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AAP विधायक की बगावत से बदलेंगे समीकरण:विधानसभा चुनाव से पहले मौड़ की राजनीति पर असर; माइसरखाना लगातार सुर्खियों में रहे




बठिंडा के हलका मौड़ मंडी से AAP विधायक सुखबीर सिंह माइसरखाना के भावुक होकर अपनी ही सरकार के खिलाफ सवाल उठाने और इसके तुरंत बाद पार्टी की कार्रवाई ने सियासत में नया विवाद खड़ा कर दिया है। माइसरखाना ने सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, अपने हलके के लोगों की समस्याओं और सरकार में विधायकों की सुनवाई नहीं होने का मुद्दा उठाया। लाइव के दौरान वे कई बार भावुक हुए और कहा कि उनके साथ लगातार धक्का हो रहा है। उन्होंने यहां तक कहा कि टिकट मिले या न मिले, उन्हें इसकी चिंता नहीं, लेकिन लोगों के मुद्दों पर वे आवाज उठाते रहेंगे। इसके बाद AAP ने उन पर पार्टी विरोधी गतिविधियों और अनुशासनहीनता के आरोप लगाते हुए कार्रवाई की। ‘शिक्षा क्रांति’ पर अपने ही विधायक का सवाल
इस विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू शिक्षा है। माइसरखाना ने सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि कई स्कूलों में लंबे समय से पद खाली हैं और बार-बार मांग के बावजूद समस्या पूरी तरह हल नहीं हुई। मामला इसलिए भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि माइसरखाना के अपने बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं। वह पंजाब विधानसभा के उन 36 विधायकों में अकेले थे, जिनके स्कूली उम्र के बच्चे 2025-26 सत्र में सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे थे। माइसरखाना का बेटा मौड़ के पास रामनगर स्थित स्कूल आफ एमिनेंस और बेटी माइसरखाना गांव के सरकारी प्राथमिक स्कूल में पढ़ रही है, इसलिए अब जब वही विधायक सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी का सवाल उठा रहे हैं, तो मामला AAP सरकार की ‘शिक्षा क्रांति’ के राजनीतिक दावे से सीधे जुड़ गया है। टिकट की भनक या मुद्दों का गुस्सा?
माइसरखाना के बयान के बाद सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है कि क्या उन्हें आगामी विधानसभा चुनाव में टिकट कटने की आशंका थी और इसी वजह से उन्होंने भावुक होकर अपनी बात सार्वजनिक की, या फिर सरकारी स्कूलों और स्थानीय समस्याओं को लेकर उनका असंतोष वास्तव में पुराना था। माइसरखाना ने खुद अपने लाइव में टिकट का जिक्र करते हुए कहा कि टिकट मिले या न मिले, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। उनका कहना था कि वह लोगों के लिए राजनीति में आए हैं और लोगों के मुद्दे उठाते रहेंगे। साढ़े चार साल में यह विरोध खुलकर क्यों नहीं आया?
यहीं से सियासी बहस शुरू होती है। सोशल मीडिया पर कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि यदि सरकार की नीतियों और कामकाज को लेकर इतनी नाराजगी थी, तो पिछले साढ़े चार साल में यह विरोध खुलकर क्यों नहीं आया? माइसरखाना समर्थक इसके जवाब में कह रहे हैं कि विधायक का काम अपने क्षेत्र की समस्याएं सरकार तक पहुंचाना है और अब जब समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो उन्होंने सार्वजनिक रूप से आवाज उठाई। ‘नया हलका इंचार्ज’ वाली कहानी में भी ट्विस्ट
माइसरखाना प्रकरण को मौड़ में ‘नया हलका इंचार्ज लगाए जाने’ से जोड़कर देखा जा रहा है। 2022 में माइसरखाना आप की टिकट पर मौड़ से 63,099 वोट लेकर 35,008 वोटों के अंतर से जीते थे। निर्दलीय उम्मीदवार लक्खा सिधाना 28,091 वोट लेकर दूसरे स्थान पर रहे थे। सितंबर में वारिस पंजाब दे ने लखवीर सिंह उर्फ लक्खा सिधाना को मौड़ का हलका इंचार्ज बनाया था। इसे AAP द्वारा माइसरखाना की जगह नया हलका इंचार्ज लगाए जाने के रूप में पेश करना सही नहीं होगा। ऐसे में 2027 से पहले दोनों नामों की राजनीतिक सक्रियता मौड़ की लड़ाई को अलग आयाम देती है। AAP के लिए असली चुनौती ‘कहानी’ की होगी
इस पूरे विवाद में चुनावी राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहेगा कि जनता के सामने कहानी किस रूप में जाती है। AAP इसे अनुशासन और पार्टी लाइन से जोड़ सकती है। माइसरखाना इसे जनता के मुद्दों और सरकारी स्कूलों की लड़ाई के रूप में पेश कर सकते हैं। यहीं से ‘शिक्षा क्रांति’ वाला मुद्दा भी चुनावी बहस में प्रवेश कर सकता है। क्योंकि माइसरखाना केवल कोई बाहरी आलोचक नहीं हैं। वह उसी पार्टी के विधायक हैं, जिसने सरकारी स्कूलों के कायाकल्प को अपनी प्रमुख उपलब्धियों में रखा है और जिनके अपने बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं। तीन महीने पहले कार्रवाई: AAP को क्या फायदा?
चुनाव से पहले किसी मौजूदा विधायक पर कार्रवाई का पहला फायदा संगठनात्मक अनुशासन के स्तर पर हो सकता है। पार्टी नेतृत्व यह संदेश देना चाहता है कि सरकार और संगठन के खिलाफ सार्वजनिक तौर पर अलग लाइन लेने को स्वीकार नहीं किया जाएगा। दूसरा फायदा यह हो सकता है कि पार्टी के पास अब मौड़ में वैकल्पिक राजनीतिक चेहरा और संगठन खड़ा करने के लिए समय रहेगा। तीसरा पहलू यह है कि पार्टी माइसरखाना के बयान को व्यक्तिगत मतभेद के रूप में सीमित रखने की कोशिश कर सकती है, ताकि शिक्षा, विकास और सरकार की नीतियों पर उठे सवाल संगठनात्मक विवाद में बदलने से रोके जा सकें। नुकसान भी कम नहीं
नुकसान का सबसे बड़ा पहलू यह है कि माइसरखाना अब खुद को ‘पार्टी से निकाले गए नेता’ की बजाय ‘लोगों और स्कूलों के मुद्दे उठाने वाले विधायक’ के रूप में पेश कर सकते हैं। शिक्षकों की कमी जैसा मुद्दा चुनावी माहौल में संवेदनशील है। खासकर तब, जब विधायक खुद अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ा रहे हों। इससे उनका तर्क व्यक्तिगत राजनीतिक शिकायत से आगे जाकर सरकारी स्कूलों और अभिभावकों के मुद्दे के रूप में पेश हो सकता है। माइसरखाना भारी अंतर से जीते थे दूसरा नुकसान मौड़ में व्यक्तिगत वोट आधार का है। 2022 में माइसरखाना भारी अंतर से जीते थे। यह पूरा वोट सिर्फ उनका व्यक्तिगत था, ऐसा निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा, क्योंकि चुनाव में पार्टी की लहर और संगठन भी महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन इतना जरूर है कि मौजूदा विधायक को चुनाव के ठीक पहले अलग कर पार्टी को अपने स्थानीय नेटवर्क और संगठन की ताकत को नए सिरे से परखना होगा।



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