10 अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी के प्रोटेस्ट पर पुलिस एक्शन जारी है। अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को फ्लाइट से उठा लिया गया। अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी और पिनाराई विजयन जैसे पूर्व सीएम भी हिरासत में लिए गए हैं। अन्य प्रदर्शनकारी भी पकड़े
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पुलिस का कहना है कि इस प्रोटेस्ट को परमिशन नहीं दी है और दिल्ली में BNS की धारा 163 लागू है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट सभी नागरिकों का हक है।
क्या प्रोटेस्ट मौलिक अधिकार है, अगर हां तो फिर पुलिस की अनुमति क्यों जरूरी, हिरासत और गिरफ्तारी में फर्क क्या है; ऐसे 8 जरूरी सवालों के जवाब जानेंगे भास्कर एक्सप्लेनर में…
सवाल-1: क्या प्रोटेस्ट मौलिक अधिकार है?
जवाबः हां, संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) में बोलने और अपनी बात कहने की आजादी है। अनुच्छेद 19(1)(b) में बिना हथियार, शांतिपूर्वक इकट्ठा होने का अधिकार है।
हालांकि यह अधिकार असीमित नहीं है। अनुच्छेद 19(3) कहता है कि सरकार ‘लोक व्यवस्था’ के लिए इस पर उचित पाबंदियां लगा सकती है।
सवाल-2: क्या प्रोटेस्ट के लिए पुलिस परमिशन जरूरी है?
जवाबः हां, 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) बनाम भारत सरकार केस में यह साफ किया था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करके अपनी शिकायतें सही जगह तक पहुंचाना नागरिकों का मौलिक अधिकार है। पुलिस कमिश्नर या उनके अधिकृत अफसर से पहले अनुमति लेने की व्यवस्था बनाई जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट भरत चुग के मुताबिक, परमिशन का मकसद सुरक्षा इंतजाम करना है, प्रदर्शन खत्म करना नहीं। अपने हर निर्णय के पक्ष में सरकार या पुलिस को कानून सम्मत तर्क देना जरूरी है।

CJP प्रोटेस्ट के बुलावे पर आ रहे लोगों को सुबह से ही दिल्ली पुलिस हिरासत में ले रही है।
सवाल-3: प्रोटेस्ट के लिए दिल्ली पुलिस के नियम क्या हैं?
जवाबः दिल्ली पुलिस के स्टैंडिंग ऑर्डर के मुताबिक…
- आवेदन आमतौर पर DCP को कम से कम 10 दिन पहले देना होता है।
- देर से आए आवेदन पर भी विचार हो सकता है। यह जगह की उपलब्धता और इंतजाम के लिए पर्याप्त समय पर निर्भर है। यानी 10 दिन का नियम अपने आप में पूरी तरह से रोक नहीं है।
- आवेदनों पर ‘पहले आओ, पहले पाओ’ के आधार पर फैसला होता है। इससे पहले स्पेशल ब्रांच, ट्रैफिक पुलिस और नई दिल्ली जिला पुलिस की राय ली जाती है।
- DCP यह देखता है कि प्रदर्शन से ट्रैफिक रुकेगा या नहीं, लोगों की सुरक्षा और शांति को खतरा होगा या नहीं।
- जंतर-मंतर पर अधिकतम 1,000 लोगों की इजाजत है। इससे ज्यादा लोग हों तो रामलीला मैदान का विकल्प है, जिसकी क्षमता 50,000 तक बताई गई है।
इस मामले में पुलिस का तर्क है कि CJP ने 7 अक्टूबर को आवेदन किया, यानी प्रदर्शन से सिर्फ 3 दिन पहले। इसलिए उन्हें परमिशन नहीं दी जा सकती।

दिल्ली पुलिस की जॉइन्ट कमिश्नर नूपुर प्रसाद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बताया कि CJP को 10 अक्टूबर को प्रदर्शन करने की इजाजत नहीं दी गई है।
सवाल-4: परमिशन न मिलने पर क्या रास्ता है?
