39 मिनट पहले
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आज आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी का व्रत है। इसी के साथ चातुर्मास शुरू होगा। धार्मिक परंपरा में इन चार महीने के काल को भगवान विष्णु की योगनिद्रा का समय माना गया है, इसलिए इसे देवशयनी एकादशी कहते हैं।
एक रूप राजा बलि के यहां और दूसरा क्षीरसागर में रहता है पद्म पुराण के उत्तरखंड में देवशयनी एकादशी को शयनी एकादशी कहा गया है। इसमें युधिष्ठिर के सवाल पर भगवान कृष्ण बताते हैं कि आषाढ़ शुक्ल पक्ष की इस एकादशी से भगवान विष्णु का एक रूप राजा बलि के यहां रहता है। दूसरा रूप क्षीरसागर में शेषनाग पर शयन करता है। भगवान विष्णु की यह स्थिति कार्तिक महीने की प्रबोधिनी यानी देवउठनी एकादशी तक रहती है। इसके बाद विवाह और अन्य शुभ काम दोबारा शुरू होते हैं।
भगवान के सोने का मतलब सृष्टि का काम बंद होना नहीं है भगवान विष्णु की योगनिद्रा सामान्य नींद से अलग है। इसका मतलब यह नहीं है कि भगवान सो गए और सृष्टि का काम बंद हो गया। इसका भाव है कि अगले कुछ महीनों में बाहरी उत्सव और बड़े आयोजन कम करके अपने मन, आदतों और दिनचर्या पर ध्यान दिया जाए। इसी कारण चातुर्मास में विवाह और दूसरे मांगलिक काम कम होते हैं, लेकिन जप, तप, दान, व्रत, कथा और पूजा का महत्व बढ़ जाता है।
भगवद्गीता के 18वें अध्याय के पांचवें श्लोक में भगवान कृष्ण कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप के कामों को छोड़ना नहीं चाहिए। इन्हें करते रहना चाहिए, क्योंकि ये मनुष्य को भीतर से साफ करते हैं। चातुर्मास इसी बात को रोजमर्रा के जीवन में अपनाने का समय है।
भगवान कृष्ण ने कमल से पूजा करने को कहा पद्म पुराण में भगवान कृष्ण इस एकादशी पर कमल से भगवान विष्णु की पूजा करने का महत्व बताते हैं। इस दिन शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले विष्णु स्वरूप की पूजा करनी चाहिए। दीपदान और रात में जागरण करने की भी परंपरा है। कमल न मिले, तो कोई साफ और ताजा फूल चढ़ाया जा सकता है। पूजा में दिखावे के बजाय साफ मन, संयम और श्रद्धा ज्यादा जरूरी है।
ऐसे करें देवशयनी एकादशी की पूजा
- सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें। भगवान विष्णु के सामने व्रत और पूजा का संकल्प लें।
- भगवान को जल, फूल, फल और दीप चढ़ाएं। कमल का फूल उपलब्ध हो, तो उसे पूजा में जरूर चढ़ाएं।
- भगवान विष्णु का नाम जप करें और विष्णु कथा सुनें। शाम को दोबारा दीप जलाएं।
- अपनी सेहत और क्षमता के अनुसार निर्जल व्रत, फलाहार या साधारण उपवास भी कर सकते हैं।
व्रत अगले दिन द्वादशी में खोलें एकादशी व्रत अगले दिन द्वादशी तिथि में खोला जाता है। इसे पारण कहते हैं। पारण का समय शहर के अनुसार बदल सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग का समय देखना जरूरी है। व्रत खोलने से पहले भगवान विष्णु की पूजा करें। इसके बाद जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन या अपनी क्षमता के अनुसार दान देकर व्रत पूरा किया जा सकता है।

