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शिमला जिला परिषद चुनाव कांग्रेस के लिए 'वॉर्निंग बेल':मंत्रियों-विधायकों की फौज, कैबिनेट रैंक भी काम नहीं आए, BJP का बनवास 26 साल बाद खत्म




शिमला जिला परिषद अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनाव में सत्तारूढ़ कांग्रेस की हार हुई है। कांग्रेस के मजबूत गढ़ माने जाने वाले शिमला जिला परिषद पर भाजपा ने 26 साल बाद कब्जा जमाया है। इस जीत को सत्तारूढ़ कांग्रेस के लिए एक निकाय के नतीजे के तौर पर नहीं, बल्कि सरकार के लिए जमीनी राजनीतिक पकड़, संगठनात्मक ताकत और नेताओं के प्रभाव की परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा है। राजनीति के जानकार इन रिजल्ट को कांग्रेस के लिए 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ‘वॉर्निंग बेल’ के तौर पर देख रहे हैं। वहीं पिछले विधानसभा चुनाव में शिमला जिला की आठ में से एक सीट जीतने वाली भाजपा के लिए यह रिजल्ट मनोवैज्ञानिक बढ़त दिलाने वाले है। जिला परिषद अध्यक्ष पद पर भाजपा के भूपेंद्र सिसोदिया और उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय भरत सिंह क्लांटा का चुना जाना कांग्रेस के लिए इसलिए ज्यादा बड़ा झटका है, क्योंकि सुक्खू कैबिनेट में शिमला जिला के तीन-तीन मंत्री, सात विधायक, दो कैबिनेट रैंक वाले नेता (अब कैबिनेट रैंक वापस) और विभिन्न बोर्ड निगमों में भी नेताओं की लंबी फौज है। फिर भी ये दिग्गज नेता कांग्रेस का किला ढहने से नहीं बचा पाई। शिमला जिला के 8 में सात विधायक भी हार नहीं बचा पाए इसी तरह, शिमला जिले की 8 विधानसभा सीटों में से 7 पर कांग्रेस का कब्जा है। यानी विधानसभा चुनाव के लिहाज से भी जिले में कांग्रेस का राजनीतिक आधार मजबूत है। इसके बावजूद जिला परिषद में कांग्रेस अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद के लिए जरूरी बहुमत नहीं जुटा पाई। यह बताता है कि पंचायत स्तर पर सत्तारूढ़ कांग्रेस का आधार कमजोर हुआ है। कांग्रेस के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष उम्मीदवार को 10-10 वोट मिले 25 सदस्यीय जिला परिषद में अध्यक्ष पद के लिए 13 वोट जरूरी थे। कांग्रेस प्रत्याशी सुरेंद्र रेटका और उपाध्यक्ष पद पर मीनाक्षी को भी 10-10 वोट मिले। इससे कांग्रेस दोनों पदों पर मुकाबला हार गई। 7 विधायक होने का फायदा जिला परिषद में नहीं मिला शिमला जिले की 8 विधानसभा सीटों में 7 कांग्रेस के पास हैं। इसके बावजूद जिला परिषद के चुनाव में पार्टी अपने विधायकों और प्रभावशाली नेताओं की राजनीतिक ताकत को वोटों में तब्दील नहीं कर सकी। यह परिणाम कांग्रेस के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि जिला परिषद का चुनाव सीधे तौर पर स्थानीय संगठन, पंचायत नेटवर्क, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और जिला स्तर के नेताओं की पकड़ का संकेत देता है। 2027 के विस चुनाव से पहले भाजपा को मनोवैज्ञानिक बढ़त जिला परिषद में 26 साल बाद कब्जा करना भाजपा के लिए सिर्फ एक पद हासिल करना नहीं है। यह पार्टी को शिमला जिले में संगठनात्मक मनोबल बढ़ाने और कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने का मौका देता है। पिछले विधानसभा चुनाव में मात्र एक सीट पर सिमटी भाजपा को इससे जिला में मनोवैज्ञानिक बढ़त मिलेगी।



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