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रश्मि बंसल का कॉलम:हम सबकी ‘हीरोज़ जर्नी’ होती है, बस कहानियां अलग हैं…




पिक्चर देखने का शौक हम सबको है। थिएटर में पॉपकॉर्न के साथ, या फिर अपने घर में पसरे हुए, किसी छोटी या बड़ी स्क्रीन पर।
हर पिक्चर में होता है एक हीरो (और हीरोइन) और पहले दस मिनट के अंदर ही हम जान जाते हैं कि इस इंसान को जूझना पड़ेगा, कुछ संघर्ष करना पड़ेगा। एक हीरो वो है, जिसे सरहद पार करके देश के लिए जासूसी करनी होगी। दूसरा वो है, जिसे अपने मां-बाप और दुनिया से अपना प्यार पाने के लिए लड़ना है। मंजिलें अलग, मगर सवाल वही- इस चैलेंज को स्वीकार करूं या नहीं? जसकीरत, हमजा बनने से इनकार कर सकता था, लेकिन फिर, ‘धुरंधर’ पिक्चर कैसे बनती?
खैर, ये हो गई फिल्मी बातें। आपने तीन घंटे आनंद लिया, और सोचा, मैं कोई हीरो थोड़े ही हूं। मेरी तो जिंदगी आम है, घर है और काम है। बॉस का तेवर, प्रोजेक्ट डेडलाइन। सिग्नल तोड़ दिया, लग गया फाइन। मेरी जिंदगी का मकसद आराम। चाहिए मुझे एक पथ आसान। लेकिन आप जो चाहते हो वैसा होता नहीं। आपकी लाइफ में भी कोई न कोई चैलेंज आता है- सवाल आपके सामने वही। आप स्वीकार करेंगे या नहीं? ये चैलेंज हो सकता है आर्थिक, जैसे कि पढ़ाई पूरी करने के लिए पैसे नहीं। तो फिर क्या आप मायूस होकर पढ़ाई छोड़ देंगे?
ऐसी स्थिति में हीरो वो है, जो अपने आप से कहता है- मैं अपनी मंजिल तक पहुंचूंगा। कोई न कोई रास्ता निकालूंगा। जिस दिन आपने ये ठान लिया, आप निकल पड़े अपनी ‘हीरोज़ जर्नी’ पर।
ये कॉन्सेप्ट मेरा नहीं, ये जोसेफ कैम्पबेल नाम के प्रोफेसर ने 1949 में अपनी किताब ‘हीरो विद अ थाउजेंड फेसेस’ में व्यक्त किया था। उन्होंने विश्वभर की पौराणिक कहानियों का अध्ययन किया और इस नतीजे पर पहुंचे कि हर संस्कृति की कहानियां ऊपर से अलग हैं, मगर अंदर से एक जैसी हैं। किरदार चाहे हमारे श्रीराम हों या ग्रीस के ओडीसियस, आम जिंदगी छोड़कर उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ा। और जब घर लौटे, तो वो पूरी तरह बदल चुके थे। आप कहेंगे- वो तो ठीक है, पर मैं न तो वनवास में जाने वाला हूं, न कोई युद्ध लड़ने। मैं बस यही कहूंगी कि लड़ना तो आपको होगा, शायद आपकी रणभूमि थोड़ी अलग होगी।
एक दिन आप रूटीन चेक-अप के लिए गए, जब रिपोर्ट मिली तो पता चला- कैंसर। तो फिर होती है शुरू एक ‘हीरोज़ जर्नी’, जो आपने कभी मांगी न थी। शुरू में आप कराहते हैं- हे प्रभु, मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ? आप अपने आप को असहाय, पीड़ित के रूप में देखने लगते हो। लेकिन जिस दिन आप इस चुनौती को स्वीकार करके, लड़ने का निश्चय करते हैं, आपकी ‘हीरोज़ जर्नी’ शुरू होती है।
आप में नई ताकत उभरेगी, निर्बलता से बलवानता का सफर शुरू होगा। हां, जीना या मरना आपके हाथ में नहीं… तो फिर क्यों हम दु:ख झेलें? शायद इसलिए कि मुश्किल समय हमें वो दिखाता है, जिसकी आराम की जिंदगी में जरूरत नहीं- अपने अंदर की ताकत।
लोहे को स्टील बनने के लिए आग से गुजरना पड़ता है। इंसान को भी एक ऐसी आग से गुजरना पड़ता है, जो उसकी आत्मज्योति को फिर से जगा दे। पैसा, प्रॉपर्टी और पोलिटिक्स की दौड़ में वो ज्योति धीमी पड़ गई है। इसलिए शायद ऊपर वाला थोड़ा-सा तेल छिड़ककर उसे भड़का देता है।
डरिए मत, ‘हीरोज़ जर्नी’ जितनी जोखिम भरी है, उतना ही रोमांचक भी। इस राह पर चलते हुए आपको अचानक मदद मिलेगी, किसी अनजान व्यक्ति से। जैसे श्रीराम को मिले थे किष्किंधा में हनुमान। क्योंकि सृष्टि चाहती है कि हो आपका उत्थान। आप अकेले नहीं, जूझ रहा हर इंसान। मैंने दु:ख देखे हैं, आपने भी। आपके चाचा, ताऊ, मां-बाप ने भी। मेरा दु:ख मेरे लिए सही है। सृष्टि का नियम यही है। पिक्चर तीन घंटे में खत्म हो जाती है। लेकिन मरते दम तक पिक्चर अभी बाकी है। हीरो वो जो कदम पे कदम बढ़ाता है, भ्रम की दुनिया में न समाता है। अपनी ‘हीरोज़ जर्नी’ के बारे में मुझे बताइए। ईमेल द्वारा अपनी कहानी सुनाइए।
लिखने से दिल हल्का होता है।
मैं इंतजार करूंगी। मैंने दु:ख देखे हैं, आपने भी। आपके चाचा, ताऊ, मां-बाप ने भी। मेरा दु:ख मेरे लिए सही है। सृष्टि का नियम यही है। पिक्चर तीन घंटे में खत्म हो जाती है। लेकिन मरते दम तक पिक्चर अभी बाकी है। हीरो वो जो कदम पे कदम बढ़ाता है, भ्रम की दुनिया में न समाता है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)



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