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BJP ने तीन बड़े नेताओं को थमाया कारण बताओ नोटिस:संगरूर प्रेस कॉन्फ्रेंस पर मचा बवाल, संगठन महामंत्री श्रीनिवासुलु के खिलाफ की थी बयानबाजी




भारतीय जनता पार्टी पंजाब की अनुशासन समिति ने पार्टी लाइन और अनुशासन के खिलाफ जाकर बयानबाजी करने पर अपने तीन वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। 25 अगस्त को संगरूर में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पार्टी विरोधी टिप्पणी करने का आरोप लगाते हुए तीनों नेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। बता दें, संगरूर के पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष रणदीप सिंह देओल, पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष मनिंदर सिंह कपियाल और पूर्व राज्य सेल समन्वयक जतिंदर कालरा के गुट ने राज्य इकाई में हाल ही में हुए संगठनात्मक परिवर्तनों को लेकर पार्टी उच्च कमान के समक्ष अपनी चिंताओं को व्यक्त करने के लिए 29 अगस्त को ‘पंजाब भाजपा बचाओ यात्रा’ की घोषणा की थी। जिसके चलते भाजपा पंजाब अनुशासन समिति ने इन नेताओं पर कार्रवाई करते हुए जवाब मांगा है। यह कारण बताओ नोटिस भाजपा पंजाब अनुशासन समिति के अध्यक्ष सोम प्रकाश द्वारा जारी किए गए हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए इन नोटिस की प्रतियां पार्टी के भाजपा पंजाब प्रभारी सतीश पूनिया, सह-प्रभारी डॉ. नरेंद्र सिंह रैना, प्रदेश अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों और संगठन महामंत्री मंथरी श्रीनिवासुलु को भी भेजी गई हैं। समिति ने सख्त लहजे में चेतावनी दी है कि यदि निर्धारित 7 दिनों की अवधि के भीतर जवाब दाखिल नहीं किया जाता है, तो भारतीय जनता पार्टी के संविधान और नियमों के तहत बिना किसी अग्रिम सूचना के उचित अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। प्रेस कॉन्फ्रेंस और बयानों पर खड़ा हुआ विवाद नोटिस में स्पष्ट किया गया है कि तीनों नेताओं ने 25 अगस्त को संगरूर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया था और उसमें भाग लिया। इस दौरान उन्होंने पार्टी के आंतरिक मामलों और संगठनात्मक विषयों पर ऐसी बयानबाजी की, जो भाजपा की स्थापित नीतियों और स्टैंड के पूरी तरह विपरीत थी। अनुशासन समिति का मानना है कि इन नेताओं के इस आचरण से प्रथम दृष्टया पार्टी की प्रतिष्ठा, साख और संगठनात्मक छवि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। 7 दिन में मांगा लिखित जवाब, नहीं तो होगी एकतरफा कार्रवाई अनुशासन समिति ने तीनों नेताओं को नोटिस मिलने के 7 दिनों के भीतर अपना लिखित स्पष्टीकरण दाखिल करने का निर्देश दिया है। उनसे पूछा गया है कि पार्टी अनुशासन का उल्लंघन करने और संगठन की छवि को नुकसान पहुंचाने के आरोप में उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों न की जाए?



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