बिलासपुर1 घंटे पहले
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हाईकोर्ट ने लोक अदालत का फैसला निरस्त कर लेबर कोर्ट को 5 माह के भीतर निर्णय लेने का आदेश दिया है।
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में आयोजित लोक अदालत में बिना किसी समझौते के मुआवजे का केस बंद कर दिया गया। साथ ही दोषी ठेकेदार को मुआवजा देने की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया। इस फैसले के खिलाफ राज्य विद्युत मंडल (CSPDCL) की याचिका पर हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है।
जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल ने कहा कि लोक अदालत को मुकदमों के गुण-दोष पर फैसला सुनाने का अधिकार नहीं है। लोक अदालत का कार्यक्षेत्र दोनों पक्षों की आपसी सहमति या समझौते के आधार पर विवाद का निपटारा करने तक सीमित है।
अगर बीच कोई समझौता नहीं होता है, तो मामले को संबंधित कोर्ट में वापस भेजना होता है। इसी के साथ हाईकोर्ट ने लेबर कोर्ट को मामले की दोबारा सुनवाई कर 5 महीने के भीतर फैसला सुनाने का आदेश दिया है।

CSPDCL की याचिका पर हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है।
पढ़िए सिलसिलेवार पूरा मामला ?
दरअसल, पूरा मामला CSPDCL से जुड़ा है। CSPDCL ने बिजली मेंटेनेंस समेत अन्य काम के लिए अभिनव तिवारी को ठेका दिया था। ठेकेदार ने छोटू उर्फ शत्रुहन नाम के युवक को काम पर रखा था। साल 2012-13 में काम के दौरान छोटू करंट की चपेट में आ गया, जिससे उसकी मौत हो गई।
छोटू के माता-पिता ने कर्मचारी मुआवजा अधिनियम के तहत 9 लाख 880 रुपए मुआवजे की मांग करते हुए लेबर कोर्ट में दावा पेश किया। CSPDCL ने यह राशि कोर्ट में जमा कर दी थी।
हालांकि, CSPDCL ने इसका विरोध करते हुए कहा कि मुआवजा देने की असली जिम्मेदारी ठेकेदार अभिनव तिवारी की है और यह रकम उसी से वसूली जानी चाहिए। वहीं, ठेकेदार ने छोटू को अपना कर्मचारी मानने और मुआवजा देने से साफ इनकार कर दिया था।
लोक अदालत ने बिना समझौते के ठेकेदार को दी राहत
CSPDCL और ठेकेदार के बीच यह विवाद लेबर कोर्ट में चल रहा था। इसी बीच ठेकेदार ने मामला लोक अदालत में लगाया। वहां छोटू के परिजनों ने कहा कि मुआवजे की राशि कोर्ट में जमा हो चुकी है, इसलिए वे मामले को मेरिट पर आगे नहीं बढ़ाना चाहते।
इसके बाद 6 दिसंबर 2014 को लोक अदालत ने बिना किसी समझौते के केस बंद कर दिया और ठेकेदार को मुआवजा देने की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया।
CSPDCL ने लोक अदालत के फैसले को दी चुनौती
बिना किसी समझौते के केस खत्म करने और ठेकेदार को मुआवजे की जिम्मेदारी से मुक्त करने के फैसले के खिलाफ CSPDCL ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। CSPDCL ने याचिका में कहा कि लोक अदालत ने उसका पक्ष सुने बिना एकपक्षीय आदेश जारी किया, जो नियमों के खिलाफ है।

हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद CSPDCL की अपील मंजूर कर ली।
सहमति के बगैर ठेकेदार को दायित्व से मुक्त करना गलत
हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद CSPDCL की अपील मंजूर कर ली। कोर्ट ने कहा कि जब तक सभी पक्षों के बीच आपसी सहमति नहीं होती, तब तक लोक अदालत ठेकेदार को मुआवजे के दायित्व से मुक्त नहीं कर सकती।
हाईकोर्ट ने CSPDCL के खिलाफ पारित एकतरफा आदेश और लोक अदालत की ओर से साल 2014 में जारी अवार्ड को रद्द कर दिया। साथ ही लेबर कोर्ट को मामले की दोबारा सुनवाई कर 5 महीने के भीतर कानून के अनुसार फैसला सुनाने का निर्देश दिया।
समझौते के आधार पर विवाद सुलझाने का मंच है लोक अदालत
लोक अदालत विवादों को आपसी सहमति से सुलझाने का वैकल्पिक मंच है। इसका उद्देश्य अदालतों में लंबित मामलों या मुकदमा शुरू होने से पहले के विवादों को शांतिपूर्ण तरीके से समझौते के जरिए खत्म करना है। विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत लोक अदालतों को वैधानिक दर्जा मिला है।
लोक अदालत का फैसला सिविल कोर्ट की डिक्री के समान माना जाता है और सभी पक्षों पर बाध्यकारी होता है। इसके खिलाफ सामान्य तौर पर अपील का प्रावधान नहीं है। लोक अदालत मुकदमे के गुण-दोष के आधार पर फैसला नहीं करती और न ही किसी पक्ष को दोषी ठहराती है।
इसका काम दोनों पक्षों के बीच राजीनामा या समझौता कराना है। यदि आपसी सहमति नहीं बनती है, तो मामला संबंधित कोर्ट में वापस भेज दिया जाता है, जहां उसकी नियमित सुनवाई होती है।

