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लुधियाना नगर निगम में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ आरटीआई एक्टिविस्ट रोहित सभ्रवाल ने लोकल बॉडीज डिपार्टमेंट के चीफ विजिलेंस अफसर(CVO) को सात साल में 34 शिकायतें भेजी लेकिन सीवीओ ने उनकी एक भी शिकायत पर कार्रवाई करना तो दूर जांच तक पूरी नहीं की। रोहित सभ्रवाल का कहना है कि लोकल बॉडीज डिपार्टमेंट के सीवीओ का साफ सा फंडा है शिकायत की न तो जांच करेंगे और न ही उस पर कोई एक्शन लेंगे। उनका तर्क है कि नगर निगम में फैले भ्रष्टाचार के सबूत समेत शिकायतें 2020 से लगातार सीवीओ को कर रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि सीवीओ न एक भी शिकायत की जांच पूरी नहीं की। रोहित सभ्रवाल का कहना है कि सीवीओ दफ्तर ने कभी उनकी शिकायत का स्टेटस तक उन्हें नहीं बताया। आखिर में उन्होंने आरटीआई के जरिए शिकायतों का स्टेटस पूछा तो पता चला कि शकायतों की अभी जांच चल रही है। रोहित सभ्रवाल ने सीवीओ के खिलाफ अब सेक्रेटरी लोकल बॉडीज को शिकायत दी है और इस मामले की जांच करने की मांग की है। उनका कहना है कि मामले की जांच करके जिम्मेदार अफसरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। सेक्रेटरी को भेजी शिकायत में CVO के खिलाफ लिखीं 7 अहम बातें 1. 34 शिकायतों पर कोई फैसला नहीं: रोहित सभ्रवाल ने अपनी शिकायत में कहा है कि उन्होंने नगर निगम में व्याप्त भ्रष्टाचार, अवैध निर्माणों और प्रशासनिक अनियमितताओं के खिलाफ कुल 34 शिकायतें दर्ज कराई गई थीं। उच्च अधिकारियों ने इन सभी मामलों को जांच के लिए CVO कार्यालय भेजा था। पिछले 3 से 7 सालों के लंबे समय के बाद भी एक भी शिकायत पर अंतिम फैसला नहीं लिया गया है। शिकायतों का निपटारा न होना यह साबित करता है कि CVO कार्यालय भ्रष्टाचारियों पर लगाम कसने के अपने मूल उद्देश्य में पूरी तरह विफल रहा है। 2. ‘जांच जारी है’ बताकर लटकाई शिकायतें: रोहित सभ्रवाल का कहना है कि CVO कार्यालय का सिस्टम बन चुका है कि वे फाइलों पर केवल “मामला जांच के अधीन है ” लिखकर उन्हें सालों तक दबाए रखते हैं। किसी केस के जटिल होने का मतलब यह कतई नहीं है कि उसे हमेशा के लिए अटका दिया जाए। अधिकारियों की जिम्मेदारी बनती है कि वे पेंडिंग केसों की रूटीन में समीक्षा करें, देरी के कारण दर्ज करें और जांच पूरी करने के लिए एक निश्चित समय-सीमा निर्धारित करें। 3. केवल कागजों तक सीमित रह गई जवाबदेही: रोहित सभ्रवाल का कहना है कि लोकल बॉडीज डिपार्टमेंट में पारदर्शियता और जवाबदेही तय करने के लिए सीवीओ बनाया गया। लेकिन जब शिकायतों पर सालों-साल कोई फैसला नहीं होता, तो जनता का इस सरकारी व्यवस्था से भरोसा उठने लगता है। उनका कहना है कि कानून के अनुसार शिकायतकर्ता को यह अधिकार है कि उसकी शिकायत पर या तो निष्पक्ष जांच कर ठोस कार्रवाई हो, या फिर कारण बताकर केस बंद किया जाए। फाइलों को बीच में अटकाकर रखना शिकायतकर्ताओं को उनके कानूनी अधिकारों से वंचित करना है। 4. CVO दफ्तर की जांच हो: प्रिंसिपल सेक्रेटरी को भेजी शिकायत में रोहित सभ्रवाल का कहना है कि सीवीओ दफ्तर की जांच हो और जवाब तलबी की जाए कि आखिर शिकायतों की जांच पूरी क्यों नहीं हुई और इस बारे में शिकायतकर्ता को जानकारी क्यों नहीं दी गई। इस तरह शिकायतकर्ता ने अपनी शिकायत में 10 सवाल किए हैं और उनसे सवालों के जवाब मांगे हैं। उन्होंने कहा कि सीवीओ दफतर की जांच गहनता से की जाए। 5. लेट-लतीफी से खत्म हो रहे सबूत और मुकर रहे गवाह: रोहित सभ्रवाल का कहना है कि विजिलेंस जांच में सालों की देरी केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं है, बल्कि यह भ्रष्टाचारियों को बचाने का एक अप्रत्यक्ष माध्यम बन चुकी है। उनका कहना है कि लंबा समय बीतने के साथ सरकारी विभागों से रिकॉर्ड और दस्तावेज गायब हो जाते हैं, गवाह अनुपलब्ध हो जाते हैं या समय के साथ उनकी याददाश्त धुंधली होने से वे बयानों से मुकर जाते हैं। इस सुस्त रवैये का सीधा फायदा दोषियों को मिलता है। 6. CVO दफ्तर का 10 सालों का रिकॉर्ड तलब हो: शिकायत में आरोप लगाया गया है कि CVO दफ्तर शिकायतों का निपटारा करने के बजाय उन्हें दबाकर खुद संदिग्ध भूमिका निभा रहा है। इससे इस दफ्तर के वजूद पर ही सवाल खड़े हो गए हैं। सरकार से मांग की गई है कि CVO कार्यालय के पिछले 10 वर्षों का वर्षवार पेंडिंग रिकॉर्ड मंगाया जाए और सीवीओ दफ्तर के ही संदिग्ध कामकाज के खिलाफ उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच बैठाई जाए। 7. राज्यपाल से लेकर मुख्यमंत्री तक पहुंची शिकायत: पत्र के अंत में प्रशासन से 4 स्पष्ट मांगें की गई हैं। उनका कहना है कि सीवीओ दफ्तर के कामकाज की जांच हो, 10 साल का पेंडिंग रिकॉर्ड तलब किया जाए, देरी के लिए जिम्मेदार अफसरों पर केस व अनुशासनात्मक कार्रवाई हो और 34 शिकायतों का तय समय-सीमा में निपटारा किया जाए। इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए शिकायत पत्र की प्रतियां राज्यपाल (पंजाब), मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और निदेशक (स्थानीय निकाय) को भी सौंपी है।
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CVO लोकल बॉडीज का फंडा- NO-जांच, NO-एक्शन:आरटीआई एक्टिविस्ट ने 7 साल में 34 शिकायतें की, एक की भी जांच पूरी नहीं; प्रिंसिपल सेक्रेटरी को भेजी कंप्लेंट
