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Virag Gupta Column | India Healthcare Crisis, Expensive Treatment & Debt


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4 घंटे पहले

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विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट के वकील और 'डिजिटल कानूनों से समृद्ध भारत' के लेखक - Dainik Bhaskar

विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट के वकील और ‘डिजिटल कानूनों से समृद्ध भारत’ के लेखक

स्वस्थ रहना सबका संवैधानिक अधिकार है, लेकिन इलाज, भर्ती, दवा, अस्पताल का बाजार भी छोटा नहीं। संसद से बने कानून और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर अमल नहीं होने से तो लगता है कि अधिकारों पर बाजार ही ज्यादा हावी है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने शारीरिक, मानसिक और सामाजिक नजरिये से अच्छे स्वास्थ्य को परिभाषित किया है। लेकिन भारत में बीमारियों के इलाज को ही स्वास्थ्य का पैमाना मान लिया गया है। इससे जुड़ी 4 बातों को समझना जरूरी है :

1. संविधान के अनुसार स्वास्थ्य राज्यों का विषय है। लेकिन इसके लिए केंद्रीय कानूनों के साथ आयुष्मान भारत जैसी योजनाएं भी हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना 2017 के अनुसार स्वास्थ्य सेवाओं में जीडीपी का 2.5% खर्च होना चाहिए। हालांकि संसद की स्थायी समिति की अगस्त 2026 की रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ 1.43% बजटीय आवंटन होने से 70% आबादी को ही बीमा और योजनाओं का लाभ मिल रहा है। आबादी के 30% यानी 40 करोड़ लोगों को “मिसिंग मिडिल’ बताया गया है। सही इलाज नहीं मिलने या महंगे इलाज से करोड़ों लोगों का कर्ज में डूबना बड़ी त्रासदी है।

2. राजधानी दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में बदहाली की बानगी देखें। जीटीबी अस्पताल में पंखा गिरने से मरीज की मौत हो गई। एलएनजेपी अस्पताल में एमआरआई के लिए दिसम्बर 2028 तक की वेटिंग है। एम्स में कई ऑपरेशन के लिए 5 साल की वेटिंग है। दवा, स्ट्रेचर और दस्ताने बाहर से खरीदने की मजबूरी है। राज्यों में हालात और गड़बड़ हैं। छत्तीसगढ़ के 9 जिला अस्पतालों में आईसीयू और 12 में सीटी स्कैन नहीं हैं। संसदीय समिति की रिपोर्ट के अनुसार सरकारी अस्पतालों के मुकाबले निजी अस्पतालों में इलाज 5 से 10 गुना महंगा होता है। पश्चिम बंगाल खेत मजदूर समिति मामले में सुप्रीम कोर्ट के 1996 के फैसले के अनुसार लोगों को अच्छा इलाज मुहैया कराना सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर करने के बजाय शहरों में अस्पतालों की ग्रेडिंग पर सरकार का ज्यादा जोर मालूम होता है।

3. अस्पतालों के नियमन के लिए 2010 में संसद से कानून और 2012 में नियम बने थे। उसके अनुसार अस्पतालों में जांच, भर्ती और इलाज के रेट निर्धारित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 27 फरवरी 2024 को निर्देश दिया था। 30 जुलाई 2024 को संसद में मंत्री के जवाब के अनुसार कानून लागू करने के लिए राज्यों से परामर्श जारी है। सरकारी जमीन पर बने कॉर्पोरेट अस्पताल गरीब मरीजों का रियायती दरों पर इलाज करने में आनाकानी करते हैं। इस बारे में शिकायत पर प्रतिस्पर्धा आयोग ने 11 साल की जांच के बाद दिल्ली के 12 अस्पतालों को क्लीनचिट दे दी। जन विश्वास कानून 2026 से स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े 35 कानूनों को अनापराधिक बनाकर दंड को खत्म कर दिया गया। कैंसर की 2700 रु. की दवा रिटेल में 27000 में बिकने पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता के बावजूद 2013 के ड्रग्स आदेश को लागू नहीं किया जा रहा है।

4. राज्यों के अधीन स्वास्थ्य वाले विषय में मरीजों के डेटा को केंद्रीय स्तर पर इकठ्ठा किया जा रहा है। यूनिफाइड पैन इंडिया रजिस्ट्रेशन पोर्टल के तहत डॉक्टरों का राष्ट्रीय रिकॉर्ड, ई-सुश्रुत सॉफ्टवेयर में छोटे क्लीनिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की क्लाउड आधारित सूचना, राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण और फॉर्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया के एचपीआर के तहत फार्मासिस्टों का रिकॉर्ड, आरोग्य भारत डिजिटल मिशन के तहत आरोग्य सेतु-2 ऐप में जनता का हेल्थ रिकॉर्ड, केमिस्ट की दुकानों में सीसीटीवी लगाने के आदेश से डॉक्टरों के पर्चे, दवा और मरीजों की जानकारी आदि दर्ज किए जा रहे हैं। लेकिन न्यायालय के आदेशों के बावजूद ऑनलाइन फार्मेसी के कारोबारियों पर कानून लागू नहीं हो पा रहे हैं।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना 2017 के अनुसार स्वास्थ्य सेवाओं में जीडीपी का 2.5% खर्च होना चाहिए। लेकिन 1.43% बजटीय आवंटन होने से 70% आबादी को ही बीमा और योजनाओं का लाभ मिल रहा है। 40 करोड़ लोगों को “मिसिंग मिडिल’ बताया गया है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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