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आज का एक्सप्लेनर:प्लेग का बैक्टीरिया लैब से लीक, क्या रूस छिपाने में जुटा; ट्रम्प बोले- पुतिन से बात करूंगा; आखिर अंदरखाने कैसे हैं हालात




अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा कि वह रूसी राष्ट्रपति पुतिन से न्यूमोनिया प्लेग के बारे में बात करेंगे। दरअसल, 2 अक्टूबर को रूस के साइबेरिया में दारिया शिपिलोवा नाम की एक लैब टेक्नीशियन की मौत हुई थी। रिपोर्ट्स हैं कि वो प्लेग से संक्रमित थी। उसके संपर्क में आए 200 लोग भी क्वारंटीन किए गए हैं। पहले भी ‘ब्लैक डेथ’ नाम की इस बीमारी से दुनिया में करोड़ों लोगों मारे जा चुके हैं। आखिर दारिया की मौत पूरी कहानी क्या है, रूस इस बीमारी के बारे में खुलकर कुछ बता क्यों नहीं रहा और क्या कोरोना की तरह कोई बड़ी महामारी आने की आशंका है, जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में.… सवाल-1: कौन है दारिया शिपिलोवा और उसकी मौत कैसे हुई?
जवाबः रूस के साइबेरिया प्रांत में एक शहर है- इरकुत्स्क। यहां ‘एंटी-प्लेग रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ साइबेरिया एंड द फार ईस्ट’ नाम का एक संस्थान है, जो प्लेग के मामले में रिसर्च करता है। 28 साल की दारिया इसी इंस्टीट्यूट में लैब टेक्नीशियन थीं। कथित तौर पर 25 सितंबर की रात को लैब में काम करते समय दारिया के हाथों से एक टेस्ट-ट्यूब टूट गई, जिसमें ‘येर्सिनिया पेस्टिस’ मौजूद था। इसी बैक्टीरिया से प्लेग की बीमारी फैलती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, दारिया रिसर्च कर रही थीं कि ये बैक्टीरिया हर एंटीबायोटिक दवा से खुद को कैसे बचा लेता है। कुछ घंटे बाद दारिया की तबीयत बिगड़ने लगी। उन्हें पास के शहर शेलेखोव के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने पहले कोरोना संक्रमण की बात कही, लेकिन बाद में पता चला कि उन्हें प्लेग के चलते न्यूमोनिया हुआ है। इलाज के दौरान 2 अक्टूबर की रात दारिया की मौत हो गई। सवाल-2: क्या रूस कुछ छिपाने की कोशिश कर रहा है?
जवाबः रूस की स्वास्थ्य निगरानी करने वाली संस्था ‘रोस्पोत्रेबनादजोर’ के मुताबिक, ‘दारिया की मौत किसी अज्ञात वजह से होने वाली न्यूमोनिया से हुई। लैब में उनकी रिसर्च से जुड़े काम में कोई बैक्टीरिया या वायरस वगैरह नहीं पाया गया और इलाके में महामारी से जुड़े हालात सामान्य हैं।’ हालांकि कई संकेत हैं कि रूस असली बात छिपा रहा है… अमेरिकी नेताओं ने आशंका जताई है कि रूस कोई जैविक हथियार बना रहा है। रिपब्लिकन नेता डॉन बेकन ने कहा, ‘रूस ये प्रचार करता है कि अमेरिका की मदद से यूक्रेन बायोलॉजिकल वेपन बना रहा है। जबकि असलियत ये है कि ऐसी लैब रूस में चलाई जा रही हैं।’ सवाल-3: ये न्यूमोनिक प्लेग है क्या?
जवाबः ‘येर्सिनिया पेस्टिस’ बैक्टीरिया कई स्तनधारियों, चूहों और उन पर पाए जाने वाले परजीवी पिस्सुओं में होता है। ये पिस्सू मुख्य रूप से चूहे, कुत्ते और बिल्ली जैसे गर्म खून वाले स्तनधारी जानवरों के शरीर पर रहते हैं। संक्रमित पिस्सू के काटने, संक्रमित जानवर के सीधे संपर्क और सांस के कणों के जरिए प्लेग फैलता है। पिस्सू जिस जानवर के शरीर पर रहता है, उसे काटता रहता है। प्लेग के बैक्टीरिया संक्रमित पिस्सू के पाचन तंत्र के एक अहम हिस्से, ‘प्रोवेंट्रिकुलस’ में जमा हो जाते हैं। प्रोवेंट्रिकुलस में आई रुकावट दूर करने के लिए पिस्सू शरीर में इकठ्ठा हुए खून को होस्ट जानवर या इंसान के शरीर में छोड़ देता है। प्लेग 3 तरह के होते हैं- 1. ब्यूबोनिक: प्लेग से 60% मामलों में मौत 2. सेप्टिकैमिक प्लेग: 100% तक मामलों में मौत 3. न्यूमोनिक प्लेग: 100% तक मामलों में मौत दुनिया में प्लेग की महामारी फैलने का पुराना इतिहास है। सवाल-4: प्लेग ने कब-कब दुनिया को गिरफ्त में लिया?
