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24 घंटे के लिए तरह बंद रहा रोहतक का गांव:300 साल पुरानी परंपरा, ग्रामीण न बाहर गए और न ही किसी को आने दिया




महम चौबीसी के खरक जाटान गांव में सोशल डिस्टेंसिंग की एक अनोखी परंपरा 300 साल से निभाई जा रही है। कोरोना काल में दुनिया ने बीमारी रोकने के लिए सामाजिक दूरी अपनाई, लेकिन इस गांव में यह पहले से चली आ रही है। भाद्रपद महीने के शनिवार को ग्रामीणों ने स्वेच्छा से 24 घंटे के लिए गांव को पूरी तरह बंद रखा। शुक्रवार रात 12 बजे से शनिवार रात 12 बजे तक न तो कोई ग्रामीण गांव से बाहर गया और न ही किसी बाहरी व्यक्ति को अंदर आने दिया गया। इस दौरान गांव की गलियों में ग्रामीणों ने पहरा दिया और गांव की सीमा पर रोक लगाई गई। ग्रामीणों ने अपने जरूरी काम पहले ही निपटा लिए थे। घरों में चूल्हा नहीं जलाया गया। एक दिन पहले ही खीर, मीठी रोटी, सुहाली और गुलगुले जैसे पकवान तैयार कर लिए गए थे, जिन्हें भोजन के रूप में खाया गया। परंपरा के पीछे पुराना लोकविश्वास ग्रामीणों के अनुसार, इस परंपरा के पीछे एक पुराना लोकविश्वास है। मान्यता है कि सदियों पहले गांव में बच्चों और पशुओं में एक बीमारी फैल गई थी। तब गांव में रहने वाले एक साधु ने ग्रामीणों को बीमारी रोकने के लिए एक दिन गांव को आसपास के इलाकों से अलग रखने की सलाह दी थी। ग्रामीणों का मानना है कि सामाजिक दूरी से बीमारी की कड़ी को तोड़ने में मदद मिलती है। इसी के बाद से भाद्रपद महीने के शनिवार को गांव बंद रखने की यह परंपरा चली आ रही है। बंद को लेकर पहले ही करा दी थी मुनादी बंद को लेकर गांव में पहले ही मुनादी कर दी थी। आवश्यक कार्य एक दिन पहले ही निपटा लिए गए। शहरों में रहने वाले परिवार भी बंद शुरू होने से पहले गांव पहुंच गए। शुक्रवार रात को गांव की (फिरनी)सीमा के आसपास प्रतीकात्मक रेखा खींची गई और रात 12 बजे से आवागमन पूरी तरह बंद कर दिया गया। गांव की गलियों में ग्रामीणों और युवाओं ने पहरा दिया। इस दौरान किसी भी घर में भोजन नहीं बनाया गया। एक दिन पहले तैयार किया गया मीठा भोजन ही परिवारों ने ग्रहण किया। घरों में खीर, मीठी रोटी, सुहाली और गुलगुले बनाए गए। नमकीन भोजन से परहेज रखा गया। यह प्रतिबंध सभी के लिए अनिवार्य था। धूनी की आंच पर तैयार की गई खीर शनिवार सुबह हवन-यज्ञ (धूणा) किया गया और धूनी की आंच पर खीर तैयार कर ग्रामीणों में प्रसाद के रूप में वितरित की गई। पशुओं की सेवा भी परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा रही। बंद समाप्त होने के बाद पशुओं को आयोजन स्थल पर लाकर उन्हें वहां कढ़ाओं रखे पवित्र जल का डाभ से झाड़ा लगाया गया। गांव की गलियों और घरों में लोबान, गुग्गल व धूप की धूनी भी दी गई। बंद के दौरान महिलाओं ने सत्संग, भजन-कीर्तन किया। युवाओं और बच्चों ने कबड्डी सहित विभिन्न खेलों में हिस्सा लिया। जोगियों ने रांझा व आल्हा गाकर सुनाया। बुजुर्ग ग्रामीणों के अनुसार आल्हा की यह परंपरा भी गांव और पशुओं की सुख-समृद्धि से जुड़ी हुई है। बदलते समय भी पुरानी परंपरा कायम की : शमशेर सिंह खरक वरिष्ठ भाजपा नेता शमशेर सिंह खरक और अन्य ग्रामीणों ने कहा कि बदलते समय के बावजूद खरक जाटान ने अपनी सदियों पुरानी परंपरा को जीवित रखा है। यह आयोजन केवल 24 घंटे के गांव बंद तक सीमित नहीं है, बल्कि गांव की सामूहिक एकजुटता, लोकविश्वास, पशु सेवा और सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी है। ग्रामीणों का कहना है कि आधुनिक दौर में भी यह परंपरा पूरे गांव को एक सूत्र में बांधने का काम करती है।



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