‘मैं नीचे गिर गया था। जिंदगी के लिए लड़ रहा था। एक पल मुझे लगा कि अगर मैंने अभी कुछ नहीं किया, तो सब खत्म हो जाएगा। मुझे महसूस हो रहा था कि प्लेन नीचे जा रहा है। मुझे पता था कि यही आखिरी मौका है। दरवाजा वहीं था और मैंने हनुमान चालीसा पढ़ते हुए उसे खो
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ये बात फ्लाईदुबई फ्लाइट के कैप्टन स्मित मच्छर ने पीएम मोदी से कही। उन हालात में कॉकपिट का दरवाजा खोलने की वजह से दुनिया भर के एविएशन सिक्योरिटी एक्सपर्ट और ट्रम्प, नेतन्याहू जैसे लीडर स्मित को ‘हीरो’ बता रहे हैं।
कैप्टन स्मित का दरवाजा खोलना ही सबसे टर्निंग पॉइंट क्यों था और कॉकपिट डोर की मजबूती ही मुश्किलें कैसे खड़ी कर रही है; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में…
सवाल-1: क्रैश टालने के लिए कॉकपिट का डोर खोलना ही सबसे अहम काम क्यों?
जवाब: प्लेन तेजी से नीचे जा रहा था। स्मित लहूलुहान होकर नीचे गिर चुके थे। वो जानते थे कि डोर खोले बिना हमलावर पायलट को कंट्रोल करना मुमकिन नहीं होगा।
पैसेंजर्स ने बाद में बताया कि जब उन्हें कॉकपिट से चीखने-चिल्लाने की आवाजें आईं, तो कुछ लोग कॉकपिट की तरफ बढ़े, उसका दरवाजा खोलने की कोशिश भी की, लेकिन नाकाम रहे।
दरअसल, प्लेन के कॉकपिट का दरवाजा जबरन तोड़ना या बिना पायलट की मर्जी के उसे खोलकर अंदर घुसना लगभग नामुमकिन होता है…
दरवाजे की अंदरूनी परत स्टील से 5 गुना मजबूत
- कॉकपिट के दरवाजे की मुख्य परत मजबूत हाई-स्ट्रेंथ फाइबर और एलॉय वगैरह से बनी होती है। मसलन, इसमें इस्तेमाल होने वाला ‘केवलर’ नाम का फाइबर मटेरियल स्टील से करीब 5 गुना ज्यादा मजबूत है। इस परत की मोटाई 1 से 2 इंच तक होती है। कुछ विमानों में इसके ऊपर स्टील या टाइटेनियम की कोटिंग भी की जाती है।
- किसी तरह के धक्के, प्रेशर या औजारों के खिलाफ दरवाजे की मजबूती की टेस्टिंग की जाती है। ये पूरी तरह बुलेट प्रूफ तो नहीं होते, लेकिन इन्हें बुलेट और हैंड ग्रेनेड के हमले को झेलने लायक बनाया जाता है।
बिना पायलट की मर्जी डोर लॉक खोलना बेहद मुश्किल
- कॉकपिट डोर के लॉकिंग सिस्टम इलेक्ट्रॉनिक होते हैं। हालांकि सभी विमानों में ये लॉकिंग सिस्टम एक जैसा नहीं होता, ताकि आतंकियों को पता न चले कि डोर कैसे खुलते हैं।
- ये बोइंग 737 प्लेन था। इसमें फ्लाइट के दौरान लॉकिंग सिस्टम ऑटो मोड पर रहता है, यानी दरवाजा लॉक रहता है।
- केबिन क्रू को अगर पायलट्स को पानी वगैरह देने या किसी और काम के लिए अंदर जाना पड़े, तो पायलट से परमिशन लेनी पड़ती है। पायलट अंदर से लॉक स्विच को अनलॉक मोड पर शिफ्ट करके होल्ड करते हैं और डोर खुल जाता है।
- हालांकि बाहर से डोर खोलने के लिए एक इमरजेंसी कीपैड भी होता है, जिसमें सही कोड डालने के बाद एक टाइमर शुरू होता है और कॉकपिट में बजर की आवाज जाती है। पायलट पीप होल या कैमरे के जरिए बाहर देखते हैं और अगर चाहें तो डोर अंदर से अनलॉक कर सकते हैं या मना कर सकते हैं।
- अगर पायलट कोई जवाब न दें, तो कुछ देर बाद दरवाजा खुद ही खुल जाता है। ये व्यवस्था तब के लिए होती है, जब दोनों पायलट किसी वजह से बेहोश हो जाएं या जवाब दे पाने की स्थिति में न हों।
- अगर अंदर बैठा कोई पायलट किसी को अंदर घुसने नहीं देना चाहे, तो इस इमरजेंसी सिस्टम से डोर नहीं खोला जा सकता।
इसके अलावा जब पायलट टॉयलेट जाते हैं, तो डोर खुलता है और कॉकपिट थोड़े समय के लिए असुरक्षित हो जाता है। इसलिए इस दौरान कॉकपिट डोर और गैलरी एरिया के बीच मेटल रॉड या मोटी केबल वगैरह से एक सेकेंडरी बैरियर लगाया जाता है।

सवाल-2: कैप्टन स्मित ने बेहोश होने से पहले कॉकपिट का डोर कैसे खोला?
