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बचपन में सड़क पर खेलना- खासकर तब जब मौसम बहुत अनुकूल न हो- कभी आसान काम नहीं था। घंटेभर तक इधर-उधर भागने के बाद हम पसीने से तरबतर हो जाते और अपनी प्यास बुझाने के लिए किसी चीज की बेसब्री से तलाश करने लगते। सड़क किनारे लगा हैं डपंप प्यास तो बुझा देता था, लेकिन लगता था कि हमारा शरीर अपनी खोई हुई ऊर्जा वापस पाने के लिए कुछ और मांग रहा है। दो या पांच मिनट के छोटे-से ब्रेक में हम घर की ओर दौड़ते, आंगन के वॉशरूम का इस्तेमाल करते, जल्दी-जल्दी हाथ धोते और शेल्फ पर रखे जार में सीधे हाथ डालकर जो कुछ मिल जाए, उठा लेते। यह लगभग हर रविवार का नियम था। ज्यादातर समय हमारी नानी ने वहां पर ‘परुप्पु वडई’ बनाकर रखी होती थी। जिन लोगों को परुप्पु वडई या दाल वडई और होटलों में मिलने वाले मेदु वड़ा के बीच का फर्क मालूम नहीं है, उनके लिए यह अंतर बहुत सरल है। परुप्पु वडई मुख्यतः दालों से बनती है- आमतौर पर चना दाल और परिवार की पसंद के अनुसार तुअर या उड़द जैसी दूसरी दालों से। नानी उसमें और भी बहुत-सी चीजें डालती थीं, जिनके नाम तक शायद बच्चों को मालूम नहीं होते। लेकिन तब हमें परुप्पु वडई के पोषण संबंधी गुणों की कोई परवाह नहीं हुआ करती थी। हम बस एक खाते, दूसरी जेब में रखते और यह सोचते हुए वापस गली की ओर दौड़ पड़ते कि उससे हमें अपने खेल का अगला राउंड जीतने के लिए पर्याप्त ऊर्जा मिल गई है। यह बात काफी हद तक वैसी ही है, जैसे हमारे बच्चों की कई पीढ़ियों ने पोपेये को स्पिनाच की एक छोटी-सी कैन खोलते, उसे खाते और फिर अचानक इतना ताकतवर हो जाते देखा है कि वह अपने सबसे बड़े दुश्मन का मुकाबला कर सके। इस कार्टून ने एक साधारण हरी सब्जी को ताकत के प्रतीक में बदल दिया। पोपेये का स्पिनाच प्रोटीन-पोषण पर कोई वैज्ञानिक सबक तो बिल्कुल नहीं था, लेकिन उसका संदेश बेहद प्रभावशाली था : किसी अच्छी चीज की थोड़ी-सी मात्रा भी आपको अधिक ताकतवर महसूस करा सकती है। यह इस बात का शानदार उदाहरण भी था कि कैसे कहानी कहने का तरीका बच्चों की खान-पान की आदतों को प्रभावित कर सकता है। भारत के विज्ञापन उद्योग ने दशकों से इसी मनोविज्ञान का इस्तेमाल किया है। ग्रोथ और ताकत से जोड़कर पेश किए जाने वाले माल्ट-आधारित पेय से लेकर सुविधाजनक पोषण के रूप में प्रचारित किए जा रहे नए प्रोटीन-युक्त स्नैक्स तक- संदेश अकसर सीधा-सरल ही रहा है : शरीर को कुछ उपयोगी देने के लिए जरूरी नहीं कि आपको बहुत ज्यादा खाना पड़े। आधुनिक मांओं ने भी यह तरकीब अपनाई है, शायद किसी भी ब्रांड से ज्यादा चतुराई के साथ। उन्होंने समझ लिया है कि बच्चे को पोषण से लुभाने की हमेशा ही जरूरत नहीं होती; इसके बजाय उसे उससे जुड़ा एहसास भी परोसा जा सकता है। परांठे के अंदर थोड़ा-सा पनीर, डोसे में बेसन, सूप में दाल या पोहे में पिसी हुई मूंगफली- ये सब चुपचाप किसी जाने-पहचाने भोजन में पोषण जोड़ सकते हैं। बच्चे को कुछ फायदेमंद मिल जाता है, लेकिन उसे ऐसा महसूस नहीं होता कि उसे ‘हेल्दी फूड की सजा’ दी जा रही है। दिलचस्प बात यह है कि आज जब शहरी परिवार सुपरमार्केट की अलमारियों पर प्रोटीन उत्पादों की भरमार देख रहे हैं, वहीं ग्रामीण रसोई लंबे समय से रोजमर्रा के खानपान में प्रोटीन उपलब्ध कराती आई हैं। चीजें पहले ही हमारी रसोई में मौजूद थीं; बस उनके साथ आकर्षक पैकेजिंग या न्यूट्रिशन लेबल नहीं लगा था। आधुनिक परिवारों और शायद प्रोटीन ब्रांड्स के लिए भी सीख वही है, जिसे हमारी नानियां सहज रूप से जानती थीं : पोषण का समाधान हमेशा खाने की किसी नई चीज या बड़ी मात्रा में नहीं होता। कई बार यह किसी पुराने, परिचित भोजन को सही तरीके से, सही मात्रा में- शायद थोड़ी और आसानी से खाई जा सकने वाली मात्रा में- सही समय पर परोसने में होता है। ठीक उस छोटी-सी परुप्पु वडई की तरह, जिसे हम दो खेलों के बीच झटपट उठाकर खा लिया करते थे। फंडा यह है कि अच्छी चीजें बड़ी मात्रा में ही मिलें, यह जरूरी नहीं। अच्छाई की एक छोटी-सी खुराक भी अपना असर बनाए रख सकती है, जरूरतें पूरी कर सकती है और आपको भीतर से थोड़ा अधिक मजबूत महसूस करा सकती है।
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एन. रघुरामन का कॉलम:प्यार और अच्छी चीजें थोड़ी मात्रा में भी असरदार होती हैं
