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चंडीगढ़-कोर्ट में DSP गैरहाजिर, देह व्यापार केस में 3 बरी:नवंबर 2017 में मिली थी गिरोह की सूचना; डीएसपी का दिल्ली हो चुका तबादला




करीब नौ साल पुराने देह व्यापार के मामले में चंडीगढ़ जिला अदालत ने 3 आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका। मामले में पुलिस की कार्रवाई पर भी सवाल उठे, क्योंकि जिस तत्कालीन डीएसपी ने कथित गिरोह का पर्दाफाश किया था, वह मुख्य गवाह होने के बावजूद बचाव पक्ष की ओर से जिरह के लिए अदालत में दोबारा पेश नहीं हुए। अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता और मामले के मुख्य गवाह की जिरह पूरी नहीं होने के कारण उसकी गवाही अधूरी और एकतरफा रह गई। ऐसे बयान को आरोपियों के खिलाफ पुख्ता सबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने तीनों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। बरी होने वालों में सेक्टर-41 निवासी सुलक्खन सिंह उर्फ सुक्खी, दार्जिलिंग निवासी योगिता तामंग और बलटाना निवासी गुरदर्शन सिंह शामिल हैं। मामले में 2 युवतियां भी आरोपी थीं, लेकिन वे अदालत में पेश नहीं हुईं। इसके चलते उन्हें भगोड़ा घोषित किया जा चुका था। नवंबर 2017 में मिली थी गिरोह की सूचना पुलिस के मुताबिक, नवंबर 2017 में सूचना मिली थी कि एक गिरोह कार में घूमता है और लड़कियों को देह व्यापार के लिए सप्लाई करता है। सूचना के आधार पर तत्कालीन डीएसपी दीपक यादव की अगुवाई में पुलिस टीम ने कार्रवाई की योजना बनाई। पुलिस ने गिरोह को पकड़ने के लिए फर्जी ग्राहक तैयार किया। इसके बाद उसे सेक्टर-43 स्थित आईएसबीटी के पास भेजा गया। पुलिस के मुताबिक, फर्जी ग्राहक के जरिए गिरोह से संपर्क होने के बाद पुलिस ने मौके पर छापेमारी की और आरोपियों को गिरफ्तार किया। कार्रवाई के दौरान पुलिस को कार से तीन युवतियां भी मिली थीं। पुलिस ने मामले में इमोरल ट्रैफिक प्रिवेंशन एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत केस दर्ज किया था। इसके बाद मामले की जांच आगे बढ़ी और आरोपियों के खिलाफ अदालत में चालान पेश किया गया। डीएसपी का दिल्ली तबादला मामले की जांच और कार्रवाई के दौरान तत्कालीन डीएसपी दीपक यादव महत्वपूर्ण गवाह थे। कुछ समय बाद उनका दिल्ली तबादला हो गया, जहां उन्होंने एडिशनल डीसीपी के पद पर कार्यभार संभाला। ट्रायल के दौरान डीएसपी दीपक यादव अदालत में गवाही देने के लिए पेश हुए थे। उन्होंने पुलिस को मिली गुप्त सूचना से लेकर फर्जी ग्राहक भेजने और गिरोह को पकड़ने तक की पूरी कार्रवाई के बारे में अदालत को बताया। हालांकि, उनकी गवाही के बाद बचाव पक्ष की ओर से उनकी जिरह पूरी नहीं हो सकी। अदालत ने उन्हें 30 सितंबर 2023 को क्रॉस एग्जामिनेशन यानी जिरह के लिए दोबारा बुलाया था, लेकिन वह अदालत में पेश नहीं हुए। बचाव पक्ष के वकीलों को डीएसपी दीपक यादव से सवाल-जवाब करने का मौका नहीं मिला। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, इसके बाद भी वह पूरे मुकदमे के दौरान दोबारा अदालत में पेश नहीं हुए। अदालत ने इस बिंदु को मामले में महत्वपूर्ण माना। अदालत ने कहा कि किसी केस में मुख्य गवाह या शिकायतकर्ता की गवाही तभी पूरी मानी जाती है, जब बचाव पक्ष को उससे जिरह करने का पूरा अवसर मिले। यदि जिरह पूरी नहीं होती तो ऐसी गवाही अधूरी और एकतरफा रहती है। अदालत ने माना कि डीएसपी की गवाही की जिरह पूरी नहीं होने के कारण उसे आरोपियों के खिलाफ निर्णायक सबूत के तौर पर नहीं माना जा सकता। अभियोजन पक्ष के मामले में यह एक बड़ी कमी रही। कोर्ट ने पूछा- अगर लड़कियां आरोपी थीं तो पीड़ित कौन? अदालत ने फैसले में पुलिस की कार्रवाई और अभियोजन की कहानी पर एक और अहम सवाल उठाया। पुलिस का दावा था कि छापेमारी के दौरान कार से तीन लड़कियां मिली थीं और उन्हें देह व्यापार के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था। लेकिन पुलिस ने इन तीनों युवतियों को भी मामले में आरोपी बनाया था। ऐसे में अदालत ने सवाल उठाया कि यदि ये तीनों आरोपी थीं, तो मामले में पीड़ित कौन था? अभियोजन पक्ष यह स्पष्ट रूप से साबित नहीं कर सका कि इनमें से किस लड़की को देह व्यापार के लिए लाया गया था या किसे इस काम के लिए इस्तेमाल किया जाना था। इस पहलू पर भी अभियोजन की ओर से पर्याप्त सबूत पेश नहीं किए जा सके। स्वतंत्र गवाह नहीं होने से भी कमजोर हुआ केस अदालत ने यह भी माना कि पुलिस की कार्रवाई को साबित करने के लिए कोई स्वतंत्र गवाह पेश नहीं किया गया। पूरी कार्रवाई मुख्य रूप से पुलिस अधिकारियों की गवाही पर निर्भर रही। ऐसे में मुख्य गवाह की जिरह पूरी नहीं होने और स्वतंत्र गवाह के अभाव ने अभियोजन के मामले को और कमजोर कर दिया। अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों के खिलाफ आरोप साबित नहीं होते। इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने सुलक्खन सिंह उर्फ सुक्खी, योगिता तामंग और गुरदर्शन सिंह को संदेह का लाभ दिया और उन्हें बरी कर दिया। अदालत के फैसले से यह साफ हुआ कि सिर्फ पुलिस की कार्रवाई या गिरफ्तारी के आधार पर आरोप साबित नहीं माने जा सकते।



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