जवाब: फ्लाइट नंबर FZ1073 के कॉकपिट डोर का लॉक कैसा था, स्मित ने उसे कैसे खोला, इसकी कोई जानकारी नहीं आई है। हालांकि घटनाक्रम से लगता है कि स्मित फर्श पर गिरने के बाद ही डोर खोलने में कामयाब हुए…
- विमान ने 30 सितंबर को सुबह 7:05 बजे दुबई से तेल अवीव के लिए उड़ान भरी थी। अगले करीब ढाई घंटे तक सब कुछ ठीक था। प्लेन 35 हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ रहा था।
- 9:21 बजे प्लेन अचानक नीचे गोता खाने लगा। ये इस समय सऊदी के एयरस्पेस में था। अंदर बैठे यात्रियों को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर हुआ क्या है।
- इसके बाद प्लेन एक बार अचानक ऊपर उठा, लेकिन फिर से गोता खाकर करीब 14 हजार फीट तक नीचे गिर गया। इससे ऐसा लगता है कि स्मित ने को-पायलट से संघर्ष के दौरान एक बार प्लेन के कंट्रोल स्टिक्स पीछे खींचे, इससे प्लेन ऊपर उठा, लेकिन हमलावर पायलट ने दोबारा कंट्रोल स्टिक्स आगे दबा दिए।
- स्मित के बयान के मुताबिक, नीचे गिरने के बाद उन्होंने दोबारा हिम्मत जुटाई और डोर का लॉक स्विच दबा दिया। उन्होंने पीएम मोदी से कहा, ‘मैं 17 साल से विमान उड़ा रहा हूं। मुझे आंखें बंद करके भी पता चल जाता है कि विमान में क्या हो रहा है। जब मैं गिरा हुआ था, तब मुझे महसूस हो रहा था कि विमान नीचे जा रहा है।’
- डोर खुलने के बाद इजराइली प्लंबर यानिव हायून सबसे पहले कॉकपिट में पहुंचे थे। यानिव के मुताबिक, उन्होंने बाहर से कॉकपिट खोलने की कोशिश की थी, लेकिन नाकाम रहे।
- यानिव के मुताबिक, ‘जब वो अंदर पहुंचे, तो पायलट्स की दोनों सीटें खाली थीं। स्मित फर्श पर लहूलुहान पड़े थे और को-पायलट दोनों सीटों के बीच कंट्रोल पैनल पर चढ़कर उसे डैमेज करने की कोशिश कर रहा था।’ यानिव ने इसे गर्दन से पकड़कर कॉकपिट से बाहर निकाला।
नेतन्याहू के प्रवक्ता डोरोन स्पीलमैन ने कहा कि कैप्टन स्मित ने डोर खोलने में अपनी आखिरी ताकत लगाई।
मुंबई के घाटकोपर में स्मित के परिवार के पड़ोसी डॉक्टर जिनित शाह कहते हैं, ‘स्मित इमरजेंसी में तेज और सही फैसले लेते हैं। वो पायलटों को ट्रेनिंग देते रहे हैं। उनकी अपनी अकादमी है।’

एक यात्री ने उस समय का यह वीडियो रिकॉर्ड किया है। इसमें लग रहा है कि प्लेन भयंकर टर्बुलेंस के चलते अपना बैलेंस खो चुका है।
सवाल-3: आखिर कॉकपिट के दरवाजे इतने मजबूत क्यों बनाए जाते हैं?
जवाब: 2001 से पहले तक कॉकपिट डोर हल्के घरेलू इंटीरियर दरवाजों की तरह थे। इनका मकसद सिर्फ पायलटों की प्राइवेसी का ध्यान रखना था, ताकि प्लेन उड़ाते समय उनके काम में खलल न पड़े। ये दरवाजे जबरन घुसपैठ या किसी हथियार का हमला नहीं रोक सकते थे।
फिर आई 11 सितंबर 2001 की तारीख। अलकायदा के 19 आतंकियों ने 4 अमेरिकी विमान हाईजैक किए। चारों प्लेन बोइंग के थे। आतंकियों ने आसानी से कॉकपिट का दरवाजा तोड़ा और अंदर घुसकर पायलटों को गनपॉइंट पर ले लिया।
इसके बाद दो प्लेन को न्यूयॉर्क के ट्विन टावर और एक को पेंटागन से टकराकर क्रैश कर दिया गया। एक अन्य विमान मैदानी इलाके क्रैश हुआ था। कुल 2900 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। ये दुनिया का सबसे बड़ा आतंकी हमला माना जाता है।

वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के दूसरे टावर पर क्रैश होता प्लेन। अमेरिका ने हमले के मास्टरमाइंड ओसामा बिन लादेन को 2011 में पाकिस्तान में मार गिराया था।
इसी से सबक लेकर अमेरिकी फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन, FAA ने विमानों की सिक्योरिटी बढ़ाने के निर्देश दिए। इंटरनेशनल सिविल एविएशन ऑर्गेनाइजेशन, यानी ICAO ने भी बुलेट-रेसिस्टेंट कॉकपिट डोर और स्टाफ की जांच करने के लिए नई गाइडलाइंस तय कीं।
सबसे बड़ा बदलाव कॉकपिट की मजबूती और लॉकिंग सिस्टम को लेकर था। 2003 से बोइंग और एयरबस जैसी कंपनियों ने मजबूत डोर बनाने शुरू कर दिए थे।
हालांकि कॉकपिट डोर की यही मजबूती बाद में कुछ भयंकर प्लेन हादसों की वजह बनी।
सवाल-4: कॉकपिट के मजबूत दरवाजों के साथ क्या कोई दिक्कत भी है?
