रूमी जाफरी11 घंटे पहले
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‘ऐ मेरी जोहराजबीं, तुझे मालूम नहीं…’ गीत के दृश्य में बलराज साहनी।
पिछले कॉलम में मैंने बलराज साहनी जी के बारे में लिखा था। उसके बाद मुझे कई लोगों के संदेश आए। उनका कहना था कि कॉलम कुछ ज्यादा इमोशनल हो गया। उसमें मैंने मुख्य रूप से उनके बंगले का जिक्र किया, लेकिन उनके फिल्मी सफर पर बात नहीं की। शायद मैंने ऐसा इसलिए नहीं किया, क्योंकि मुझे लगा था कि इतने महान अभिनेता के बारे में अधिकांश लोग पहले से जानते होंगे। लेकिन फिर सोचा कि अब पीढ़ी बदल चुकी है। नई पीढ़ी के बहुत से लोग ऐसे होंगे, जो बलराज साहनी के बारे में इतना ना जानते होंगे। वो उनके जीवन के बारे में जानना चाहते होंगे। तो आइए, आज उनके इसी सफर की बात करते हैं।
बलराज साहनी का जन्म रावलपिंडी में हुआ था। उनकी शिक्षा लाहौर में हुई। इंग्लिश लिटरेचर में एमए करने के बाद वे रवीन्द्रनाथ टैगोर के शांतिनिकेतन में अध्यापन करने लगे। इसी दौरान उनकी शादी दमयंती जी से हुई, जो स्वयं एक अच्छी अदाकारा थीं। वर्ष 1939 में उनके यहां पुत्र परीक्षित साहनी का जन्म हुआ।
बलराज जी शुरू से ही प्रगतिशील विचारों के व्यक्ति थे। वे आर्य समाजी थे और उनके भीतर देशभक्ति कूट-कूटकर भरी हुई थी। बाद में उन्होंने शांतिनिकेतन छोड़ दिया और महात्मा गांधी के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए। गांधी जी ने उनसे कहा कि वे हिंदी का प्रचार करें और विदेशों में भारत की सही तस्वीर प्रस्तुत करें। इसी उद्देश्य से वे लंदन गए और वहां बीबीसी में उद्घोषक के रूप में काम करने लगे। हालांकि, उनका मन वहां ज्यादा नहीं लगा और वे वापस भारत लौट आए। लेकिन लंदन में उनकी मुलाकात कुछ रूसी कलाकारों और बुद्धिजीवियों से हुई। उन्होंने रूसी फिल्म और नाटक देखे, जिनसे उनका झुकाव साम्यवादी विचारधारा की ओर होने लगा। भारत लौटने के बाद वे मुंबई आए। उस समय कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े लेखकों ने ‘प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन’ बनाई थी और ‘इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा)’ के माध्यम से रंगमंच पर सक्रिय थे। बलराज साहनी भी इप्टा से जुड़ गए। उनकी पत्नी दमयंती पहले से ही इप्टा की मशहूर एक्ट्रेस बन चुकी थीं।
बलराज साहनी की प्रतिभा को सबसे पहले ख्वाजा अहमद अब्बास ने पहचाना। उन्होंने अपनी फिल्म ‘धरती के लाल’ में उन्हें अवसर दिया। इसके बाद उन्हें कई फिल्में मिलीं, लेकिन उनके करियर का असली टर्निंग पॉइंट बनी ‘दो बीघा जमीन’। इस फिल्म ने कान्स फिल्म फेस्टिवल में भी पुरस्कार जीता। इसके बाद तो उन्होंने एक से बढ़कर एक यादगार किरदार निभाए और खुद को देश के सर्वश्रेष्ठ अभिनेताओं की कतार में स्थापित कर दिया। उनकी आखिरी फिल्म ‘गरम हवा’ भी क्लासिक फिल्मों में गिनी जाती है। लेकिन नियति का खेल देखिए, फिल्म रिलीज होने के कुछ ही दिनों बाद 59 वर्ष की आयु में बलराज साहनी हम सबको छोड़कर इस दुनिया से चले गए। इसी बात पर मुझे अहमद नदीम क़ासमी का एक शेर याद आ रहा है :
कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊंगा मैं तो दरिया हूं समुंदर में उतर जाऊंगा
‘दो बीघा जमीन’ से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा भी है। किसी ने बिमल रॉय को बलराज साहनी का नाम सुझाया। जब बलराज जी उनसे मिलने पहुंचे तो वे सूट-बूट और टाई पहनकर गए थे। बातचीत के बाद बिमल रॉय ने अपने सहायक से बंगाली में कहा, “तुम किसे लेकर आए हो? ये इतना सूटेड बूटेड आदमी है और मेरा किरदार तो एक रिक्शा चालक का है!’ बलराज जी बंगाली भी जानते थे। वे समझ गए कि बिमल राॅय क्या कह रहे हैं। बलराज जी ने बिमल जी से कहा कि आप अपने किरदार के बारे में बताएं। तो मैं उसके हिसाब से आपको कुछ सीन्स बताऊंगा। जब बिमल राय ने बताया कि यह गरीब रिक्शा चालक का किरदार है तो बलराज जी ने अपनी पुरानी फिल्म से वह दृश्य दिखाए, जिसमें वे गरीब बने थे। उनका अभिनय देखकर बिमल रॉय ने उन्हें दो बीघा जमीन के लिए चुन लिया।
एक और किस्सा बड़ा दिलचस्प है। चूंकि बलराज साहनी रावलपिंडी के थे और उस समय लोग एक-दूसरे से कनेक्टेड रहते थे। इसलिए उन्हें अजान देना भी आता था और नमाज की बुनियादी जानकारी भी थी। एक बार वे हैदराबाद से मुंबई की फ्लाइट में आ रहे थे। उसी विमान में हज पर जाने वाले काफी यात्री भी थे। अचानक विमान तेज टर्बुलेंस में फंस गया। लोग घबरा गए, चीखने-चिल्लाने लगे। एयर होस्टेस भी परेशान थी। बलराज साहनी से यह दृश्य देखा नहीं गया। वे अचानक अपनी सीट से उठे और ऊंची आवाज में अजान देना शुरू कर दिया। विमान में मौजूद अधिकांश यात्रियों को यह पता ही नहीं था कि वे अभिनेता हैं। अजान सुनते ही माहौल शांत होने लगा। लोगों ने नमाज की नीयत बांध ली और बलराज साहनी ने नमाज पढ़ानी शुरू कर दी। जब तक नमाज पूरी हुई, टर्बुलेंस भी समाप्त हो चुका था। बाद में यात्रियों को बताया गया कि ये मशहूर अभिनेता बलराज साहनी हैं और उन्होंने केवल आप लोगों की घबराहट कम करने के लिए ऐसा किया था। तो ऐसे थे बलराज साहनी। एक महान अभिनेता, संवेदनशील इंसान और असाधारण व्यक्तित्व के धनी। आज उनकी याद में फिल्म ‘वक्त’ का यह अमर गीत सुनिए, अपना ख्याल रखिए और हमेशा खुश रहिए।
ऐ मेरी जोहराजबीं, तुझे मालूम नहीं…