जवाबः 2 रास्ते हैं…
- पहला रास्ता पुलिस के पास दोबारा जाना है। आयोजक इनकार के कारणों का जवाब दे सकते हैं और छोटी भीड़, कम समय या दूसरी जगह का प्रस्ताव रख सकते हैं।
- दूसरा रास्ता अदालत है। स्टैंडिंग ऑर्डर में DCP का फैसला ‘अंतिम और बाध्यकारी’ बताया गया है और इसके खिलाफ अलग से अपील का प्रावधान नहीं है। लेकिन अगर आयोजकों को लगता है कि इनकार मनमाना है या शांतिपूर्ण सभा के अधिकार के खिलाफ है, तो वे अनुच्छेद 226 के तहत दिल्ली हाईकोर्ट जा सकते हैं।
सवाल-5: धारा 163 क्या है और क्या इसे चुनौती दी जा सकती है?
जवाबः पुलिस के पास प्रदर्शन को रोकने का एक और हथियार है, निषेधाज्ञा। पहले इसे CrPC की धारा 144 कहते थे। अब यह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 है।
इसमें मजिस्ट्रेट लिखित आदेश देकर किसी इलाके में 5 या उससे ज्यादा लोगों के जमा होने पर रोक लगा सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली पुलिस ने 2 अक्टूबर को पूरी नई दिल्ली में धारा 163 लगाई थी।
इसके खिलाफ भी रास्ता है। धारा 163(5) के तहत प्रभावित व्यक्ति आदेश जारी करने वाले मजिस्ट्रेट से उसे रद्द करने या बदलने की अर्जी दे सकता है। मजिस्ट्रेट को सुनवाई का जल्दी मौका देना होता है और अर्जी खारिज करे तो कारण लिखित में बताने होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता के मुताबिक, ‘धारा-163 को चुनौती देने के बाद यदि उसे रद्द करने का आदेश नहीं मिलता तो 5 से ज्यादा लोगों का जुटना या प्रदर्शन करना गैर-कानूनी है। हालांकि विरोध प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार, इंटरनेट बंदी और सार्वजनिक यातायात को बंद करने से आम लोगों के मौलिक अधिकारों के हनन जैसे ग्राउंड्स पर भी धारा-163 को हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।’
सुप्रीम कोर्ट कई बार कह चुका है कि ऐसे आदेश मनमाने ढंग से नहीं दिए जा सकते। 2012 के रामलीला मैदान मामले में कोर्ट ने कहा कि निवारक कदम असली और गंभीर खतरे पर आधारित होने चाहिए और बहुत सावधानी से लिए जाने चाहिए। 1961 के बाबूलाल पाराटे केस में संविधान पीठ ने कहा था कि प्रभावित लोगों को मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती देने का हक है।

दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर, कनॉट प्लेस, मंडी हाउस समेत सेंट्रल दिल्ली के अहम इलाकों में धारा 163 लागू की है।
सवाल-6: परमिशन के बिना प्रदर्शन किया तो क्या हो सकता है?
जवाबः भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 223 के तहत आदेश की जानबूझकर अवहेलना करने का केस बन सकता है। यह पुरानी IPC की धारा 188 का नया रूप है। सजा में जेल या जुर्माना हो सकता है। पुलिस हिरासत में लेकर बिना किसी कानूनी कार्रवाई के भी कहीं दूर ले जाकर छोड़ सकती है।
इसके अलावा पुलिस वीडियो रिकॉर्डिंग कर सकती है। स्टैंडिंग ऑर्डर के मुताबिक नियम तोड़ने का रिकॉर्ड रखा जाता है और भविष्य की परमिशन के फैसलों में इसे देखा जा सकता है।
सवाल-7: हिरासत और गिरफ्तारी में क्या फर्क है?
