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सोशल मीडिया पर ऐसी घटना की झूठी जानकारी फैलाना, जो असल में हुई ही नहीं, कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने LPU में फर्जी जानकारी फैलने के मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि ऐसी पोस्ट अचानक हिंसा भड़का सकती है और इससे जान-माल का नुकसान हो सकता है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या सिर्फ झूठी पोस्ट करने वाले व्यक्ति को ही जिम्मेदार माना जाए या फिर उस सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तय करने के लिए भी कोई व्यवस्था होनी चाहिए, जहां से ऐसी जानकारी फैली। मामले की अगली सुनवाई सोमवार को होगी। चीफ जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की डिवीजन बेंच ने ये टिप्पणियां पंजाब सरकार की ओर से LPU में सोशल मीडिया पर फैली झूठी जानकारी के बाद हुए हंगामे के संबंध में दी गई जानकारी पर कीं। कोर्ट ने कहा कि जांच सिर्फ पोस्ट अपलोड करने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि फर्जी जानकारी के पीछे कौन था और उसका स्रोत क्या था। जानबूझकर झूठ फैलाना अलग बात चीफ जस्टिस ने कहा कि संविधान अभिव्यक्ति की आजादी की मजबूती से रक्षा करता है। हर व्यक्ति को अपनी राय रखने और आलोचना करने का अधिकार है। लेकिन अगर सार्वजनिक भावनाएं भड़काने के उद्देश्य से जानबूझकर झूठी जानकारी फैलाई जाती है तो इसे अभिव्यक्ति की आजादी के बराबर नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि सोशल मीडिया पर किसी गंभीर घटना की झूठी जानकारी तेजी से फैलने पर बड़ी संख्या में लोग अचानक सड़कों पर उतर सकते हैं। इससे स्थिति बिगड़ सकती है और हिंसा की आशंका पैदा हो सकती है। चितकारा में छात्रा की मौत के अगले दिन फर्जी पोस्ट राज्य सरकार के अनुसार, 25 सितंबर को एक छात्रा की आत्महत्या के बाद चितकारा यूनिवर्सिटी में स्थिति तनावपूर्ण हुई थी। इसके अगले दिन सोशल मीडिया पर यह झूठी जानकारी फैलाई गई कि LPU में एक पुरुष कर्मचारी ने छात्रा के साथ दुष्कर्म किया है। याचिकाकर्ता ने दोनों घटनाओं के बीच संबंध होने का दावा किया था। हाईकोर्ट ने कहा कि दोनों घटनाओं को अलग-अलग पहलुओं से देखा जाना चाहिए। कोर्ट ने राज्य सरकार को यह भी पता लगाने के निर्देश दिए कि क्या दोनों घटनाओं को लेकर सोशल मीडिया पर जानकारी फैलाने के लिए एक ही प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल हुआ था। पंजाब सीमावर्ती राज्य, फर्जी खबर का असर गंभीर राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि मामले में अब तक 9 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इनमें दो बाहरी लोग भी शामिल हैं, जिन्हें एक पिज्जा डिलीवरी कंपनी का कर्मचारी बताया गया है। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सत्य पाल जैन ने LPU कैंपस में बाहरी लोगों के प्रवेश से जुड़े आरोपों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि संबंधित अधिकारियों को ऐसे लोगों की पहचान कर मामले की जांच करनी चाहिए। हाईकोर्ट ने कहा कि पंजाब सीमावर्ती राज्य है, इसलिए झूठी जानकारी के जरिए बड़े स्तर पर अशांति फैलने की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि अगर हजारों छात्रों को सोशल मीडिया के जरिए यह जानकारी मिले कि कोई गंभीर घटना हुई है, तो वे अचानक सड़कों पर उतर सकते हैं। इससे हिंसा भड़क सकती है और बड़े स्तर पर जान-माल का नुकसान हो सकता है। कोर्ट ने LPU में करीब 28 हजार छात्रों का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसी स्थिति पैदा होने पर यूनिवर्सिटी को कई दिनों तक बंद रखना पड़ सकता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी पर सवाल हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों से निपटने के लिए स्पष्ट प्रक्रिया या व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है। कोर्ट इस पहलू पर भी विचार कर रहा है कि अगर किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फैली झूठी जानकारी के कारण हिंसा या जान-माल का नुकसान होता है तो उस प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तय करने के लिए क्या व्यवस्था हो सकती है। कोर्ट ने राज्य सरकार को यह भी निर्देश दिए कि जांच को केवल पोस्ट डालने वाले व्यक्ति तक सीमित न रखा जाए। यह पता लगाया जाए कि जानकारी का स्रोत क्या था और इसके पीछे कौन लोग थे।
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LPU हिंसा मामले में फर्जी पोस्ट पर हाईकोर्ट सख्त:कहा-प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी तय क्यों नहीं की?; जानबूझकर झूठ फैलाना अलग बात