जवाब: इन दरवाजों की वजह से 2 बड़े हादसे हुए हैं….
1. 2013: दरवाजा लॉक करके कैप्टन ने प्लेन क्रैश किया
- 29 नवंबर को मोजांबिक एयरलाइंस की फ्लाइट के को-पायलट ग्रेसियो चिमकिल उठकर टॉयलेट गए। तभी कॉकपिट में मौजूद कैप्टन सैंटोस फर्नांडीज ने डोर अंदर से लॉक कर लिया।
- उसने तीन बार में प्लेन की ऊंचाई 38 हजार फीट से घटाकर 592 फीट कर दी और आखिर प्लेन को नामीबिया में क्रैश करवा दिया। सभी 33 यात्री मारे गए थे।
- CVR में को-पायलट ग्रेसियो के चिल्लाने और दरवाजा पीटने की आवाजें दर्ज हुई थीं।
2. 2015: को-पायलट ने भीतर से लॉक कर प्लेन क्रैश किया
- 24 मार्च 2015 को बार्सिलोना से डसेलडोर्फ जा रही जर्मनविंग की फ्लाइट 9525 के कैप्टन वाशरूम गए। को-पायलट एंड्रियास लुबित्ज ने अंदर से दरवाजा लॉक कर लिया।
- कैप्टन बाहर से दरवाजा पीटते रहे, लॉक खोलने की गुहार लगाते रहे। ATC ने भी लुबित्ज से संपर्क साधा, लेकिन लुबित्ज नहीं माना।
- लुबित्ज ने प्लेन को आल्प्स की पहाड़ियों से टकराकर क्रैश कर दिया। प्लेन में सवार सभी 150 लोग मारे गए।
इसके अलावा मार्च 2022 में चाइना ईस्टर्न की फ्लाइट हादसे का शिकार हुई। सभी 132 लोग मारे गए। चीन ने हादसे की वजह की फाइनल रिपोर्ट नहीं जारी की थी, लेकिन फ्लाइट डेटा के मुताबिक, दोनों इंजन के फ्यूल स्विच मैन्युअली बंद किए गए थे। दोनों पायलट्स में संघर्ष भी हुआ था।
सवाल-5: क्या कॉकपिट का डोर बाहर से खुलने की व्यवस्था होनी चाहिए?
जवाब: जानकारों का मानना है कि कॉकपिट डोर की मजबूती और डिजाइन पर नए सिरे से सोचने की जरूरत है…
- इंटरनेशनल एविएशन सिक्योरिटी एक्सपर्ट फिलिप बॉम भी कहते हैं, ‘एवेशन इंडस्ट्री में हमने 9/11 के बाद से आतंकी हमलों के बजाय एयरक्राफ्ट में सुसाइड के केसेज के चलते ज्यादा जानें गंवाई हैं। ज्यादातर मामलों में ऐसा हुआ, क्योंकि हमने एक ऐसा किला बना लिया, जिसे डेक के बाहर मौजूद वो अच्छे लोग नहीं तोड़ पाए, जो अंदर बागी हो चुके पायलट से निपट सकते थे।’
- प्रैक्टिकल एविएशन सिक्योरिटी’ किताब लिखने वाले प्रोफेसर जेफ प्राइस कहते हैं, ‘ये भरोसे और जोखिम का मुद्दा है। क्रू मेंबर और पायलट्स के पास प्लेन की पूरी एक्सेस होती है। अगर वे प्लेन को नुकसान पहुंचाना चाहें, तो ऐसा कर सकते हैं। मजबूत डोर लगाकर हमने बाहरी लोगों को फ्लाइट कंट्रोल तक पहुंचने से रोक लिया, लेकिन जब दिक्कत अंदर से हो, तो ये कारगर नहीं है।’
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30 सितंबर 2026, सुबह 9 बजकर 21 मिनट। सऊदी अरब के आसमान में अचानक एक प्लेन मुंह के बल नीचे गिरने लगा। कुछ मिनट के भीतर 34 हजार फीट की ऊंचाई से 17 हजार फीट पर आ गया। रफ्तार भी 760 से बढ़कर 1110 किमी/घंटा हो गई। विमान में बैठे यात्री आखिरी प्रार्थना करने लगे। पूरी खबर पढ़िए…
