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- Dr. Naresh Trehan’s Column – Don’t Wait For Heart Diseases To Manifest.
3 घंटे पहले
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डॉ. नरेश त्रेहन सीएमडी, मेदांता हास्पिटल
पहले यह धारणा आम हुआ करती थी कि हृदय रोग की बीमारी अधेड़ उम्र के बाद ही शुरू होती है। लेकिन अब यह सोच हकीकत से तेजी से दूर होती जा रही है। सच्चाई तो यह है कि कार्डियोवैस्कुलर बीमारियां अकसर उम्र की तीसरी या चौथी दहाई के लोगों को प्रभावित करती हैं, जो अपने निजी और पेशेवर जीवन के सबसे सक्रिय दौर में होते हैं।
मुझे चिंता सिर्फ इस बात की नहीं है कि कितने कम उम्र के मरीज हमारे पास आ रहे हैं, बल्कि इस बात की भी है कि रिस्क फैक्टर्स को कितने लंबे समय तक अनदेखा किया जाता है। हाई ब्लडप्रेशर, डायबिटीज, कोलेस्ट्रॉल का असामान्य स्तर और मोटापा वर्षों तक हृदय रोग का खतरा बढ़ाते रह सकते हैं, लेकिन इनके कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। जब तक किसी कार्डियक समस्या का सामना करना पड़ता है, बचाव का मौका पहले ही हाथ से निकल चुका होता है।
भारतीयों की बदलती जीवनशैली भी इस पूरी तस्वीर का एक अहम हिस्सा है। लंबे समय तक डेस्क पर बैठे रहना, कसरत या शारीरिक गतिविधियों की कमी, अनियमित नींद, प्रोसेस्ड फूड का बढ़ता सेवन और तंबाकू का इस्तेमाल- ये सब मिलकर ऐसे जोखिम पैदा कर रहे हैं, जिन्हें युवा आबादी नजरअंदाज नहीं कर सकती। तनाव भी आधुनिक जीवन की एक हकीकत है, खासकर युवा पेशेवरों के लिए, और स्वास्थ्य के प्रति व्यापक नजरिए में इस पर भी ध्यान देना होगा।
प्रिवेंशन पर आधारित हेल्थकेयर को हमारी स्वास्थ्य-व्यवस्था का नियमित हिस्सा बनाना जरूरी है। युवाओं को अपने रक्तचाप, ब्लड शुगर या कोलेस्ट्रॉल की जांच कराने के लिए लक्षणों का इंतजार नहीं करना चाहिए। जिन लोगों के परिवार में हृदय रोग का इतिहास रहा है, उनकी पहचान तो समय रहते ही कर ली जानी चाहिए और उन्हें उचित सलाह दी जानी चाहिए।
हमें यह सोचने का तरीका भी बदलना होगा कि कार्यस्थलों पर स्वास्थ्य को किस तरह देखा जाता है। जब लंबे समय तक काम करना, लगातार बैठे रहना और पर्याप्त नींद न लेना सामान्य बात बन जाती है, तो देर-सबेर इसका असर हेल्थ पर पड़ता ही है। नियोक्ता काम के दौरान लोगों को बीच-बीच में उठकर चलने-फिरने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं, नियमित जांच की सुविधा दे सकते हैं और स्वस्थ विकल्पों को अधिक आसानी से उपलब्ध करा सकते हैं।
लोगों को हृदय रोग के लक्षणों के बारे में भी अधिक जागरूक होने की जरूरत है। सीने में बेचैनी, सांस फूलना, बिना किसी वजह के पसीना आना, मितली, चक्कर आना या हाथ, कंधे, पीठ अथवा जबड़े तक फैलने वाली बेचैनी आदि सिम्पटम्स को कभी भी मामूली समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। हृदय संबंधी आपात स्थिति में तुरंत चिकित्सा सहायता मिलना जीवन बचा सकता है।
प्रिवेंटिव कार्डियोलॉजी यानी रोकथाम पर आधारित चिकित्सा में हुई प्रगति से अब हृदय रोग के खतरे की पहचान पहले ही करना संभव हो रहा है- अकसर लक्षण दिखाई देने से भी पहले। इससे डॉक्टरों को बीमारी के गंभीर या आपात स्थिति में बदलने से पहले ही जरूरी कदम उठाने का मौका मिलता है।
कार्डियोवैस्कुलर हेल्थ के क्षेत्र में हमारी अगली बड़ी उपलब्धि रोकथाम ही होनी चाहिए। हमें जोखिम की पहचान पहले करनी होगी, स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देना होगा और नियमित हेल्थकेयर का हिस्सा बनाकर बचाव संबंधी जांचों को आम बनाना होगा। परिवारों, स्कूलों, कार्यस्थलों और स्वास्थ्य व्यवस्था- सभी के लिए यह समझना बहुत जरूरी है कि हमारे हृदय की सेहत पहली बार लक्षण सामने आने से बहुत पहले ही प्रभावित होने लगती है।
युवा भारत को हृदय-रोग के बारे में केवल तभी नहीं जानना चाहिए, जब उसे खुद किसी गंभीर स्वास्थ्य संकट का सामना करना पड़े। अगर हम समय रहते कदम उठाएं, तो बीमारी के दुष्परिणामों से निपटने के बजाय उसके पूरे क्रम को ही बदल सकते हैं।
इसीलिए सवाल यह नहीं है कि कम उम्र के भारतीयों को हृदय रोग का खतरा है या नहीं। सवाल यह है कि क्या हम इस खतरे को इतना पहले पहचानने के लिए तैयार हैं कि उसके बारे में कुछ किया जा सके?
- आज सवाल यह नहीं है कि युवा भारतीयों को हृदय रोग का खतरा है या नहीं। वह तो स्पष्टतया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम इस खतरे को इतना पहले पहचानने के लिए तैयार हैं कि उसके बारे में कुछ किया जा सके?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

