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- Column By Pt. Vijay Shankar Mehta – Seek Freshness, Awareness, Alertness, And Surrender In Devotion.
2 घंटे पहले
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पं. विजयशंकर मेहता
भक्तों की दुनिया में यह चर्चा बहुत होती है कि क्या भगवान से मांगा जाए? एक वर्ग कहता है भगवान सब जानता है तो क्यों मांगा जाए? कुछ लोग कहते हैं कि भगवान परमपिता है, अपने माता-पिता से मांगने में क्या दिक्कत है?
तुलसीदास जी ने बताया कि काकभुशुंडि जी ने गरुड़ जी को कहा- मन भावत बर मागऊँ स्वामी, तुम्ह उदार उर अंतरजामी। हे स्वामी, मैं अपना मन भाया वर मांगता हूं। आप उदार हैं और हृदय के भीतर की जानने वाले हैं। अब इसी चौपाई में एक वक्तव्य दूसरे को खंडित कर रहा है। आधे में है कि मैं मांग रहा हूं और दूसरे में है कि आप सब हृदय के भीतर की जानने वाले हैं।
इसमें महत्वपूर्ण बात यह है कि भगवान भक्त के हृदय की बात जानते हैं। तो ईश्वर से जब भी मांगें, भौतिक वस्तु न मांग कर कहें कि हमें भक्ति में ताजगी, जागरूकता, चौकन्नापन और समर्पण प्रदान करिए। बाकी वस्तुएं तो हम कमा लेंगे और गंवा देंगे। पर यदि देना चाहें तो इतनी बातें दे दीजिए। दुर्गुणों से बचने के लिए हिरण की तरह हमें चौकन्ना बना दीजिए।

