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यूपी की जिला अदालतों की सुस्ती पर हाईकोर्ट चिंतित:कोर्ट ने कहा- 16 साल में 178 तारीखें, फिर भी आरोप तय नहीं, ये शुभ संकेत नहीं




इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जिला अदालतों में मुकदमों की सुस्त रफ्तार और जिला न्यायपालिका द्वारा मांगी गई जानकारी न देने पर गंभीर चिंता जताई है।
न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने चार याचिकाओं की सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला 26 मई 2026 को सुरक्षित रख लिया था। और 28 सितंबर 26 को फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि यह देरी किसी एक व्यक्ति का दोष नहीं, बल्कि संस्थागत व्यवहार का नतीजा है। क्या है मामला जानिये उर्मिला मिश्रा- प्रयागराज के नैनी थाने का 2009 का आपराधिक मामला 16 साल में 178 से ज्यादा बार लगा, पर आरोप तय नहीं हुए। सरफराज अहमद:- 2008 में एफआईआर और 2010 में चार्जशीट के बाद करीब 143 तारीखें लगीं, पर कार्यवाही आगे नहीं बढ़ी। वी.एस. पालीट्यूब-सिर्फ 59,000 रुपये के चेक बाउंस का 2013 का मामला 100 से ज्यादा बार लगा। आरोपी नियमित रूप से पेश नहीं हुआ। पप्पू मेट:-जमानत में दो जमानतदार मांगे गए थे। हाईकोर्ट ने पहले ही 11.दिसंबर.2025 को निजी मुचलका 5,000 रुपये और एक जमानतदार पर रिहाई का आदेश दे दिया था। याचिका मंजूर हुई। जिलों से जबाब नहीं, जो आए वो अधूरे हाईकोर्ट ने बच्ची देवी मामले में जमानत की प्रक्रिया तय की थी। कोर्ट के अनुसार 12.अगस्त .2025 के बाद भी 9,775 अग्रिम जमानत और 1,56,155 नियमित जमानत आदेशों में दो जमानतदार मांगे गए। कोर्ट ने कहा -गाज़ियाबाद, लखनऊ, सीतापुर, बुलंदशहर और सहारनपुर में ऐसे आदेश ज्यादा मिले। जिलों से रिपोर्ट मांगी गई, तो केवल 25 ने जवाब दिया और वह भी ज्यादातर अधूरा था। कोर्ट ने आगरा जिला जज की रिपोर्ट की सराहना भी की। मिर्जापुर में 1981 के चार मामले अब तक लंबित मिले। फुल कोर्ट बुलाने और आदेशों के पालन को कहा कोर्ट ने निर्देश जारी किया कि प्रयागराज के अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट उर्मिला मिश्रा का मामला समयबद्ध तरीके से निपटाएं। बार-बार छूट की अर्जियां खारिज हों, जरूरत पड़ने पर जमानत बांड जब्त हों, और सम्मन-वारंट तामील में लापरवाह पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई हो। सरफराज अहमद का मुकदमा भी इन्हीं निर्देशों के अनुसार चलेगा। पालीट्यूब मामले में आरोपी हर तारीख पर हाजिर हो। न आए तो कानपुर नगर के एसएसपी उसकी मौजूदगी सुनिश्चित करें, और फिर भी न आए तो हिरासत में लेकर ट्रायल पूरा हो। कोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश से फुल कोर्ट बुलाने और हाईकोर्ट रूल्स, 1952 के पालन पर संवाद शुरू करने पर विचार का अनुरोध किया गया। कहा फैसले की प्रति केंद्रीय विधि मंत्रालय के न्याय विभाग को भेजी जाए। कहा रजिस्ट्रार जनरल पूरे रिकार्ड का डिजिटलीकरण सुनिश्चित करें। 20 साल में आरोप तय न होना अच्छा नहीं कोर्ट ने कहा कि 20 साल से ज्यादा समय तक आरोप तय न होना, और कुछ मामलों का 40 साल से ज्यादा चलना, संस्था के लिए अच्छा संकेत नहीं है।



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