स छूट दी है। उसी तर्ज पर आंध्र प्रदेश सरकार ने राज्य जीएसटी और स्टैम्प ड्यूटी जैसे सभी टैक्सों में छूट का ऐलान किया है। विदेशों से आ रही समुद्री केबल से इन डेटा सेंटरों की कनेक्टविटी रहेगी।

संचार और रक्षा से जुड़े मामलों में केंद्र सरकार की अनुमति जरूरी है, जिसकी अनदेखी की जा रही है। डेटा सेंटर स्थापित करने वाली गूगल, मेटा और अमेजन जैसी विदेशी कम्पनियों की भारत में कानूनी जवाबदेही तय करना जरूरी है।

5. आंध्र प्रदेश सरकार एक हजार मेगावाट के 3 डेटा सेंटरों के लिए जमीन और सिंगल विंडो क्लियरेंस के साथ 22 हजार करोड़ से ज्यादा की छूट दे रही है। लेकिन डेटा सेंटर की प्रोजेक्ट रिपोर्ट में निवेश और रोजगार सृजन का कोई रोडमैप नहीं दिख रहा।

महाभारत में द्रोणाचार्य को भ्रमित करने के लिए युधिष्ठिर से “नरो वा कुंजरो’ का अर्धसत्य वाला संदेश भिजवाया गया था। इसी तर्ज पर बिल्डिंग की अनुमति की आड़ में डेटा सेंटर का संचालन पर्यावरण के साथ कानून के शासन के लिए खतरनाक हो सकता है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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