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10 साल से अधिक संविदा पर काम करने वाले नौ कर्मियों को हाईकोर्ट से राहत झारखंड हाईकोर्ट ने शनिवार को एक अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई कर्मचारी अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाता है तो इससे नाराज होकर उसे नौकरी से निकालना मनमाना, दुर्भावनापूर्ण और कानून के खिलाफ है। जस्टिस दीपक रोशन की कोर्ट ने धरो उरांव और अन्य की याचिका पर यह फैसला सुनाया। उन्होंने छह सप्ताह के भीतर सभी याचिकाकर्ता को फिर से बहाल करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि उन्हें नौकरी के सभी पिछले लाभ दिए जाएं। साथ ही उनकी सेवा को नियमित करने का औपचारिक आदेश भी जारी किया जाए। कोर्ट ने टिप्पणी की कि राज्य और उसकी एजेंसियों द्वारा कर्मचारियों को उनके संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करने के लिए दंडित करने की प्रथा खत्म होनी चाहिए। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अमृतांश वत्स ने पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति 2004 में स्वास्थ्य चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण विभाग के इंजीनियरिंग सेल में लिपिक, टाइपिस्ट, चालक और पंप ऑपरेटर आदि पदों पर संविदा के आधार पर हुई थी। 2017 में बिना किसी नोटिस के उन्हें काम से हटा दिया गया। जबकि समन्वय पीठ ने चार फरवरी 2017 को कोर्ट ने उनकी सेवा नियमित करने का आदेश दिया था। राज्य सरकार ने इसे चुनौती दी। लेकिन अपील खारिज हो गई। इसके बावजूद विभाग ने 14 अगस्त 2024 के आदेश से कर्मचारियों के नियमितीकरण के दावे को अस्वीकार कर दिया। हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता 10 साल से अधिक समय तक स्वीकृत पद पर लगातार काम करते रहे। उनकी नियुक्ति सक्षम प्राधिकारी से अनुमोदित थी। कोर्ट ने सरकार के इस तर्क को नकार दिया कि कर्मचारी स्वीकृत पदों पर नियुक्त नहीं थे। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जहां काम की प्रकृति स्थाई और संस्थान के लिए जरूरी हो, वहां नियुक्ति को संविदा या अस्थाई कह देने से उसे अनियमित नहीं माना जा सकता। 15 साल से संविदा पर काम कर रहे चालकों को नियमित करे ऊर्जा निगम हाईकोर्ट ने झारखंड ऊर्जा विकास निगम लिमिटेड (जेयीवीएनएल) और उसकी सहयोगी कंपनियों में 15 साल से संविदा पर काम कर रहे चालकों को नियमित करने का निदे्रश दिया है। साथ ही नियमितीकरण के आधार पर सभी लाभ देने को भी कहा है। जस्टिस दीपक रोशन की कोर्ट ने कहा कि सिफ इस आधार पर नियमितीकरण से इनकार नहीं किया जा सकता कि उनके पद स्वीकृत नहीं थे। लंबे समय से लगातार काम कर रहे और आवश्यक योग्यता रखने वाले कर्मचारियों का मामला अधिक से अधिक अनियमित नियुक्ति का हो सकता है, अवैध नियुक्ति का नहीं। इंद्रदेव सिंह समेत कई चालकों ने इस मामले में अलग-अलग याचिकाएं दाखिल की थीं। समान मुद्दा होने के कारण अदालत ने सभी याचिकाओं की एक साथ सुनवाई की। -शेष पेज 11 पर
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कोर्ट जाने पर नौकरी से हटाना गलत, 6 हफ्ते में बहाल कर नियमित करें