जवाबः दुनिया में 3 बार प्लेग की बड़ी महामारी फैल चुकी है… 541 ईस्वी: जहाज में मरे हुए लोगों से फैला प्लेग ब्यूबोनिक प्लेग मध्य अफ्रीका से शुरू हुआ और इजिप्ट से लेकर भूमध्य सागर केइलाके तक फैला। तब के बाइजेंटाइन साम्राज्य के रोमन सम्राट जस्टिनियन प्रथम के नाम पर महामारी का नाम ‘जस्टिनियन प्लेग’ रखा गया। कहा जाता है कि चीन से आया एक जहाज इजिप्ट के पेलुसियम बंदरगाह पर रुका। जहाज से कोई नीचे नहीं उतरा, तो स्थानीय लोग ऊपर गए। चारों तरफ सड़ी हुई लाशें पड़ी थीं। शवों को नीचे उतारकर ठिकाने लगा दिया गया। अगले 3 से 4 दिनों में शहर में सभी लोगों के लिम्फ नोड्स में भयानक दर्द वाली गांठ बनने लगी। एक हफ्ते के भीतर शहर में मौतों का सिलसिला शुरू हो गया। शवों को दफनाने की जगह कम पड़ने लगी। साम्राज्य की राजधानी कॉन्स्टेंटिनोपल प्लेग का सेंटर था। रोजाना 10 हजार लोग मर रहे थे। अगले सौ सालों में यूरोप, मिडिल-ईस्ट एशिया तक प्लेग फैला। ‘जस्टिनियन प्लेग’ को प्लेग की पहली महामारी माना जाता है। 1347 ईस्वी: यूरोप में फैली ‘द ब्लैक डेथ’ वैज्ञानिकों का मानना है कि यूरोप में प्लेग मध्य एशिया से आया था। कहा जाता है कि 1347 में क्रीमिया के काफा शहर को तुर्किश ‘किपचक’ जनजाति के सैनिकों ने घेरा। ये मंगोल साम्राज्य के एक हिस्से गोल्डन होर्ड की सेना थी। सैनिकों में ब्यूबोनिक प्लेग फैला, तो शासक जानी बेग ने सैनिकों की लाशों को तोप जैसे हथियार के जरिए काफा शहर के अंदर फेंकना शुरू किया। इससे काफा में प्लेग फैल गया। काफा के बाद आगे कई सालों जहाजों के जरिए, सिसिली, उत्तरी अफ्रीका, इटली, स्पेन, इंग्लैंड, स्विट्जरलैंड और जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों में प्लेग फैला। करीब एक-तिहाई यानी, करीब 2.5 करोड़ लोगों की मौत हुई थी। इसे ‘द ब्लैक डेथ’ कहा गया। 1855 ईस्वी: चीन से प्लेग फैला, भारत में 1 करोड़ मौतें हुईं दक्षिण-पश्चिम चीन के युन्नान के जंगलों में रहने वाले भूरे पेट वाले चूहों से इंसानों में प्लेग की शुरुआत हुई और जहाजों के जरिए भारत, हांगकांग और ताइवान जैसे कुल 60 देशों में प्लेग फैला। अकेले भारत में 1918 तक करीब एक करोड़ लोग मारे गए। महामारी 1960 तक लगभग खत्म हो गई। हालांकि 1990 के बाद अफ्रीका में इसके काफी मामले सामने आए हैं। 1894 में फ्रांसीसी जीवविज्ञानी एलेक्जेंडर येर्सिन ने प्लेग के बैक्टीरिया की खोज की। तब तक इसका मुख्य वाहक भूरे चूहे के पिस्सू थे। बाद में काले चूहों के जरिए बैक्टीरिया फैलने लगा। व्यापारिक जहाजों में लोग सामान और अनाज वगैरह लेकर जाते थे, इनके साथ चूहे भी दूर-दूर तक पहुंचते थे, जिनसे प्लेग फैलता था। सवाल-5: क्या रूस की घटना से भारत भी खतरे में है?
जवाबः अभी इसके कोई सबूत नहीं हैं कि दारिया के बाद किसी और व्यक्ति को प्लेग हुआ है। रूस ने भी अब तक कोई दूसरा मामला नहीं बताया है।
WHO ने कहा है कि, ‘रूसी अधिकारियों के मुताबिक शुरू में महिला की बीमारी एक खास और तेज वायरल संक्रमण की तरह सामने आई। महिला के संपर्क में आने वाले लोगों में प्लेग या किसी और खतरनाक बीमारी फैलाने वाले पैथोजेन का कोई मामला सामने नहीं आया है। महिला की मौत कैसे हुई, इसे लेकर रूस के जवाब का इंतजार है।’ अगर रूस में इस बीमारी के मामले बढ़े, तो भारत के लिए चिंता की बात होगी। क्योंकि सामान की आवाजाही के अलावा हर साल लाखों रूसी भारत आते हैं। ——————— ये खबर भी पढ़ें… आज का एक्सप्लेनर:क्या H1N1 वायरस, कोविड जैसा खतरनाक; भारत में 13000 से ज्यादा मामले, स्वाइन फ्लू से जुड़े 6 जरूरी सवालों के जवाब देश में H1N1 इन्फ्लुएंजा वायरस, यानी ‘स्वाइन फ्लू’ के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। केरल में इन्फ्लुएंजा के 7,421 मामले आए और 88 मौतें हो चुकी हैं। पूरी खबर पढ़ें…



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