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बिल की हार्ड व सॉफ्ट कॉपी में हेरफेर:सिपाही शंभू ने सिस्टम हैक कर 21 खातों में भेजी 28 करोड़ सरकारी राशि




हजारीबाग एसपी कार्यालय के लेखा शाखा (अकाउंट सेक्शन) में हुए 28 करोड़ के गबन मामले में सीआईडी की जांच रिपोर्ट से यह पूरी तरह साफ हो गया है कि सिपाही शंभू कुमार और उसके साथियों ने मिलकर सरकारी तंत्र को कैसे धोखा दिया। रांची स्थित एजेंसी-18 के विशेष न्यायाधीश की अदालत में सुनवाई के दौरान सीआईडी और अभियोजन पक्ष ने खुलासा किया कि वर्दी पहनकर सरकारी रिकॉर्ड्स और डिजिटल डेटा के जरिए इस महाघोटाले को कैसे अंजाम दिया गया। सीआईडी द्वारा कोर्ट को सौंपी गई जानकारी के अनुसार, घोटाले की पूरी पटकथा एसपी कार्यालय के अंदर रची गई थी। हजारीबाग एसपी ऑफिस के डीडीओ कोड (एचजेडबीपीओएल007) का इस्तेमाल कर पिछले 8 से 10 वर्षों के दौरान लगातार अवैध ट्रांजैक्शन किए गए। जांच में पाया गया कि बिलों की जो हार्डकॉपी तैयार होती थी और सिस्टम में जो सॉफ्ट कॉपी दर्ज होती थी, दोनों के ब्योरे में बड़ा अंतर रहता था। हालांकि, दोनों में दिखाई जाने वाली कुल निकासी राशि एक समान रखी जाती थी, ताकि पहली नजर में किसी को शक न हो। शंभू कुमार ने अपने साथी सिपाही रजनीश सिंह उर्फ पंकज सिंह और धीरेंद्र सिंह के साथ मिलकर कार्यालय के कंप्यूटर सिस्टम में दर्ज डेटा को मैनिपुलेट किया। इसके बाद आधिकारिक रिकॉर्ड्स में हेराफेरी कर सरकारी फंड को निजी खातों में डायवर्ट कर दिया गया। सीआईडी ने कोर्ट में खोली पोल: पुलिस तंत्र के भीतर से चला नेटवर्क सीआईडी की जांच में यह बात सामने आई कि शुरुआत में बिहार के गया स्थित एसबीआई अनुग्रह कॉलोनी शाखा के दो खातों में सीधे सरकारी राशि ट्रांसफर की गई। जांच में खुलासा हुआ कि इनमें से खाता संख्या 31331756028 खुद सिपाही शंभू कुमार का था, जबकि खाता संख्या 32904118657 संगीता चौधरी के नाम पर था। वित्त विभाग के पीएफएमएस ट्रेजरी डेटा विश्लेषण में सबसे पहले दो खातों के जरिए 15,41,41,485 के गबन का खुलासा हुआ था। जब सीआईडी और जांच कमेटी ने पूछताछ और तकनीकी जांच आगे बढ़ाई, तो आरोपियों ने स्वीकार किया कि वे पिछले 8 से 10 वर्षों में भारतीय स्टेट बैंक के कुल 21 बैंक खातों का इस्तेमाल कर रहे थे। सीआईडी के अनुसार, इस पूरे नेटवर्क के माध्यम से सरकारी खजाने से लगभग 27 से 28 करोड़ रुपए की भारी-भरकम राशि अवैध रूप से निकाली जा चुकी है। अदालत में सीआईडी की ओर से बताया गया कि आरोपी सिर्फ बाहरी जालसाज नहीं हैं, बल्कि एसपी ऑफिस की लेखा शाखा में तैनात लोक सेवक थे, जिनके जिम्मे सरकारी रिकॉर्ड और फंड की देखरेख थी। इन्होंने अपने पद का दुरुपयोग कर एक आपराधिक साजिश रची और सिस्टम में बैठकर लगातार 10 साल तक फर्जीवाड़े को अंजाम दिया।



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