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कैप्टन घायल थे, विमान नीचे की तरफ जा रहा था और उनके पास खुद को बचाने के बारे में सोचने की तमाम वजहें थीं। फिर भी उस निर्णायक क्षण में उनका ध्यान कॉकपिट के बाहर मौजूद लोगों पर था। उस पल की असली ताकत उनके उस फैसले में ही थी, जो उन्होंने हमले के दौरान लिया था। खुद को बचाने के अलावा वे जितना भी समय किसी और काम में लगाते, उससे हमलावर को उन्हें जान से मारने का एक और मौका मिल जाता। लेकिन यह जानते हुए और घायल होने के बावजूद उन्होंने वो बेशकीमती पल कॉकपिट का दरवाजा खोलने में लगाए। वे जानते थे कि दरवाजा खोलना ही यात्रियों को खतरे के बारे में सचेत करने और दूसरे लोगों को अंदर आकर मदद करने का मौका देने का एकमात्र तरीका था। उन भयावह क्षणों में उनकी चिंता सिर्फ अपनी जान बचाने की नहीं, बल्कि विमान में सवार हर व्यक्ति की सुरक्षा की थी। जिंदगी में ऐसे क्षण आते हैं, जब डर हम पर इतना हावी हो जाता है कि दिमाग कल के बारे में सोचना बंद कर देता है। वह सिर्फ एक बात सोचता है- मैं खुद को कैसे बचाऊं? लेकिन कभी-कभी ऐसे ही डर के बीच कोई व्यक्ति कुछ असाधारण कर जाता है। “मैं खुद को कैसे बचाऊं?’ ये सोचने के बजाय कैप्टन स्मित ने सोचा, “बड़ी तादाद में लोगों की जानें कैसे बचाई जाएं?’ वे स्वभाव से हंसमुख, कम बोलने वाले और शांतचित्त पारिवारिक व्यक्ति हैं। यह बात उनके साहस को और भी अविस्मरणीय बना देती है। हाल ही में फ्लाई दुबई के एक विमान के कॉकपिट में भी कुछ ऐसा ही सवाल खड़ा हुआ, जब खबरों के मुताबिक घायल भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मछार ने अपने घावों की परवाह किए बिना कॉकपिट का दरवाजा खोला। इससे यात्रियों और ऑफ-ड्यूटी पायलटों को अंदर आने और स्थिति को काबू में करने का मौका मिला। दुनिया पहले भी इस तरह के साहस को देख चुकी है। विमान हादसों की बात हो तो सबसे पहले नीरजा भनोट का नाम याद आता है, जिन्होंने कराची हवाई अड्डे पर पैन एम फ्लाइट 73 को आतंकवादियों द्वारा अपहृत कर लिए जाने के दौरान उनका मुकाबला किया और अपनी जान गंवा दी। 23 साल की इस फ्लाइट पर्सर ने पायलटों की विमान से निकलने में मदद की, ताकि अपहर्ता विमान को कहीं और न ले जा सकें। इसके बाद उन्होंने यात्रियों के पासपोर्ट छिपा दिए, ताकि अपहर्ता अमेरिकी नागरिकों की पहचान न कर सकें। जब आतंकवादियों ने गोलीबारी शुरू की, तो नीरजा ने आपातकालीन निकास का दरवाजा खोला और यात्रियों की बाहर निकलने में मदद की। उन्हें तब गोली लगी, जब वे तीन बच्चों को बचाने की कोशिश कर रही थीं। और 26 नवंबर 2008 की वह रात भला कैसे भुलाई जा सकती है, जब गिरगांव चौपाटी पर एएसआई तुकाराम गोपाल ओंबले पुलिस नाके पर तैनात थे और हाईजैक की गई स्कोडा में सवार अजमल कसाब तथा अबू इस्माइल उनकी ओर बढ़ रहे थे? ओंबले जानते थे कि उनके सामने मौजूद व्यक्ति के हाथ में ऑटोमैटिक राइफल है। उसे रोकने के लिए उनके हाथ में कोई हथियार नहीं था। फिर भी उन्होंने खुद उस राइफल को पकड़ने का फैसला किया। उन्हें पता था कि गोलियां उनकी ओर आएंगी, लेकिन वे यह भी जानते थे कि अगर वे कुछ पलों के लिए भी हथियार को जकड़े रख सकें, तो उनके साथी आतंकवादी को काबू में कर सकते हैं। उन्होंने उन कुछ सेकंडों के लिए अपनी जान दे दी, और उन्हीं कुछ सेकंडों ने भारत को 26/11 का एकमात्र जीवित आतंकवादी दिया। नीरजा और ओंबले जैसे बहुत से लोग हैं, जिनके नाम यहां गिनाना मुश्किल है। आरपीएफ कांस्टेबल शिवचरण सिंह भी ऐसे ही एक व्यक्ति थे। वे 2019 में एक ट्रेन को एस्कॉर्ट कर रहे थे, तभी श्यामखाली स्टेशन के पास बाढ़ के कारण ट्रेन रुक गई। उन्होंने बाढ़ में फंसे लोगों की मदद के लिए पुकार सुनी। ट्रेन के साथ बने रहने के बजाय वे खतरनाक पानी में उतर गए और नौ लोगों की जानें बचाईं। उनकी ड्यूटी रेलवे की सुरक्षा की थी। लेकिन जब उनकी आंखों के सामने इंसान डूब रहे थे, तो कर्तव्य की उनकी समझ उनकी नौकरी के दायरे से कहीं बड़ी हो गई। साहस हमेशा अपने होने का ऐलान नहीं करता। लेकिन ऊपर बताए हर मामले में जहां डर मौजूद था, वहां कर्तव्य की भावना उससे भी ज्यादा मजबूत थी। फंडा यह है कि डर और ड्यूटी के बीच चुनाव के क्षण में ही हमारा असली चरित्र सामने आता है। और यही कारण है कि शायद सबसे बड़े नायक वे लोग नहीं होते जिन्हें कभी डर महसूस नहीं होता। बल्कि वे होते हैं, जिन्होंने डर को पूरी तरह महसूस किया था और इसके बावजूद अपना कर्तव्य निभाया।
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एन. रघुरामन का कॉलम:क्या होता है जब डर और ड्यूटी का आमना-सामना हो?