जवाबः गिरफ्तारी औपचारिक कार्रवाई है। इसमें पुलिस किसी व्यक्ति को किसी अपराध के सिलसिले में अपनी कस्टडी में लेती है और आपराधिक प्रक्रिया शुरू हो जाती है। इसके साथ ही संवैधानिक और कानूनी सुरक्षाएं तुरंत लागू हो जाती हैं।
हिरासत शब्द की BNSS में कोई सीधी परिभाषा नहीं है। कानून पुलिस को ऐसी शक्तियां देता है, जिनसे वह लोगों को रोक सकती है, हटा सकती है या कुछ समय के लिए अपने पास रख सकती है।
प्रदर्शनों में अक्सर यही होता है। लोग कुछ घंटे पुलिस के पास रहते हैं, कोई केस दर्ज नहीं होता और शाम तक छोड़ दिए जाते हैं। उन्हें यह गिरफ्तारी जैसा लगता है, पर पुलिस कहती है कि यह निवारक कार्रवाई थी।
पुलिस यह फर्क इसलिए करती है ताकि औपचारिक गिरफ्तारी पर होने वाली अदालती जांच से बच सके। सीनियर एडवोकेट संजय हेगड़े के मुताबिक हिरासत में लोगों को जाने की इजाजत नहीं होती, पर वे औपचारिक रूप से गिरफ्तार भी नहीं होते।
इसमें दो धाराएं इस्तेमाल होती हैं-
- धारा 170 (BNSS): अगर पुलिस को लगे कि कोई संज्ञेय अपराध करने की योजना है और उसे किसी और तरह नहीं रोका जा सकता, तो वह मजिस्ट्रेट के आदेश और वारंट के बिना भी उस व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकती है। संज्ञेय अपराध वह है, जिसमें पुलिस बिना वारंट गिरफ्तारी कर सकती है।
- धारा 172 (BNSS): पुलिस किसी वैध निर्देश को न मानने वाले व्यक्ति को हिरासत में ले सकती है या हटा सकती है। फिर उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होता है या छोटे मामलों में 24 घंटे के भीतर छोड़ना होता है।
आमतौर पर प्रदर्शनकारियों को बसों में भरकर नरेला या किंग्सवे कैंप ले जाना किसी कानूनी प्रावधान के तहत नहीं होता।

CJP के फाउंडर अभिजीत दीपके को फ्लाइट से ही हिरासत में ले लिया गया।
सवाल-8: हिरासत या गिरफ्तारी में आपके अधिकार क्या हैं?
जवाबः 5 बातें जाननी चाहिए…
- 24 घंटे का नियम: अनुच्छेद 22 के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना जरूरी है।
- गिरफ्तारी का कारण जानने का हक: सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में कहा है कि गिरफ्तारी के आधार लिखित में देने होंगे। रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ने पिछले महीने कहा कि अनुच्छेद 22 के सुरक्षा उपायों का उल्लंघन करने वाली गिरफ्तारी असंवैधानिक होगी।
- वकील का अधिकार: अपनी पसंद के वकील से मिलने और उसकी मदद लेने का हक है। वकील का खर्च न उठा सकें, तो मुफ्त कानूनी सहायता मिलती है। BNSS की धारा 38 में पूछताछ के दौरान वकील से मिलने की बात है, लेकिन पूरी पूछताछ के दौरान साथ रहने की नहीं।
- महिलाओं के लिए खास प्रावधान: BNSS की धारा 43(5) के मुताबिक महिला को सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। अपवाद में इसके लिए न्यायिक मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति चाहिए।
- डीके बसु गाइडलाइंस (1997): ये गिरफ्तारी या हिरासत दोनों पर लागू हैं। पुलिसकर्मी का नेम टैग साफ दिखना चाहिए। एक गवाह की मौजूदगी में अरेस्ट मेमो बनना चाहिए। चोटें दर्ज होनी चाहिए और परिवार को सूचना दी जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा था कि ये सिर्फ सुझाव नहीं हैं। पालन न करने पर विभागीय कार्रवाई या अवमानना का मामला भी बन सकता है।
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