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चक्रधर समारोह के पहले दिन छत्तीसगढ़ी लोकधुनों पर झूमे लोग:रायगढ़ में पद्मश्री अनुज शर्मा की शानदार प्रस्तुति, तंबूरा थामे कपालिक शैली में गूंजी पंडवानी




कला, संस्कृति, संगीत और नृत्य की गौरवशाली परंपरा को समर्पित 41वें चक्रधर समारोह का पहला दिन कला और भक्ति के रंगों से सजा। समारोह के शुभारंभ के बाद सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का सिलसिला शुरू हुआ। रात में पद्मश्री अनुज शर्मा ने छत्तीसगढ़ी लोकसंगीत से सजी प्रस्तुति दी। वहीं पद्मश्री डॉ. उषा बारले ने पंडवानी की प्रस्तुति से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। पद्मश्री अनुज शर्मा ने अपनी प्रस्तुति की शुरुआत ‘अहो भजो मन गणपति गणराज, सुमति मन…’ जैसी भक्तिमय प्रस्तुति से की। इसके बाद ‘मंगल भवन अमंगल हारी…’, ‘राम सिया राम’ और ‘मैंने तेरे भरोसे हनुमान’ जैसे भजनों ने माहौल को भक्तिरस से भर दिया। इसके बाद उन्होंने छत्तीसगढ़ की माटी और लोकजीवन से जुड़े लोकप्रिय गीत पेश किए। ‘अली गली में टुकनी मंगाये, मोर महामाई हरियर ज्वारा लागे वो’, ‘छइयां भुइयां’, ‘माते-माते रहिबे अलबेला मोर’ और ‘अहो दौना पान…’ जैसी प्रस्तुतियों ने दर्शकों को छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति के रंग में रंग दिया। वहीं ‘ससुराल गेंदा फूल’, ‘भोली सुरतिया’, ‘मया होगे तोर संग’ और ‘ये प्रीत वाली रानी…’ जैसे लोकप्रिय गीतों पर भी दर्शकों ने जमकर उत्साह दिखाया। पद्मश्री अनुज शर्मा ने कहा कि चक्रधर समारोह जैसे प्रतिष्ठित आयोजन प्रदेश की कला और संस्कृति को व्यापक पहचान देते हैं। साथ ही स्थानीय कलाकारों को बड़े मंच पर अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर भी मिलता है। तंबूरा थाम कपालिक शैली में गूंजी पंडवानी चक्रधर समारोह के पहले दिन पद्मश्री डॉ. उषा बारले ने पंडवानी की प्रस्तुति दी। उन्होंने कपालिक शैली में हाथ में तंबूरा लेकर महाभारत के विभिन्न प्रसंगों का ओजस्वी और भावपूर्ण गायन किया। उनकी प्रस्तुति को दर्शकों ने खूब सराहा। डॉ. उषा बारले ने अपनी विशिष्ट शैली में महाभारत के प्रसंगों को जीवंत किया। उन्होंने दर्शकों को छत्तीसगढ़ की समृद्ध पंडवानी परंपरा से परिचित कराया। द्रौपदी चीरहरण, कीचक वध और ‘अमर कथा’ जैसे प्रसंगों ने दर्शकों को खास तौर पर प्रभावित किया। कार्यक्रम में डॉ. उषा बारले की दोनों पुत्रियों ने छत्तीसगढ़ महतारी की आरती-पूजन का गायन किया। इसके बाद बाबा गुरु घासीदास के संदेशों पर आधारित गीतों के साथ पंथी नृत्य की प्रस्तुति हुई। पंथी नृत्य ने पूरे रामलीला मैदान को छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति से सराबोर कर दिया। 7 साल की उम्र से कर रहीं पंडवानी डॉ. उषा बारले ने सात वर्ष की उम्र में स्व. मेहत्तर दास बघेल से पंडवानी गायकी की शिक्षा लेना शुरू किया था। उन्होंने डॉ. तीजन बाई से भी प्रशिक्षण प्राप्त किया। उन्होंने देश के विभिन्न राज्यों के साथ विदेशों में भी पंडवानी की प्रस्तुतियां दी हैं। इसके जरिए उन्होंने छत्तीसगढ़ की लोककला को पहचान दिलाई है। पंडवानी के साथ वे पंथी गीत, सतनाम भजन और चौका आरती जैसी लोक विधाओं में भी पारंगत हैं। लोककला के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2023 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।



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