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पिछले सप्ताह प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक के मामलों के बाद नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) में सुधार की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक असामान्य टिप्पणी की। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि वह नई दिल्ली स्थित एनटीए के नए मुख्यालय का दौरा कर सकती है। मकसद यह देखना है कि एनटीए ने कर्मचारियों और बुनियादी ढांचे को लेकर कोर्ट के सामने जो दावे किए हैं, वे जमीन पर कितने सही हैं और क्या वह परीक्षाएं ठीक से कराने में सक्षम है। आम तौर पर न्यायाधीश अदालत के भीतर उनके समक्ष पेश किए गए साक्ष्यों और दलीलों के आधार पर फैसला करते हैं। लेकिन स्थल निरीक्षण के भी इतिहास में कई उदाहरण मिलते हैं। 1978 में सुनील बत्रा ने तिहाड़ जेल में कैदियों के साथ हो रहे व्यवहार को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। मामले की सुनवाई कर रही तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एम.एच. बेग और जस्टिस कृष्ण अय्यर तथा कैलासम की पीठ स्वयं तिहाड़ पहुंची और वहां जेल तथा कैदियों की स्थिति देखी। उस समय कोर्ट के सामने एक अन्य कैदी चार्ल्स शोभराज भी था, जिसने लंबे समय तक बेड़ियों में रखे जाने के नियम को चुनौती दी थी। न्यायाधीशों ने निरीक्षण के दौरान जो देखा, उसे अदालती रिकॉर्ड का हिस्सा बनाया। अंततः शोभराज की बेड़ियां हटाने और उसे विचाराधीन कैदियों को मिलने वाली अन्य स्वतंत्रताएं देने का आदेश दिया। ऐसा ही एक मामला 2017 में गुजरात हाई कोर्ट के सामने आया। जस्टिस हर्षा देवानी और ए.एस. सुपेहिया 2002 के गुजरात दंगों के दौरान हुए नरोदा पाटिया नरसंहार में दोषसिद्धि के खिलाफ अपीलों की सुनवाई कर रहे थे। दोनों न्यायाधीश स्वयं नरोदा पाटिया गए, ताकि घटनास्थल और उसकी भौगोलिक स्थिति को बेहतर ढंग से समझ सकें। दोनों पक्षों के वकीलों ने उनसे ऐसा करने का अनुरोध किया था। जमीनी हकीकत जानने के लिए इस तरह के निरीक्षण का इस्तेमाल विशेष रूप से जनहित याचिकाओं में होता रहा है। जनहित याचिका में कोई व्यक्ति दूसरों के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का मामला भी कोर्ट के सामने उठा सकता है। कुछ दुर्लभ मामलों में न्यायाधीश स्वयं मौके पर गए हैं। लेकिन ज्यादातर मामलों में अदालतें अपनी ओर से कमिश्नर या न्यायमित्र नियुक्त करती रही हैं। इसका एक उदाहरण विधि विशेषज्ञ प्रो. उपेंद्र बक्षी द्वारा आगरा के सरकारी संरक्षण गृहों में रह रही महिलाओं की खराब स्थिति को लेकर दायर मामला है। सुप्रीम कोर्ट ने वहां रहने वाली लड़कियों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे और आगरा के जिला न्यायाधीश को संरक्षण गृह का निरीक्षण करने को कहा था। यही सिद्धांत एनटीए से जुड़े मौजूदा मामले पर भी लागू होता है। सुप्रीम कोर्ट इस पर विचार कर रहा है कि एनटीए के ढांचे में क्या बदलाव जरूरी हैं। क्या उसके पास पर्याप्त स्थायी कर्मचारी हैं? क्या अलग-अलग जिम्मेदारियों के लिए विशेष विभाग हैं? क्या उसके पास देशभर में इतनी बड़ी परीक्षाएं ठीक से कराने के लिए जरूरी सुविधाएं हैं? ऐसे में एनटीए मुख्यालय जाकर देखने से न्यायाधीश समझ सकते हैं कि एक सक्षम परीक्षा एजेंसी के लिए जरूरी बुनियादी व्यवस्थाएं केवल कागज पर हैं या वास्तव में भी हैं। लेकिन केवल एक अच्छा मुख्यालय किसी परीक्षा को पेपर लीक से सुरक्षित नहीं बना सकता। परीक्षा कराने की प्रक्रिया काफी लंबी है। प्रश्नपत्र तैयार करने और उसे सुरक्षित रखने से लेकर उसकी छपाई या डिजिटल माध्यम से भेजे जाने, परिवहन, सुरक्षित अभिरक्षा और अंत में परीक्षा केंद्रों तक पहुंचाने और बांटने तक कई चरण होते हैं। इनमें से किसी भी चरण में हुई एक चूक पूरी परीक्षा की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर सकती है। इसलिए सरकार को पूरी व्यवस्था को बार-बार परखना होगा। लेकिन कोर्ट को भी ध्यान रखना होगा कि ऐसी व्यवस्था तैयार करना और चलाना कार्यपालिका की जिम्मेदारी है। ऐसे उदाहरण भी हैं, जब अच्छे उद्देश्य से शुरू हुआ अदालती हस्तक्षेप धीरे-धीरे प्रशासन के रोजमर्रा के फैसलों तक पहुंच गया था। 2000 के दशक की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिल्ली की बसों को सीएनजी में बदलने को लेकर दिखलाई सक्रियता इसी की मिसाल है। अदालतें सरकार से सवाल पूछ सकती हैं, उसकी जवाबदेही तय कर सकती हैं और जरूरत पड़ने पर उसे कार्रवाई करने का निर्देश भी दे सकती हैं। लेकिन किसी जटिल प्रशासनिक व्यवस्था को तैयार करने और चलाने की जिम्मेदारी अंततः कार्यपालिका की ही है।
(ये लेखकों के अपने विचार हैं)
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अर्घ्य सेनगुप्ता और स्वप्निल त्रिपाठी का कॉलम:कोर्ट की निगरानी और सरकार की कार्रवाई साथ में ही असरदार
